साँई बाबा चालीसा

हैलो फ्रेंड्स कैसे हो आप सब आज हम बात करेंगे Sai Baba Chalisa के विषय में साईं बाबा ने अपने जीवन काल में अनेको चमत्कार किये थे। Sai Baba ने अपना जीवन यापन एक फिकिर के सामान व्यतीत किया था वे शिरडी नामक एक गाँव में रहते थे एवं सबका मालिक एक जाप निरंतर किया करते थे।

साँई बाबा चालीसा

गुरूवार के दिन साईं बाबा की पूजा करना अति शुभ दिन माना जाता है तो चलिए बढ़ते है साईं चालीसा की ओर जिससे साईं बाबा प्रसन्न होते है

श्री साँई चालीसा इन हिंदी

पहले साई के चारणों में अपना शीश नावउँ मैं।
कैसे शिरडी साई अये सारा हाल सुनाऊ मैं।।
कौन है माता, पिता कौन है, यह न किसी ने भी जाना।
कहाँ जन्म साई ने धरा, प्रश्न पेहली सा रहा बना।।

कोई कहे अयोध्या के, ये रामचंद्र भगवान है।
कोई कहता साई बाबा, पवन पुत्र हनुमान है।।
कोई कहता है साई मूर्ति, श्री गजानन है साई।
कोई कहता गोकुल, मोहन देवकी नंदन है साई।।

शंकर समझे भक्त कई तो, बाबा को भेजते रहते।
कोई कहे अवतार दत्त का, पूजा साई को करते।।
कुछ भी मानो उन्को तुम, पर साई है सच्चे भगवान।
बड़े दयालु, दीनबन्धु, कितनों को दिया जीवन दान।।

कुछ वर्ष पहले की घटना, तुम्हे सुनाऊँगा मैं बात।
किसी भाग्यशाली की, शिरडी मै आयी थी बारात।।
आया साथ उसी का था, बालक एक बहुत सूंदर।
आया आकर वहीँ बस गया, पवन किया शिरडी का नगर।।

कई दिनों तक रहा भटकता, भिक्ष मांगी उसने दर-दर।
और दिखाई ऐसी लीला, जग में जो हो गई अमर।।
जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, बढ़ती गयी वैसी ही शान।
घर-घर में होने लगा नगर में, साई बाबा का गुणगान।।

दिन दिगन्त में लगा गूंजने, फिर तो साई जी नाम।
दीन-दुखी की रक्षा करना, यही रहा बाबा का काम।।
बाबा के चरणों मैं जाकर, जो कहता में हु निर्धन।
दया उसी पर होती उनकी, खुल जाते दुख के बन्धन।।

कभी किसी ने मांगी भिक्षा, दो बाबा मुझको सन्तान।
एवमस्तु तब कहकर साई, देते थे उसको वरदान।।
स्वयं दुखी हो जाते बाबा, दीन-दुखी जन का लाख हाल।
अन्त: करन श्री साई का, सागर जैसा रहा विशाल।।

भक्त आया एक मद्रासी, घर का बहुत बड़ा धनवान।
माल खजाना बेहद उसका, केवल नहीं रही संतान।।
लगा मानाने साई नाथ को, बाबा मुझ पर करो दया।
झंझा से झकृत नैया को, तुम ही मेरी पार करो।।

कुलदीपक के बिना अंधेरा, छाया हुआ है घर मै मेरे।
इसलिए आया हूँ बाबा, होकर शरणागत तेरे।।
कुलदीपक के ही अभाव में, व्यर्थ है दौलत की माया।
आज भिकारी बनकर बाबा, शरण तुम्हरी में आया।।

देदो मुझको पुत्र-दान, में ऋणी रहूँगा जीवन भर।
और किसी की आशा न मुझको, सिर्फ भरोसा तुमपर।।
अनुनय विनय बहोत की उसने, चरणों मै धरकर के शीश।
तब पर्सन होकर बाबा ने दिया, भक्त को यह आशीष।।

अल्ला भला करेगा तेरा, पुत्र जन्मेगा घर तेरे।
कृपा रहेगी तुझ पर उसकी,और तेरे उस बालक पर।।
अबतक किसी ने न पाया, साई की कृपा का पार।
पत्र रतन दे मद्रासी को, धन्य किया उसका संसार।।

