विधिशास्त्र और कानूनी सिद्धांत - Jurisprudence and Legal Theory in Hindi

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा समूह में रहना उसकी नैसर्गिक प्रवृत्ति है। यह नैसर्गिक प्रवृत्ति मनुष्य को अन्य मनुष्यों से सम्बन्ध रखने को बाध्य करती है। सामाजिक जीवन इन्हीं संबंधों पर आधारित है। इन सामाजिक संबंधों को व्यवस्थित रखने के लिए मनुष्य के व्यवहार पर नियंत्रण रखना आवश्यक होता है। यही कारण है कि विधि या उन नियमों का जन्म हुआ जो मनुष्य के आचरण को नियंत्रित एवं सुव्यवस्थित रख सकें तथा समाज में शान्ति व्याप्त हो सके। विधि के नियम मनुष्य के पारस्परिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक है। विधिक नियमों का जन्म किस प्रकार हुआ इस पर व्यापक मतान्तर हैं। कुछ विधिशास्त्री विधि के नियमों को दैवीय मानते हैं तथा कछु इनको प्राकृतिक की संज्ञा देते हैं। आधुनिक यगु में विधिक नियमों का निर्माण राज्य द्वारा किया जाता है। राज्य, विधिक नियमों के माध्यम से नागरिकों को उनके कर्तव्यों एवं अधिकारों का बोध कराते हैं तथा अनुचित आचरण एवं व्यवहार के लिए दंडित करते हैं। तात्पर्य है कि विधि एक ऐसा माध्यम है जिसकी सहायता से राज्य नागरिकों के आचरण, संव्यवहार तथा क्रिया कलाप पर नियंत्रण रखते हुए समाज में शान्ति व्यवस्था, की स्थापना तथा न्याय प्रदान करता है।

विधिशास्त्र की परिभाषा

विधिशास्त्र’ शब्द की उत्पत्ति दो लैटिन शब्दों ‘ज्यूरिस’ (Juris) और ‘पूडेंशिया’ (Prudentia) के योग से हुई है। ‘ज्यूरिस’ शब्द का तात्पर्य ‘विधि’ से है जबकि ‘पूडेंशिया’ शब्द का अर्थ है ‘ज्ञान’। इस प्रकार शाब्दिक अर्थ के अनुसार विधिशास्त्र (Jurisprudence) को विधि का ज्ञान’ ही कहा जाना चाहिए। परन्तु यथार्थ में यह विधि का ज्ञान मात्र न होकर विधि का क्रमबद्ध ज्ञान है इसीलिये सामण्ड (Salmond) ने विधिशास्त्र को ‘विधि का विज्ञान’ (Science of Law) निरूपित किया है। यहाँ ‘विज्ञान’ से आशय विषय के क्रमबद्ध अध्ययन से है। मोयली (Moyle) के मतानुसार विधिशास्त्र का अन्तिम लक्ष्य साधारणत: वही है। जो किसी अन्य विज्ञान का होता है। यही कारण है कि विधिशास्त्र को विधि-सिद्धान्तों का सूक्ष्म एवं गहन क्रमबद्ध अध्ययन कहा जाता है।

पढ़ें - विधिक अधिकार और कर्तव्य - Legal Rights and Duties in Hindi - Jurisprudence

विधिशास्त्र क्या होता है?

विधिशास्त्र को समझने से पहले हमें विधि के बारे में जानकारी लेना आवश्यक है। विधि का अध्ययन करना हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है विधि एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा राज्य अपने नागरिकों के व्यवहार और आचरण गतिविधि पर नियंत्रण रखता है। पुराने समय में यह नियंत्रण सरकार के हाथों में न होकर राजा के हाथ में होता था और राजाओं के हाथ में पावर होने के कारण और उन राजाओं की बुद्धि या दिमाग पर निर्भर करता था, यानी कि किस अपराध के लिए कौन सी सजा और कौन सा दंड देना चाहिए यह तय करने का अधिकार राजा के पास होता था तथा वे अपने विवेकानुसार निर्णय लेते थे।

