दान (Gift) धारा 122 से 129 - सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम - Transfer of property Act 1882 in Hindi

प्रावधान

सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम 1882 (Tranfer of property Act 1882) के अध्याय ७ में धारा १२२ से १२९ तक में दान के बारे में विस्तृत विवरण दिया गया है। परिभाषा:- धारा १२२ दान (Gift) को परिभाषित करती है, जिसके अनुसार दान किसी वर्तमान, चल या अचल सम्पत्ति का वह अन्तरण है, जो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को स्वेच्छा और प्रतिफल के बिना किया गया है, तथा दूसरा व्यक्ति उस सम्पत्ति को प्रतिगृहीत कर ले। सम्पत्ति देने वाला दाता (Donor) तथा प्रतिगृहीत करने वाला आदाता (Donee) कहा जाता है। “प्रतिफल” से मतलब यह की किसी एक वस्तू के बदले में दूसरी वस्तु का लेना।

दान में दो पक्षों का होना आवश्यक है।

  1. दाता: दान देने वाले व्यक्ति को दाता /दानकर्ता दोनों नामों से जाना जाता है।
  2. आदाता: दान लेने वाले व्यक्ति को आदाता कहा जाता है जो की दान की स्वीकृति करता है। या दान की संपत्ति आदाता की ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा स्वीकार किया है।

ध्यान रखने योग्य बातें

  1. दान में मिल रही चल या अचल संपत्ति की स्वीकृति दानकर्ता के जीवन काल के दौरान या उस समयावधि के भीतर की जानी आवश्यक है, जब तक दानकर्ता दान देने लिए सक्षम है।
  2. यदि आदाता द्वारा सम्पत्ति के प्रतिग्रहण के पूर्व दाता की मृत्यु हो जाती है, तो ऐसी स्थिति में हुआ दान शून्य होगा।
  3. दान उदारता का एक कार्य होता है जो किसी कानूनी दायित्व को पूरा करने के लिए नहीं किया जाता है और यह न ही इस आशय से दिया जाता है कि आदाता पर किसी प्रकार का दायित्व या भार सृजित हो।
  4. दान एक ऐसा कार्य होता है जिसका उद्देश्य अन्तरिती को प्रत्येक दशा में फायदा करना होता है।

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दान के प्रकार (Types of Gift)

दान तीन प्रकार का हो सकता है-

  1. जीवित दाता द्वारा जीवित आदाता को दान,
  2. मृत्यु-शैय्या पर मृत्यु की आशंका में किया गया दान,
  3. वसीयत द्वारा दान।

मृत्यु-शैय्या पर दिए गये दान एवं वसीयती दान के मामलों में सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम लागू नहीं होता।

दान के आवश्यक तत्व

  1. दाता: दाता से आशय उस व्यस्क व्यक्ति से है जो की जो की दान देने में सक्षम है और अपनी चल या अचल सम्पत्ति का अंतरण अपनी स्वेछा से करता है, उस व्यक्ति को दाता या दानकर्ता कहा जायेगा।
  2. आदाता: आदाता से आशय उस निश्चित व्यक्ति से है, जिसको दान दिया जाना है या जिसको दान दिया गया है या वह व्यक्ति जो की आदाता की ओर से दान स्वीकार करता है या जिसके द्वारा दान का स्वीकार किया जाना है। वह व्यक्ति आदाता कहा जायेगा।
  3. प्रतिफल का आभाव: एक वैध दान का आवश्यक तत्व यह भी है की, दान में प्रतिफल का आभाव होना जरुरी है। प्रतिफल का आभाव होने से मतलब यह की जब भी किसी चल या अचल सम्पति का दान किया जाये तो वह दान प्रतिफल के बिना हो, दान के बदले किसी अन्य वस्तु की मांग न की जाये।
  4. स्वेछा: दान के लिए यह आवश्यक है, कि स्वेछा से दिया गया हो न की किसी के दबाव में आकर। यदि कोई व्यक्ति अपनी चल या अचल स्थावर सम्पति का दान किसी जोर दबाव में आकर करता है, तो वह दान एक शून्य दान होगा।
  5. विषय वस्तु: दान के लिए विषय वास्तु का होना बहुत आवश्यक है। विषय वस्तु ऐसी चल या अचल स्थावर सम्पति हो सकती है जो की निश्चित हो और ऐसी सम्पत्ति का अस्तित्व में होना आवश्यक है। दान में दी जाने वाले सम्पत्ति का वर्तमान में अस्तित्व होना जरुरी है भावी सम्पत्ति का दान शून्य होगा।
  6. अंतरण: दान में अंतरण एक मत्वपूर्ण तत्व होता है, दानकर्ता जब भी अपनी कोई चल या अचल स्थावर सम्पति का दान करता है, तो दान की जाने वाली सम्पति दानलेने वाले व्यक्ति के नाम सम्पूर्ण अधिकारों को अंतरित कर दे।
  7. स्वीकृति: दानकर्ता द्वारा दान में दी गयी संपत्ति की स्वीकृति दानलेने वाले व्यक्ति द्वारा की जानी आवश्यक है। यदि दानकर्ता ऐसा दान किसी बालक को करता है, जो की दान लेने में असक्षम, तो ऐसे दान की स्वीकृति उस बालक के संरक्षक के द्वारा की चाहिए। दान की स्वीकृति दानकर्ता के जीवनकाल के उस समय कर लेनी चाहिए जब दानकर्ता दान करने के लिए सक्षम है।