तन-मन से भजे उसकी का, जग मैं ही होता है उदार।
साँच को आँच नहीं है कोई, सदा झूठ की होती हार।।
मैं हूँ सदा सहारे उसके, सदा रहूँगा आपका दास।
साई जैसा प्रभु मिला है, इतनी ही कम है क्या आस।।

मेरा भी दिन था एक ऐसा, मिलती नहीं थी मुझे रोटी।
तन पर कपडा दूर रहा था, शेष रही नन्ही सी लंगोटी।।
सरिता सन्मुख होने पर भी, मैं प्यासा था।
दुर्दिन मेरा ऊपर, दावाग्नि बरसाता था।।

धरती के अतिरिक्त जगत में, मेरा कुछ अवलम्ब न था।
बना भिखारी मैं दुनिया में, दर-दर ठोकर खता था।।
ऐसे मे एक मित्र मिला, जो परम भक्त था साई का।
जंजालो से मुक्त मगर, जगती में वह भी मुझ सा था।।

बाबा के दर्शनों के खातिर, दोनों ने मिलकर किया विचार।
साई जैसा दया मूर्ति के, दर्शन को हो गए तैयार।।
पवन सिरडी नगर में जाकर, देखी मतवाली मूरीत।
धन्य जन्म हो गया की हमने, जब देखी साई की मूरीत।।

जब से किये है दर्शन हमने, दुख सारा काफूर हो गया।
संकट सारे मिटे और, विपदाओं को हो अंत गया।।
मान और सम्मान मिला, भिक्षा में हमको सब बाबा से।
प्रतिबिंबित हो उठे जगत में, हम साई की आज्ञा से।।

बाबा ने सम्मान दिया है, मान दिया इस जीवन में।
इसका ही सम्बल ले मैं, हँसता जाऊंगा जीवन में।।
साई की लीला का मेरे, मन पर ऐसा असर हुआ।
लगता, जगती के कण-कण में, जैसे हो वह भरा हुआ।।

काशीराम बाबा का भक्त, इस शिरडी में रहता था।
में साई का,साई मेरा वह दुनिया से कहता था।।
सिलकर स्वयं वस्त्र बेचता था, ग्राम नगर बाजारों में।
झंकृत उसकी हृदय तंत्री थी, साई की झंकारों में।।

स्तम्भ निशा थी, थे सोये, रजनी अंचल में चाँद सितारे।
नहीं सूझता रहा हाथ हो हाथ।।
वस्त्र बेचकर लौट रहा था, हाय! हैट के कशी।
विचित्र बड़ा सयोंग की उस दिन, आता था एकांकी।।

घेर राह में खदे हो गये, उसे कुटिल अन्यायी।
मारो काटो लूट लो इसको, इसकी किसी पालक में।।
अनजाने ही उसके मुँह से, निकल पड़ा था साई।।
जिसकी प्रतिध्वनि शिरडी में, बाबा को पड़ी सुनाई।।

बहुत देर तक पड़ा रहा वह,वही उसी हालत में।
जाने कब कुछ होश हो उठा, उसको किसी पलक में।।
लूट पीटकर उसे वहॉँ से, कुटिल गये चम्पत हो।
आघातों से ममाहर्त हो, उसने दी थी संज्ञा खो।।

क्षुबध हो उठा मानस उसका, बाबा गये विकल हो।
लगता जैसे घटना सारी, घाटी उन्ही के समुख हो।।
उन्मादी से इधर उधर तब, बाबा लगे भटकने।
सन्मुख चीज़े जो भी आयी, उनको लगी पटकने।।

और धधकेलते अंगारों में, बाबा आज विकल है।
हुए सशंकित सभी वहा, लाख तांडव नृत्य निराला।।
समझ गए सभ लोग की कोई, भक्त पड़ा संकट में।
क्षुभित खड़े थे सभी वहाँ पर.पड़े हुए विस्मय में।।

उसे बचने के खातिर, बाबा आज विकल है।
उसकी ही पीड़ा से पीड़ित, उसका अन्तस्तल है।।
इतने मैं ही विधि ने, अपनी विचित्रता दिखलाई।
लख कर जिसको जनता की, श्रदा सरिता लहराई।।

