कानून विशेषज्ञ लेख

कानून विशेषज्ञों द्वारा प्रमाणित लेखों का भंडार।

प्रावधान अपील से संबंधित उपबंध दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 के अध्याय २९, धारा ३७२ से ३९४ में वर्णित है। धारा ३७२ के अन्तर्गत यह सामान्य नियम अधिकथित है कि दण्ड न्यायालय के किसी निर्णय या आदेश से कोई अपील इस संहिता द्वारा या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के द्वारा जैसा उपबंधित है, के सिवाय नहीं होगी। अपील का अर्थ अपील एक परिवाद है जो छोटे न्यायालयों द्वारा किये गये विनिश्चयों के विरुद्ध बड़े न्यायालयों में दायर किया जाता है तथा उच्चतर न्यायालय से यह निवेदन किया जाता है कि वह निचले न्यायालय के विनिश्चय को ठीक कर दे अथवा उसे उलट दे। इस प्रकार अपील सदैव अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध किसी उच्चतर न्यायालय को की जाती है। ad दुर्गा शंकर मेहता बनाम रघुराज सिंह, 1954 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि व्यक्ति को किसी भी...
एक वैध संविदा के लिए आवश्यक है कि एक पक्ष प्रस्ताव करे और दूसरा पक्ष उस प्रस्ताव को स्वीकार करे। प्रस्ताव के बिना संविदा का निर्माण नही सकता है। भारतीय संविदा अधिनियम 1872 मे प्रस्ताव के लिए Proposal शब्द का प्रयोग किया गया है। वही अंग्रेजी विधि में इसके लिए Offer शब्द का प्रयोग किया गया है। प्रस्ताव (Proposal Offer) भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2(a) के अनुसार ‘‘जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को किसी कार्य को करने अथवा न करने के विषय में अपनी इच्छा इस उद्देश्य से प्रकट करता है कि उस व्यक्ति की सहमति उस कार्य को करने अथवा न करने के विषय में प्राप्त हो जाए तो इच्छा को प्रस्ताव कहते हैं। ad जो व्यक्ति प्रस्ताव रखता है उसे प्रस्तावक या वचनदाता कहते है तथा जिस व्यक्ति के सामने प्रस्ताव रखा जाता है उसे स्वीकृतकर्ता या वचनगृहीता कहते है।...
उपधारणा से आप क्या समझते है? भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 4 में वर्णित उपधारणा से तात्पर्य मानवीय ज्ञान, अनुभव, योग्यता के आधार पर, किसी मान्य तथ्य के आधार पर किसी दूसरे तथ्य का अनुमान लगा लेना उपधारणा कहलाता है। उपधारणा तर्कों पर आधारित होती है। उपधारणा कोई प्रमाण (Proof) नहीं है और भारतीय साक्ष्य अधिनियम में उपधारणा (Presumption) की कोई परिभाषा नहीं दी गयी है। कुछ ऐसे तथ्य होते है जिन्हें साक्ष्य नहीं माना जा सकता क्योंकि इनमें प्रमाणकारी शक्ति नहीं होती है। ऐसे अभियोजन की कार्यवाही में अभियुक्त के विरुद्ध यह तथ्य कि उसका आचरण बुरा है, असंगत होता है। जब तक कि उस बात का साक्ष्य न दिया गया हो कि वह सदाचारी है। ad जब न्यायालय किसी तथ्य के अस्तित्व को मान ले तो इसे उपधारणा (Presumption) कहते हैं। किसी उपधारणा का प्रभाव यह होता है कि...
प्रावधान व परिभाषा भारतीय संविदा अधिनियम 1872 की धारा 148 में “उपनिधान” “उपनिधाता’ और “उपनिहिती” की परिभाषा दी गई है। धारा 148 में बताया गया है- उपनिधान एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को किसी प्रयोजन के लिए इस संविदा पर वस्तुओं का परिदान करना है कि जब प्रयोजन पूरा हो जाए वे लौटा दी जाएंगी अथवा परिदान करने वाले व्यक्ति के निर्देशों के अनुसार अन्य व्यक्ति को दी जाएंगी। ad स्पष्टीकरण यदि वह व्यक्ति, जो किसी अन्य के माल पर पहले से ही कब्जा रखता है, उसका धारण उपनिहिती के रूप में करने की संविदा करता है तो वह तद द्वारा उपनिहिती हो जाता है और वस्तु का स्वामी उसका उपनिधाता हो जाता है। यद्यपि वह वस्तु उपनिधान के तौर पर परिदत्त न किया गया हो। कौन होता है उपनिधाता एवं उपनिहिती? उपनिधाता एवं उपनिहिती की परिभाषा (धारा 148) माल का परिदान करने वाला...