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दान की प्रमुख विशेषताएं

  1. सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम के अन्तर्गत दान की अवधारणा चल तथा अचल दोनों सम्पत्तियों के विषय में लागू होती है।
  2. अधिनियम के दान सम्बन्धी सिद्धान्त मुस्लिम विधि के अन्तर्गत होने वाले दान संव्यवहारों में उस स्थिति में नहीं लागू होंगे जब अधिनियम की व्यवस्था एवं मुस्लिम विधि की व्यवस्था में कोई स्पष्ट विषमता हो।
  3. दान सामान्यत: अखण्डनीय ही माना गया है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में इसके विखण्डन की अवधि तीन वर्ष निश्चित की गयी है।

दान करने वाले दाता की योग्यताएं

  1. दाता बालिग हो
  2. वह स्वस्थ मस्तिष्क वाला हो
  3. वह किसी प्रकार की अक्षमता का शिकार न हो।
  4. दाता को दान दी जाने वाली सम्पत्ति का स्वामी होना चाहिए या सम्पत्ति के असली स्वामी से दान करने का प्राधिकार रखता हो।

आदाता के लिए योग्यताएं

  1. उसे केवल जीवित होने चाहिए यदि वह स्वस्थ मस्तिष्क एवं वयस्क हो तो अच्छी बात है और वह दान को स्वीकार कर सकता है और यदि ऐसा नहीं है, तो उसका संरक्षक दान को स्वीकार कर सकता है। अदाता विधिक व्यक्ति भी हो सकता हैं।
  2. आदाता निश्चित होना चाहिए। अर्थात् दान सामान्य जनता के पक्ष में नहीं किया जा सकता।

दान में पंजीकरण का महत्व

  1. अचल सम्पत्ति का दान बिना रजिस्ट्री के अवैध माना जायेगा। जबकि चल सम्पत्ति का दान बिना रजिस्ट्री के कब्जे के परिदान द्वारा संभव है। पंजीकरण दाता या आदाता या दोनों की मृत्यु के बाद भी सम्भव है। पंजीकरण दाता की इच्छा के विपरीत भी कराया जा सकता है।
  2. पंजीकरण अधिनियम की धारा ३४, ३५, ५८, ५९ की औपचारिकताओं की पूर्ति ही दान संव्यवहार की आवश्यक शर्त है।
  3. सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम में पंजीकरण से सम्बन्धित व्यवस्था आदेशात्मक है।
  4. बिना हस्ताक्षर के दान वैध नहीं होगा। उसके हस्ताक्षर को कम से कम दो व्यक्तियों के द्वारा अनुप्रमाणित होना चाहिये।

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मौखिक दान

  1. सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम- १८८२ में अचल सम्पत्ति के मौखिक दान का कोई उल्लेख नहीं है। मौखिक दान केवल चल सम्पत्ति का हो सकता है।
  2. मुस्लिम विधि में चल एवं अचल दोनों सम्पत्तियों का मौखिक दान हो सकता है। मुस्लिम विधि में कब्जा अनिवार्य है।