राजा के बनाए नियम कानून अपनी राज्य की सीमा में आने वाली प्रजा के ऊपर लागू होता था। राजा कैसे अपनी प्रजा के आचरणों को नियंत्रण में रखता है या नियंत्रण करता है यह खुद राजा के ऊपर निर्भर होता था। वर्तमान समय में भारतीय शासन के ऊपर पूरा नियंत्रण केंद्र व राज्य सरकार का है। इन दोनों सरकारों के बीच में शक्ति का संतुलन बनाने के लिए संविधान में प्रावधान किए गए है। भारत में कानून बनाने के लिए राज्य तथा केंद्र दोनों को अधिकार प्राप्त है। संविधान में केंद्र और राज्य संबंध को लेकर तीन तरह की सूचियां हैं: संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची

संघ सूची में केंद्र सरकार का अधिकार क्षेत्र बताया गया है। इसमें दिए गए विषयों पर केंद्र सरकार कानून बनाती है। राज्य सूची में उल्लिखित विषयों पर राज्य सरकार कानून बनाती है। हालांकि, राष्ट्रीय हित का कोई मसला हो तो राज्य के क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप करते हुए केंद्र सरकार भी कानून बना सकती है। जबकि समवर्ती सूची के तहत दिए गए विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों सरकारें कानून बना सकती हैं। हालांकि, समवर्ती सूची के तहत उल्लिखित विषयों में से किसी एक विषय पर अगर राज्य एवं केंद्र दोनों कानून बनाते हैं तो केंद्र सरकार का कानून ही मान्य होता है। राज्य ने किसी विषय पर अगर कानून बना दिया है और इसके बाद केंद्र सरकार भी उसी विषय पर कानून बना दे तो राज्य द्वारा बनाया हुआ कानून केंद्र सरकार के कानून के अमल में आते ही स्वत: समाप्त हो जाता है। शिक्षा, स्वास्थ्य आदि विषय इसी सूची में हैं। वर्तमान समय में यदि लोगों के व्यवहार या उसके आचरण पर नियंत्रण करना हैं तो यह सभी शक्तियां केंद्र में समाहित हैं। सरकार विधि के द्वारा अपनी प्रजा के व्यवहार या उसके आचरण को नियंत्रित करती हैं।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है विधिशास्त्र का सम्बन्ध विधि के मूलभूत सिद्धान्तों से है तथा विभिन्न विधिवेत्ताओं ने विधिशास्त्र की अलग-अलग परिभाषायें दी हैं।

पढ़ें - संघवाद क्या है? संघवाद की मुख्य विशेषताएं। Federalism in India – Federal Features of Indian Constitution

प्रसिद्ध रोमन विधिवेत्ता अल्पियन (UIpian) ने अपनी पुस्तक ‘डायजेस्ट’ में विधिशास्त्र को उचित एवं अनुचित का विज्ञान (Science of just and unjust) कहा है। यह परिभाषा ‘विधिशास्त्र’ शब्द की उत्पत्ति की अनुकूलता पर प्रकाश डालती है, परन्तु यह इतनी अधिक व्यापक है कि इसे नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र आदि के प्रति भी लागू किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि अल्पियन (Ulpian) द्वारा दी गई विधिशास्त्र की परिभाषा तथा अर्वाचीन भारत के धर्म की संकल्पना में निकटतम साम्य है। हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार ‘धर्म’ मानव-आचरण के ऐसे नियमों का विधान है, जो मनुष्य को भौतिक या आध्यात्मिक विकास की ओर प्रेरित करता है। परन्तु वर्तमान काल के संदर्भ में विधिशास्त्र’ का अर्थ मानव के ऐसे कार्यों तथा सम्बन्धों तक ही सीमित है जिन्हें प्राचीन हिन्दू विधिशास्त्रियों ने ‘व्यवहार’ की संज्ञा दी है। विधिशास्त्र ऐसे नियमों में निहित सिद्धान्तों की विवेचना करता है जिन्हें न्यायालयों द्वारा अपने निर्णयों में प्रयुक्त किया जाता है।

प्रसिद्ध दार्शनिक सिसरो (Cicero) ने विधिशास्त्र की परिभाषा देते हुये इसे ज्ञान का दार्शनिक पक्ष’ कहा सामंड (Salmond) के अनुसार प्राथमिक दृष्टि से विधिशास्त्र में समस्त कानूनी सिद्धांतों का समावेश है। यह विधि का ज्ञान है, इसलिये इसे व्यावहारिक विधि के प्राथमिक सिद्धान्तों का विज्ञान भी कहा गया है। सामंड के विचार से विधि न्यायशास्त्रियों द्वारा लागू की जाती है तथा यह धार्मिक कानून या नैतिकता सम्बन्धी नियमों से भिन्न है। विधि को देश-विदेश की सीमा में न्यायालय तथा न्यायाधिकरणों द्वारा लागू किया जाता है। तथा इसका उल्लंघन किया जाने पर शास्ति (Sanction) की व्यवस्था होती है, अत: यह व्यावहारिक ज्ञान की शाखा है।