लेकर संज्ञाहीन भक्त को, गाड़ी एक वहां आई।
सन्मुख अपने देखा भक्त को, साई की आंख भर आई।।
शांत,धीर, गंभीर सिंधु सा, बाबा का अन्तस्तल।
आज न जाने क्यों रह-रह, हो जाता था चंचल।।

आज दया की मूर्ति स्वयं था, बना हुआ उसकी उपचारी।
और भक्त के लिए आज था, देव बना प्रतिहारी।।
आज भक्ति की विषम परीक्षा में, सफल हुआ था कशी।
उसके ही दर्शन के खातिर, थे उमड़े नगर-नवासी।।

जब भी और जहाँ भी कोई, भक्त पड़े संकट में।
उसकी रक्षा करने बाबा, जाते है पलभर में।।
युग-युग का है सत्य यह, नहीं कोई नई कहानी।
आपदग्रस्त भक्त जब होता, जाते खुद अन्तर्यामी।।

भेद-भाव से परे पुजारी, मानवता के थे साई।
जितने प्यारे हिन्दू-मुस्लिम, उतने थे सिख ईसाई।।
भेद-भाव मंदिर-मस्जिद का, तोड़-फोड़ बाबा ने डाला।
राम रहीम सभी उसके थे, कृष्ण करीम अल्लाताला।।

घण्टे की प्रतिध्वनि से गूंजा, मस्जिद का कोना कोना।
मिले परस्पर हिन्दू-मुस्लिम, प्यार बढ़ा दिन-दिन दूना।।
चमत्कार था कितना सुन्दर, परिचय इस काया ने दी।
और नीम के कुडवाहट से भी, मिठास बाबा ने भर दी।।

सच को स्नेह दिया साई ने, सबको अतुल प्यार किया।
जो कुछ जिसने भी चाहा, बाबा ने उसको वही दिया।।
ऐसे स्नेह शील भाजन का, नाम सदा जो जपा करे।
पर्वत जैसा दुख क्यों न हो, पलभर में वह दूर टरे।।

जब तू अपनी सुधियाँ तजकर, बाबा की सुधि किया करेगा।
और दिन-रात बाबा, बाबा, बाबा ही तू राटा करेगा।।
तो बाबा को अरे! विवश हो, सुधि तेरी लेनी ही होगी।
तेरी हर इच्छा बाबा के पूरी ही करनी होगी।।

जंगल-जंगल भटक न पागल, और ढूंढने बाबा को।
एक जंगल केवल शिरडी में, तू पायेगा बाबा को।।
धन्य जगत में प्राणी है वह, जिसने बाबा को पाया।।
दुख में, सुख में प्रहर आठ हो, साई का हो हूँ गया।।

गिरें संकटो के पर्वत चाहे, या बिजली ही टूट पड़े।
साई के नाम सदा तुम, सन्मुख सब के रहो अड़े।।
इस बूढ़े की सुन करामात, तुम हो जावोगे हैरान।
दांग रह गए सुनकर जिसको, जाने कितने चतुर सूजन।।

एक बार शिरडी में साधु, ढोंगी था कोई आया।
भोले -भाले नगर नवासी,जनता को था भयमाया।।
जड़ी बूटियां उन्हें दिखाकर, करने लगा वही भाषण।
कहने लगा सुनो श्रोतागण, घर मेरा है वृन्दावन।।

औषिधि मेरे पास एक है, और अजब उसमे शक्ति।
इसके सेवन करने से ही, हो जाती दुख की मुक्ति।।
अगर मुक्त होना चाहो तुम, संकट से बीमारी से।
तो है मेरा नम्र निवेदन, हर नर से, हर नारी से।।

लो खरीद तुम इसको, इसकी सेवन विधियाँ है न्यारी।
यद्यपी तुच्छ वस्तु है यह गुण उसके है अतिशय भारी।।
जो है संततिहीन यहाँ यदि, मेरी औषधि को खाये।
पुत्र-रत्न हो प्राप्त, अरे और वह मुँह माँगा फल पाए।।