अंतरण कैसे किया जाता है: धारा 123 के अनुसार

  1. अचल सम्पत्ति का दान पंजीकृत विलेख द्वारा ही संभव है, चाहे सम्पत्ति की मालियत कुछ भी हो।
  2. दान विलेख पर दाता का या उसके किसी मान्य प्रतिनिधि का हस्ताक्षर होना चाहिए।
  3. कम से कम दो व्यक्तियों द्वारा दान विलेख का अनुप्रमाणन होना चाहिए।

ए० सी० डिसूजा व अन्य बनाम फर्नांडीज एवं अन्य AIR १९९८ केरल, २८०के वाद में यह कहा गया कि दान एक दस्तावेज पर होता है जिसमें दो प्रमाणन साक्षीगण की अपेक्षा होती है। जहाँ ऐसा कोई सबूत नहीं होता है कि विवादित दान विलेख दो साक्षीगण द्वारा अभिप्रमाणित था, वहाँ दान अवैध होता है।

वर्तमान और भावी सम्पत्ति का दान

धारा 124 के अनुसार जिस दान में वर्तमान व भावी सम्पत्ति दोनों समाविष्ट हो वह भावी सम्पत्ति के विषय में शून्य है। धारा १२४ में वर्तमान तथा भविष्य में प्राप्त होने वाली सम्पत्तियों का मिश्रित दान को अंशत: वैध माना गया है। दान केवल भविष्य में स्थिति पाने वाली सम्पत्तियों के लिए अवैध होगा।

ऐसे कई व्यक्तियों को दान, जिसमें से एक प्रतिगहीत नहीं करता है

धारा 125 के अनुसार ऐसे दो या अधिक आदाताओं को किसी वस्तु का दान जिनमें से एक उसे प्रतिगृहीत नहीं करता है, उस हित के सम्बन्ध में शून्य है जिसे यदि वह प्रतिगृहीत करता, तो वह लेता।

कब दान को निलंबित या निरस्त किया जा सकता है

धारा 126 उन परिस्थितियों का विवरण देती है जिनमें दान का निलंबन या रद्द हो जाता है। दान का विखण्डन निम्नलिखित ढंग से संभव है- करार द्वारा: जबकि स्पष्ट करार हो। यह करार दान के समय ही होना चाहिए। करार द्वारा दोनों पक्षकार यदि चाहे तो दाता को अधिकार दिया जा सकता है कि किसी ऐसी घटना जिस पर कि दाता का कोई नियन्त्रण न हो, के घटित होने पर दान शून्य होगा। ऐसी घटना पर आधारित विखण्डन का अधिकार वैध होगा। विधि द्वारा: जहाँ दान अनुचित दबाव में, कपट या मिथ्या व्यपदेशन (Misinterpretation) या भूल की स्थिति में किया गया हो तो वह दान खण्डित किया जा सकेगा।

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दृष्टांत

  1. A ने B को एक खेत दान में दिया। दान होने के समय यह शर्त रखी गयी कि यदि B, A के जीवन काल में ही नि:सन्तान मर जाय तो दान शून्य होगा। B की १० साल बाद नि: सन्तान अवस्था में मृत्यु हो गयी। इस दान को खण्डित किया जा सकेगा।
  2. ख को क एक लाख रुपया, ख की अनुमति से अपना यह अधिकार आरक्षित करते हुए देता है कि वह उन लाख रुपयों में से, 10,000 रुपए जब जी चाहे वापस ले सकेगा। 90,000 रुपयों के बारे में दान वैध है, किन्तु 10,000 रुपयों के बारे में, जो क के ही बने रहते हैं, शून्य है।

दुर्भर दान

धारा 127 में दुर्भर दान का विवरण दिया गया है। इसके अनुसार यदि किसी दाता ने किसी आदाता को कोई ऐसी सम्पत्ति दान में दी हो जिस पर कुछ आभार भी हो तथा इससे लाभ भी हो तो भारयुक्त ऐसी उपलब्धि दुर्भर दान कही जाती है। दुर्भर दान में सामान्य दान के सभी तत्वों की उपस्थिति आवश्यक है। तथा जिसका नियन्त्रण सामान्य दान में लागू होने वाले सिद्धान्त द्वारा ही होता है।