सामंड (Salmond) ने विधिशास्त्र की व्याख्या दो अर्थों में की है। विस्तृत अर्थ में विधिशास्त्र से उनका अभिप्राय नागरिक विधि के विज्ञान (Science of civil law) से है, जिसके अन्तर्गत समस्त विधिक सिद्धान्तों का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है। सिविल विधि से उनका आशय उस विधि विशेष से है जो किसी देश द्वारा अपने निवासियों के प्रति लागू की जाती है और जिसे उस देश के नागरिक, अधिवक्ता और न्यायालय मानने के लिये बाध्य होते हैं। इस प्रकार सामंड के अनुसार विधिशास्त्र ऐसी विधियों का विज्ञान है जिन्हें न्यायालय लागू करते हैं।

पढ़ें - हिंदू विवाह (Hindu Marriage) | Family Law | Hindu Law

सामंड ने सिविल विधि के विज्ञान के रूप में विधिशास्त्र के निम्नलिखित तीन रूप बताये हैं।

1. विधिक प्रतिपादन (Legal exposition)

इसका प्रयोजन किसी काल-विशेष में प्रचलित वास्तविक विधि की विषय-वस्तु का वर्णन करना है।

2. वैधानिक इतिहास (Legal history)

इसका प्रयोजन उस ऐतिहासिक कार्यवाही का वर्णन करना है जिससे विधि-प्रणाली विकसित होते हुए वर्तमान अवस्था को प्राप्त हुई है।

3. विधायन विज्ञान (Science of legislation)

इसका उद्देश्य विधि का इस प्रकार निरूपण करना है, जैसी कि वह होनी चाहिए।

आंग्ल विधिशास्त्री जॉन ऑस्टिन (John Austin) ने विधिशास्त्र को ‘वास्तविक विधि का दर्शन’ कहा है। उनके मतानुसार विधिशास्त्र का वास्तविक अर्थ है विधिक संकल्पनाओं का प्रारूपिक विश्लेशण करना (Formal analysis of legal concepts) परन्तु बुकलैंड (Buckland) ने ऑस्टिन की इस परिभाषा को अत्यन्त संकीर्ण मानते हुए कहा है कि वर्तमान समय में विधिशास्त्र की परिभाषा अधिक विस्तृत होनी चाहिए। इस दृष्टि से जूलियस स्टोन (Julius Stone) द्वारा दी गयी परिभाषा अधिक तर्कसंगत प्रतीत होती है। उन्होंने विधिशास्त्र को ‘अधिवक्ताओं की बाह्यदर्षिता’ (Lawyer’s extroversion) निरूपित किया है। इसका आशय यह है कि वर्तमान ज्ञान के अन्य स्रोतों के आधार पर अधिवक्तागण विधि की अवधारणाओं, आदर्शों तथा पद्धतियों का जो परीक्षण करते हैं, उसे विधिशास्त्र की विषय-वस्तु कहा जा सकता है। जूलियस स्टोन ने विधिशास्त्र की विषय-वस्तु को तीन वर्गों में विभक्त किया है जिन्हें क्रमश: (1) विश्लेशणात्मक विधिशास्त्र, (Analytical Jurisprudence), (2) क्रियात्मक विधिशास्त्र (Functional Jurisprudence) तथा (3) न्याय के सिद्धान्त कहा गया है।

हालैंड (Holland) ने विधिशास्त्र को वास्तविक विधि का औपचारिक विज्ञान (formal science of positive law) निरूपित किया है। इस विषय के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने विधिशास्त्र को विधि के प्रचलित नियमों, विचारों तथा सुधारों से सम्बन्धित शास्त्र माना है। उनका विचार है कि ‘‘विधिशास्त्र भौतिक नियमों की बजाय विधि के नियमों द्वारा शास्ति होने वाले मानवीय व्यवहारों से ही अधिक सम्बन्ध रखता है।’’

पढ़ें - प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत । Principle of Natural Justice

विधिशास्त्र विधि का नेत्र है (Jurisprudence is an eye of law)