चार्जशीट का मतलब पुलिस चार्जशीट, दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 170 के अंतर्गत पुलिस रिपोर्ट को कहते हैं। इस रिपोर्ट के साथ अभियुक्तों को कोर्ट के समक्ष विचारण (Trial) के लिए प्रस्तुत किया जाता है। चार्जशीट में अपराध के संक्षिप्त विवरण के साथ अभियुक्तों के नाम पते तथा उनके खिलाफ की गई गिरफ्तारी, जमानत, फरार इत्यादि का विवरण होता है। साथ ही अपराध का संक्षिप्त नैरेटिव और उसे कोर्ट में साबित करने के लिए पेश किये जाने वाले गवाह, अभिलेख और अन्य साक्ष्यों के बारें में लिखा जाता है। चार्जशीट के आधार पर कोर्ट में केस का ट्रायल होता है। ad चार्जशीट अपराधिक मामलों से संबंधित है जिसे चालन भी कहा जा सकता है। किस स्थिति में चार्जशीट पेश होती है और पुलिस की इस में क्या भूमिका होती है इन सब बातों आगे की वीडियो में जानेगे। चार्जशीट का विवरण? किसी...
संघवाद क्या है? संघवाद (Federalism) शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द ‘Foedus’ से हुई है जिसका अर्थ एक प्रकार का समझौता या संधि है। संघवाद एक राजनीतिक प्रणाली है जिसमें केंद्र, राज्य , प्रांत या राज्यों की स्वायत्तता को बढ़ावा मिलता है, जो मिलकर एक आदर्श राष्ट्र का निर्माण करते हैं। संघीय शासन व्यवस्था में सर्वोच्च सत्ता केन्द्रीय प्राधिकार और उसकी विभिन्न आनुषंगिक इकाइयों के बीच बटी होती है। आम तौर पर संघीय शासन व्यवस्था में दो स्तर पर सरकारें होती हैं। इसमें एक केंद्रीय सरकार होती है जो पूरे देश के लिए होती है, जिसके जिम्मे राष्ट्रीय महत्व के विषय होते हैं। फिर राज्य या प्रांतों के स्तर की सरकारें होती हैं जो शासन के दैनिक कामकाज को देखती हैं। ad केंद्र व राज्य के अलग-अलग कार्य होते हैं, तथा शासन के इन दोनों स्तर की सरकारें अपने-अपने स्तर...
महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ या उत्पीड़न के मामले जब भी कानूनी तौर पर दर्ज होते हैं. तो पुलिस अक्सर ऐसे मामलों में आरोपी के खिलाफ धारा 354 के तहत मुकदमा दर्ज करती है. आइए जानते हैं आईपीसी की धारा 354 के बारे में। ad क्या है आईपीसी की धारा 354 भारतीय दंड संहिता की धारा 354 का इस्तेमाल ऐसे मामलों में किया जाता है. जहां स्त्री की मर्यादा और मान सम्मान को क्षति पहुंचाने के लिए उस पर हमला किया गया हो या उसके साथ गलत मंशा के साथ जोर जबरदस्ती की गई हो. धारा 354 किसी भी स्त्री की लज्जा या उसकी इज्जत को भंग या नष्ट करने के उद्देश्य से उस स्त्री पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग करने से सम्बन्धित है। इस धार के अनुसार अगर कोई भी व्यक्ति किसी भी स्त्री के मान सम्मान को भंग करता है, या किसी भी गलत नियत के साथ जोर जबरदस्ती करता है, जो कि एक गलत...
किसी व्यक्ति पर हत्या का प्रयास करने का आरोप लगता है तो ऐसा करने वाले पर IPC की धारा 307 के तहत FIR दर्ज किए जाने का प्रावधान है. लेकिन बहुत से लोगों को धारा 307 के विषय में सही जानकारी नहीं है. आज के वीडियो में हम हत्या का प्रयास को जानने की कोशिश करेगे। ad भारतीय दंड सहिंता की धारा 307 कब लगती है? धारा 307 प्राय: उस स्थिति में लागू होती है जब अभियुक्त द्वारा किसी की हत्या करने के आशय से प्रयास किया गया था किन्तु वह हत्या करने के प्रयास में सफल नहीं हो सका। जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति की हत्या करने की कोशिश करता है और हत्या करने में असफल रहता है. तो ऐसा अपराध करने वाले को आईपीसी की धारा 307 के तहत दंडित दिए जाने का प्रावधान है। साधारण शब्दों में कहें तो अगर कोई किसी की हत्या की कोशिश करता है, लेकिन जिस व्यक्ति पर हमला हुआ है...