औषध मेरी जो न खरीदे, जीवन भर पछतायेगा।
मुझ जैसा प्राणी जायद ही, अरे यहाँ आ पायेगा।।
दुनिया दो दिन का मेला है, मौज शोक तुम भी कर लो।
अगर इससे मिलता है, सब कुछ, तुम भी इसको लेलो।।

हैरानी बढाती जनता की, लाख इसकी कारस्तानी।
प्रमुदित वह भी मन ही मन था, लाख लोगों की नादानी।।
खबर सुनाने बाबा को यह, गया दौड़कर सेवक एक।
सुनकर भृकुटी तनी और, विस्मरण हो गया सभी विवेक।।

हुक्म दिया सेवक को, सत्वर पकड़ दुष्ट कर लायो।
या शिरडी के सिमा से, कपटी को दूर ले जाओ।।
मेरे रहते, शिरडी की भोली भली जनता को।
कौन नीच है जो ऐसा, सहस करता है छलने को।।

पलभर में ही ऐसे ढोंगी, कपटी नीच लूटरे को।
महानाश के महागर्त में, पहुंचा दू जीवन भर को।।
तनिक मिल आभास मादरी, क्रूर, कुटिल, अन्यायी को।
काल नाचता है अब सिर पर, गुस्सा आया साई को।।

स्नेह,शील,सौजन्य अदि का, आभूषण धारण कर।
बढ़ता इस दुनिया में जो भी, मानव सेवा के पथ पर।।
वही जीत लेता है जगती के, जन जन का अन्तस्तल।।
उसकी उदासी ही जग को, कर देती है विह्वल।।

जब-जब जग में भार पाप का, बढ़-बढ़ हो जाता है।
उसे मिटाने के खातिर, अवतारी हो जाता है।।
पाप और अन्याय सभी कुछ, इस जगती का हर के।
दूर भगा देता दुनिया के दानव को क्षण भर में।।

स्नेह सुधा की धार बरसने, लगती ही दुनिया में।
गले परस्पर मिलने लगते, जन-जन है आपस में।।
ऐसे ही अवतारी साई, मृत्युलोक में आकर।
समता का यह पाठ पढ़ाया, सबको अपना आप मिटाकर।।

नाम द्वारका मस्जिद का, रक्खा शिरडी में साई ने।
पाप,ताप,सन्ताप मिटाया, जो कुछ पाया साई ने।।
सदा याद में मस्त राम की, बैठे रहते थे साई।
पहर आठ ही राम नाम को, भेजते रहते थे साई।।

सुखी-रूखी ताजी-बासी, चाहे होये या पकवान।
सदा यास के भूखे साई की, खातिर थे साई सभी समान।।
स्नेह और श्रद्धा से अपनी, जन को कुछ दे जाते थे।
बड़े चाव से उस भोजन को, बाबा पावन करते थे।।

कभी-कभी मन बहलाने को, बाबा बाग में जाते थे।
प्रमुदित मन में निरख प्रकति, छठा को वे होते है।।
रंग-बिरंगे पुष्प बाग के, मंद-मंद हिल-डुल करके।
बीहड़ वीराने मन में भी स्नेह सलील भर जाते थे।।

ऐसी सुमधुर बेला में भी, दुख आपद विपदा के मारे।
अपने मन की व्यथा सुनने, जान रहते बाबा को घेरे।।
सुनकर जिनकी करुण कथा को, नयन कमल भर आते थे।
दे विभूति हर व्यथा, शान्ती,उनके उर में भर देते थे।।

जाने क्या आधृत शक्ति, उस विभूति में होती है।
जो धारण करते मस्तक पर, दुख सारा हर लेती थी।।
धन्य मनुज वे साक्षात दर्शन, जो बाबा साई के पाए।
धन्य कमल कर उनके जिनसे,चरण-कमल वे परसाये।।

काश निर्भय तुमको भी, साक्षात साई मिल जाता।
बरसों से उजड़ा चमन अपना, फिर से खिल जाता।।
गर पकड़ता मैं चरण श्री के नहीं छोड़ता उम्र भर।
मना लेता मैं जरूर उनको, गर रूठते साई मुझ पर।।

।। इति श्री साई चालीसा।।

पढ़ें -