दुर्भर दान के सिद्धान्त का निरूपण धारा १२७ के प्रथम पैराग्राफ में किया गया है जिसका आधार भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा १२२ मे स्वीकृत नियम कहा जा सकता है, जिसका सम्बन्ध वस्तुत: वसीयती दान से है। दुर्भर दान की सबसे प्रथम शर्त आदाता है जो केवल एक ही व्यक्ति हो सकता है। सामान्य दान में एक साथ कई व्यक्ति आदाता हो सकते हैं। दुर्भर दान उसी स्थिति में होगा जबकि एक ही एवं उसी आदाता को ऐसी कई सम्पत्तियाँ दान की गयी हों जिनमें से कुछ भारग्रस्त हो तथा अन्य भाररहित हो। धारा १२७ में उस स्थिति के बारे में बताया गया है जब कोई व्यक्ति दान एक ही करे लेकिन उसमें कई सम्पत्तियाँ शामिल हों, जिनमें कुछ पर आभार एवं दायित्व हो तथा कुछ स्वतन्त्र एवं बिना भार के हो। दान दी जाने वाली सम्पत्ति भारयुक्त होना चाहिए।

भारग्रस्त एवं भार रहित सम्पत्तियाँ एक ही संव्यवहार द्वारा दान की जानी चाहिए। भारयुक्त एवं भाररहित सम्पत्तियों का उसी व्यक्ति को पृथक-पृथक दान दुर्भर दान की स्थिति को जन्म नहीं देगा। अधिनियम की धारा १२७ के द्वितीय भाग में निहित सिद्धान्त का आधार भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा १२३ है जिसमें दुर्भर दान के द्वितीय स्वरूप का वर्णन है। इसके अनुसार एक ही व्यक्ति को कई सम्पत्तियों का दान स्वतन्त्र रूप से अलग-अलग हिबानामों द्वारा दिया गया हो तो प्रत्येक दान स्वतन्त्र अन्तरण होगा। आदाता ऐसी स्थिति में स्वतन्त्र होगा कि लाभ देने वाला स्वतन्त्र दान ले ले और दायित्व डालने वाला दान अस्वीकार कर दे। दूसरे भाग में दान के कई अन्तरण- विलेख होंगे जिसके द्वारा अनेक सम्पत्तियों का पृथक स्वतन्त्र दान किया जायेगा।

सर्वस्व आदाता

धारा 128 में सर्वस्व आदाता के बारे में विवरण दिया गया है। इस धारा के प्रावधानों के अनुसार सम्पूर्ण सम्पत्ति स्वीकार करने वाला आदाता दाता के सभी ऋणों और भारों के लिए दायित्वाधीन हो जाता है। यदि सर्वस्व आदाता दानगृहीता (Universal Donee) अवस्यक है, तो वह किसी भी प्रकार से दायित्वाधीन नहीं होगा। जब तक कि वह वयस्कता प्राप्त कर लेने के बाद, सम्पत्ति को ग्रहण नहीं कर लेता।

सर्वस्व आदाता वह व्यक्ति है, जिसे दाता की सारी जायदाद दान में मिल चुकी हो। यह स्थिति सामान्यता उस समय उत्पन्न होती है जबकि दाता संन्यास ले ले या संसार का परित्याग कर दे। दाता के पास चल या अचल कोई सम्पत्ति अवशेष नहीं बचनी चाहिये। सर्वस्व आदाता दान के द्वारा प्राप्त सम्पत्ति की सीमा तक दाता के ऋणों के लिए जिम्मेदार होता है। उसे इस सम्पत्ति का प्रयोग तब तक दाता के ऋणों को चुकाने में करना होगा, जब तक कि उसकी पूर्ण संतुष्टि न हो जाय।

अधिनियम की धारा १२९ में दो अपवाद दिये गये हैं, जिन पर धारा १२२ से १२८ तक की कोई व्यवस्था लागू नहीं होगी। ये अपवाद इस प्रकार हैं-

  1. आसन्न मरण दान
  2. मुस्लिम विधि में हिबा।

मुस्लिम विधि में संपत्ति को हिबा के माध्यम से दान किया जा सकता है। हिबा, दान और गिफ्ट का ही एक रूप है जिसमें कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति को किसी अन्य को दान करता है। कोई भी व्यक्ति अपने द्वारा अर्जित की गयी संपत्ति को किसी अन्य को जितनी चाहे उतनी हिबा कर सकता है।

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