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना कब हुई? (Why was the International Court of Justice established?) अंतरराष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख न्यायिक अंग है और यह सयुंक्त राष्ट्र संघ के पांच मुख्य अंगों में से एक है। इसकी स्थापना संयुक्त राष्ट्र चार्टर द्वारा 1945 में की गई और अप्रैल 1946 में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने कार्य करना प्रारंभ किया। अंतरराष्ट्री य न्यायालय ने अपनी स्थापना से लेकर अब तक कई देशों के बीच जटिल विवादों का शांतिपूर्ण हल खोजने में सफल रहा है। अंतरराष्ट्री य न्यायालय का मुख्य उद्देश अंतर्राष्ट्रीय विवादों का निष्पक्ष और शांतिपूर्ण हल खोजना है। ad अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का मुख्यालय कहाँ है? (International court of justice headquarters) अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का मुख्यालय नीदरलैंड की राजधानी हेग में स्थित है।...
Caveat Petition under Section 148a of CPC 1908 कैविएट याचिका का प्रावधान सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 148A के तहत किया गया है। कैविट याचिका को एहतियाती उपाय के रूप में परिभाषित किया गया है जो उस व्यक्ति द्वारा लिया जाता है जो भय या घबराहट में है कि उसके खिलाफ कोई मामला अदालत में दायर हो सकता है। कैवेट एक लैटिन शब्द है इसका मतलब होता है be aware। कैविएट एक सुचना है जो एक पार्टी के द्वारा कोर्ट को दी जाती है जिसमें ये कहा जाता है कि कोर्ट एप्लिकेंट को बिना नोटिस भेजे विपक्षी पार्टी को कोई भी रिलीफ न दें, और ना ही कोई एक्शन ले। यह एक तरह का बचाव होता है जो एक पार्टी के द्वारा लिया जाता है। Civil Procedure Code 1908 Section 148(a) के अंतर्गत Caveat Petition file की जाती है। Caveat फाइल करने वाले व्यक्ति को Caveator कहा जाता है। ad...
भारत में किसी भी महिला से बलात्कार (Rape) किया जाना कानून के तहत गंभीर श्रेणी का अपराध माना जाता है। बलात्कार महिलाओं के खिलाफ होने वाला सबसे क्रूर अपराध है, जो न केवल उनकी शारीरिक अखंडता को नष्ट करता है, बल्कि व्यक्तिगत व सामाजिक संबंधों के उनकी विकास की क्षमता को बाधित कर उनके जीवन व जीविका को प्रभावित करता है। बलात्कार की शिकार महिला को मानसिक तथा मनोवैज्ञानिक संत्रास से गुजरना पड़ता है, इस अपराध को अंजाम देने वाले दोषी को कड़ी सजा का प्रावधान है। इस अपराध के लिये भारत दंड संहिता में धारा 376 के तहत सजा का प्रावधान है। ad क्या है धारा 376 (IPC Sec 376 in Hindi) किसी भी महिला के साथ बलात्कार करने के आरोपी पर धारा 376 के तहत मुकदमा दर्ज किया जाता है। जिसमें अपराध सिद्ध होने की दशा में दोषी को कम से कम 7 साल व अधिकतम आजीवन कारावास की...
क्या है धारा-304 बी? भारतीय दंड संहिता में 1986 में एक नई धारा 304-बी को शामिल किया गया है। संहिता की यह नई धारा खासतौर पर दहेज हत्या या दहेज की वजह से होनी वाली मौतों के लिए बनाई गई है। यदि शादी के सात साल के भीतर किसी विवाहित महिला की जलने से, चोट लगने से या दूसरी असामान्य वजहों से मृत्यु हो जाती है और ये पाया जाता है कि दहेज की मांग की जा रही थी तथा अपनी मौत से ठीक पहले वह औरत पति या ससुराल वालों की तरफ से क्रूरता और उत्पीड़न का शिकार थी, तो आरोपियों पर धारा 304बी के मुकदमा दर्ज किया जाता है। ad 1. असामान्य वजहों से मृत्यु असामान्य वजहों से मृत्यु का अभिप्राय स्वाभाविक मृत्यु से इतर मृत्यु की घटना से है,जिसमे जलने, शारीरिक चोट, गला दबाने, जहर खाने, फांसी से आदि से होने वाली मौत शामिल है । धारा 304-B को प्रत्यक्ष प्रमाण की जरुरत नहीं...