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि विधिशास्त्र की मूल विषयवस्तु विधि है जिसके अन्तर्गत विधि सम्बन्धी धारणायें एवं सिद्धान्तों की व्याख्या की गयी है तथा विधि के विभिन्न स्रोतों और उद्देश्यों का अध्ययन किया जाता है। इसीलिये विधिशास्त्र की प्रमाणवादी विचारधारा के समर्थकों ने विधिशास्त्र को विधि के नेत्र की संज्ञा दी है, अर्थात् जिस प्रकार मानव शरीर में नेत्र का महत्व है और नेत्र-ज्योति के आधार पर मानव उचित-अनुचित की अनुभूति करता है, उसी प्रकार विधिशास्त्र के अन्तर्गत विधि के ज्ञान से व्यक्ति को समाज में अपने आचरण के औचित्य या अनौचित्य की जानकारी मिलती है और विधि के अनुसरण की ओर अग्रसर होता है। आशय यह है कि मानव शरीर में जो महत्व नेत्र को प्राप्त है वही महत्व विधिशास्त्र में विधि को है क्योंकि विधिशास्त्र की समस्त विषयवस्तु ही विधि से सम्बन्धित है।

विधिशास्त्र की विषय-वस्तु

विधिशास्त्र की विषय-वस्त में विधि (Law) तथा उससे सम्बन्धित विभिन्न संकल्पनाओं का समावेश है। विधिशास्त्र का मूल उद्देश्य विधि की उत्पत्ति, प्रगति, विकास एवं कार्यों (functions) का अध्ययन करना है। दूसरे शब्दों में, इस शास्त्र के अन्तर्गत विधि की प्रकृति और उसके विभिन्न तत्वों की विवेचना की जाती हैं। तथा उसके विभिन्न स्रोतों और उद्देश्यों का अध्ययन किया जाता है।

विधिशास्त्र के प्रति विधिशास्त्रियों के विचारों में सदैव ही भिन्नता रही है। परिणामत: इस शास्त्र की विषय-वस्तु इसके प्रति अपनाये गये दृष्टिकोण की विशिष्टता पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिये, विधिशास्त्र के प्रति विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण अपनाने वाले विचारकों के अनुसार इस शास्त्र के अन्तर्गत नागरिक विधि तथा अन्य प्रकार की विधियों के परस्पर सम्बन्धों पर विचार किया जाता है और इस विधि के प्रमुख तत्वों जैसे राज्य, संप्रभुता तथा न्याय-प्रशासन आदि का विश्लेषण किया जाता है। इसमें विधि के विभिन्न स्रोतों की विवेचना की जाती है और वैधानिक अधिकार, व्यावहारिक एवं आपराधिक दायित्व, सम्पत्ति, स्वामित्व, आधिपत्य, आभार, संविदा और वैधानिक व्यक्तित्व आदि विधिक संकल्पनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाता है।

विधि के ऐतिहासिक पहलू पर महत्व देने वाले विधिवेत्ता विधिशास्त्र में विधि के ऐतिहासिक स्वरूप को प्रधानता देते हैं तथा उन सामान्य सिद्धान्तों की विवेचना करते हैं जो विधि की उत्पत्ति तथा विकास के लिये करणीभूत हुये हैं। विधि के प्रति नैतिक दृष्टिकोण अपनाने वाले विधिशास्त्री विधिशास्त्र के अन्तर्गत न्याय और विज्ञान के परस्पर सम्बन्धों तथा न्याय की स्थापना के लिये अपनाये जाने वाले मूलभूत सिद्धान्तों के अध्ययन पर विशेष बल देते हैं। वर्तमान में विधिशास्त्र के प्रति समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण को। अधिक महत्व दिया जा रहा है। तदनुसार विधिशास्त्र के अन्तर्गत मानव के उन सभी संव्यवहारों तथा क्रियाकलापों का समावेश है, जिन्हें विधि द्वारा निदेशित किया जाता है। इस दृष्टि से विधिशास्त्र के अन्तर्गत उन । सभी विधियों के मूलभूत सिद्धान्तों का अध्ययन समाविष्ट है जो समाज में न्याय की स्थापना के लिये लागू किये जाते हैं।

पढ़ें - अपील | Appeal | CrPC Chapter 29 Sec. 372-394 | दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 | Criminal Procedure Code 1973