1947 में आज़ादी के साथ जब संविधान निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई, तब सबसे बड़ी उम्मीद थी कि भारत प्राकृतिक न्याय की अवधारणा को ही राज्य व्यवस्था का मूल आधार बनाएगा। भारतीय संविधान की रचनाकार सभा ने अपनी पूरी ताकत प्राकृतिक न्याय को मूल रुप देने में लगाई। अस्पृश्यता को ख़त्‍म करने का प्रावधान, सभी को अपना धर्म मानने, उपासना करने और उसका प्रचार करने का अधिकार, बंधुआ होने से मुक्ति सरीखे अधिकार इसमें शामिल हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संविधान की उद्देशिका में ही भारतीय सामाजिक और राज्य व्यवस्था के चरित्र को आकार देने के लिए न्याय, बंधुता, समानता और स्वतंत्रता का उल्लेख है। ad भारत के संविधान में कहीं भी प्राकृतिक न्याय का उल्लेख नहीं किया गया है। हालाँकि भारतीय संविधान की उद्देशिका , अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 में प्राकृतिक न्याय के...
संपत्ति अंतरण अधिनियम (Transfer of Property Act) 1982 की धारा 58(a) में बंधक (Mortgage) को परिभाषित किया गया है I धारा 58 बंधक की परिभाषा किसी विशिष्ट अचल संपत्ति में किसी हित का वह अन्तरण, जो उधार के तौर पर दिये जाने वाले या दिए गये धन के भुगतान को या वर्तमान या भविष्य में दिये जाने वाले ऋण के भुगतान को या ऐसे वचनबन्ध का पालन जिससे धन सम्बन्धी दायित्व की उत्पत्ति हो सके, प्रतिभूति करने के प्रयोजन या उद्देश्य से किया जाता है। अर्थात बंधक किसी विशिष्ट अचल संपत्ति के हितों का अग्रिम भुगतान पाने के उद्देश्य से किया गया अंतरण बन्धक कहलाता है। ad उपरोक्त परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि बंधक उस स्थिति में उत्पन्न होता है जब किसी अचल संपत्ति के हित का अंतरण , किसी ऋण को प्राप्त करने के लिए जमानत के रूप में किया गया हो, अथवा किसी अन्य दायित्व...
भारतीय संविधान भूमिका भारतीय संविधान का इतिहास (History of Indian Constitution) जानने से पहले मैं संविधान क्या है और आखिर इसकी उपयोगिता क्या है, इसका जिक्र करना चाहूँगा। भारतीय संविधान प्रशासनिक प्रावधानों का एक दस्तावेज है (Constitution is a document of administrative provisions)। इस दस्तावेज में लिखा हर एक शब्द हमारी सरकार की मूल सरंचना को निर्धारित करता है। प्रत्येक सरकार संविधान के अनुसार काम करती है। सरकार के अधिकार, गतिविधि, उसकी कार्यशैली, उसकी बनावट, सरकार को क्या करना है, क्या नहीं करना है।सब संविधान में परिभाषित है। संक्षेप में भारतीय संविधान एक नियमों से भरी किताब है। ये नियम सरकार के मुख्य अंग- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की बनावट और कार्यप्रणाली को निर्धारित करते हैं। ad भारत का सांवैधानिक विकास वास्तव में...
हम सभी को जीवन कभी न कभी FIR लिखाना ही पड़ता है चाहे खुद के लिये या किसी अन्य जानने वाले के लिये। अधिकाश लोगो की शिकायत होती है कि उनकी FIR थाने में नहीं लिखी गई, या फिर मजिस्ट्रेट के यहाँ एफ़आईआर के लिये किया गया आवेदन निरस्त हो गया। इसके तो कई कारण होते है किंतु एक कारण ये भी होता है की आपके लिखने तरीका गलत हो। एफ़आईआर को कम से कम शब्दों में स्पष्ट और पूरे मामले को लिखना चाहिये क्योंकि न्यायालय में आपका केस इसी आधार पर चलता है। आज के लेख में आसान भाषा में एफ़आईआर को लिखने का तरीका बताने वाला हूँ क्योंकि कई बार पढ़े लिखे लोग भी एफ़आईआर लिखने में गलती कर देते है। ad अगर आप किसी मामले की एफआईआर दर्ज कराने पुलिस स्टेशन जाते हैं और पुलिस अधिकारी आपकी एफआईआर दर्ज नहीं करता है तो आप क्या करेंगे? ज्यादातर लोग वरिष्ठ पुलिस अधिकारी या किसी...
समन न्यायालय द्वारा जारी किया गया ऐसा आदेश जो किसी व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष हाजिर होने के लिए दिया जाता है। प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) का यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि प्रत्येक न्यायिक कार्यवाही का संचालन एवं वाद की सुनवाई पक्षकारों की उपस्थिति में की जानी चाहिए। बिना पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दिए की गई न्यायिक कार्यवाही एवं वाद की सुनवाई और तदनुसार दिया गया निर्णय केवल न्याय को ही दूषित नहीं करता अपितु इससे पक्षकारों के मन में न्याय के प्रति जो विश्वास है वह भी प्रभावित होती है। ये बात सिर्फ पक्षकारों के लिए ही नहीं अपितु साक्षियों के लिए भी प्रयोज्य है। ad पक्षकारों की उपस्थिति के लिए न्यायालय आदेश करता है और पक्षकारों को उपस्थित होने के लिए आदेश जारी करता है। इस आदेश विधिक भाषा में समन (Summon) कहां जाता है। सिविल...
विवाह (Marriage) सात जन्मों का बंधन माना जाता है। लेकिन खंडित और शून्य वैवाहिक जीवन टूट ही जाए तो अच्छा है। ऐसे वैवाहिक जीवन को घसीटते रहने से क्या फायदा, जिसमें वे न स्वयं को विवाहित कह पाते हैं और न ही अविवाहित होते हैं। वे अन्यत्र विवाह कर पाने के लिए भी स्वतंत्र नहीं होते इसलिए यह अत्यंत पीड़ादायक स्थिति होती है, चाहे उसके लिए कोई भी जिम्मेदार हो। ad शून्य विवाह (Void Marriage) कोई विवाह नहीं है। यह ऐसा संबंध है जो विधि के समक्ष विद्यमान है ही नहीं। इसे विवाह केवल इस कारण कहते हैं कि दो व्यक्तियों ने विवाह के अनुष्ठान सम्पन्न कर लिये हैं। परन्तु पूर्ण अवबाधाओं के होने या पूर्णतया सामर्थ्यहीन होने के कारण कोई भी व्यक्ति पति-पत्नी की प्रास्थिति विवाह के अनुष्ठान करके ही प्राप्त कर सकता है। शून्य विवाह एक ऐसा विवाह है जो कि कानून के...
प्राय: हर प्रकार की लूट में चोरी या उद्दापन होता है। `लूट’ चोरी एवं उद्दापन का ही एक गम्भीर रूप है। जैसा कि धारा ३९० में लूट की परिभाषा दी गई है-“सब प्रकार की लूट में या तो चोरी या अभिप्राप्त सम्पत्ति को ले जाने या ले जाने का प्रयत्न करने में अपराधी उस उद्देश्य से स्वेच्छया किसी की मृत्यु या उपहति या उसका सदोष अवरोध या तत्काल मृत्यु का या तत्काल उपहति का या तत्काल सदोष अवरोध का भय कारित करता है या कारित करने का प्रयत्न करता है। ad चोरी कब लूट है चोरी “लूट” है, यदि उस चोरी को करने के लिए, या उस चोरी के करने में या उस चोरी द्वारा अभिप्राप्त सम्पत्ति को ले जाने या ले जाने का प्रयत्न करने में, अपराधी उस उद्देश्य से स्वेच्छया किसी व्यक्ति की मृत्यु, या उपहति या उसका सदोष अवरोध या तत्काल मृत्यु का, या तत्काल उपहति का, या तत्काल सदोष अवरोध का...
दण्ड संहिता का अध्याय III दण्ड से (of Punishment) सम्बन्धित है। जिनके लिये अभियुक्त संहिता के अन्तर्गत दायी है। यह अध्याय, जहाँ दण्डों के विषय का सम्बन्ध है, विस्तृत नहीं है क्योंकि विशिष्ट तथा स्थानीय विधियों के अन्तर्गत अन्य प्रकार के दण्ड आरोपित किये जा सकते हैं। इस धारा में उल्लिखित दण्ड केवल इस संहिता में वर्णित अपराधों पर लागू होगा। सामान्यतया संहिता अधिकतम दण्ड का निर्धारण करती है जिसे किसी अभियुक्त पर थोपा जा सकता है। इस नियम के कुछ अपवाद भी हैं। किसी विशिष्ट मामले में, संहिता द्वारा निश्चित अधिकतम सीमा के अन्दर ही न्यायालय अपने विवेक के आधार पर दण्ड की मात्रा को निर्धारित करेगा। ad परन्तु स्वविवेक यह दिग्दर्शित करे कि अपराध की गम्भीरता तथा आरोपित दण्ड के बीच एक युक्तियुक्त अनुपात है। दण्ड, न तो अनावश्यक कठोर होना चाहिये और न...

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