निर्देश और पुनरीक्षण Reference and Revision - CrPC Chapter 30 Section 395-405

निर्देश (Reference) का तात्पर्य है, “यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा अधीनस्थ न्यायालय किसी विधि के प्रश्न पर सम्बंधित उच्च न्यायालय से परामर्श प्राप्त करती है। पुनरीक्षण (Revision) को इस संहिता द्वारा परिभाषित नही किया गया है किन्तु उसे निम्नवत परिभाषित किया जा सकता है –“पुनरीक्षण न्यायालय की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा न्यायालय दण्डादेश की वैधता इत्यादि की परीक्षा करती है।”**पुनरीक्षण न्यायालय निम्न मामलों के सन्दर्भ में पुनरीक्षण शक्ति का प्रयोग नही कर सकती है–**1. धारा 397(2) के अनुसार अंतरवर्ती आदेशो पर पुनरीक्षण शक्ति का प्रयोग नही हो सकता।2. धारा 401(3) के अनुसार पुनरीक्षण न्यायालय दोषमुक्ति के आदेश को दोषसिद्धि में परिवर्तित नही कर सकता।

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अध्याय 30 में पुनरीक्षण (Revision) के संबंध में प्रावधान किए गए हैं। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 397 के अंतर्गत उच्च न्यायालय और सेशन न्यायालय को पुनरीक्षण की शक्तियां दी गयी हैं। इस शक्ति के अधीन उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा की गयी कार्यवाही के अभिलेखों (Records) को मंगवा सकता है तथा उसका परीक्षण कर सकता है। इस तरह के अभिलेखों को मंगवाने के बाद अधीनस्थ न्यायालय के आदेश के निष्पादन को निलंबित भी रख सकता है।

उच्च न्यायालय को निर्देश (Reference to High Court)

धारा 395

(1) जहां किसी न्यायालय का समाधान हो जाता है कि उसके समक्ष लंबित मामले में किसी अधिनियम, अध्यादेश या विनियम की अथवा किसी अधिनियम, अध्यादेश या विनियम में अन्तर्विष्ट किसी उपबंध की विधिमान्यता के बारे में ऐसा प्रश्न अन्तर्ग्रस्त है, जिसका अवधारण उस मामले को निपटाने के लिए आवश्यक है, और उसकी यह राय है कि ऐसा अधिनियम, अध्यादेश, विनियम या उपबंध अविधिमान्य या अप्रवर्तनशील है किन्तु उस उच्च न्यायालय द्वारा, जिसके वह न्यायालय अधीनस्थ है, या उच्चतम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित नहीं किया गया है वहां न्यायालय अपनी राय और उसके कारणों को उल्लिखित करते हुए मामले का कथन तैयार करेगा और उसे उच्च न्यायालय के विनिश्चय के लिए निर्देशित करेगा।

स्पष्टीकरण: इस धारा में “विनियम” से साधारण खंड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) में या किसी राज्य के साधारण खंड अधिनियम में यथापरिभाषित कोई विनियम अभिप्रेत है।

(2) यदि सेशन न्यायालय या महानगर मजिस्ट्रेट अपने समक्ष लंबित किसी मामले में, जिसे उपधारा (1) के उपबंध लागू नहीं होते। हैं, ठीक समझता है तो वह, ऐसे मामले की सुनवाई में उठने वाले किसी विधि-प्रश्न को उच्च न्यायालय के विनिश्चय के लिए निर्देशित कर सकता है।

(3) कोई न्यायालय, जो उच्च न्यायालय को उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन निर्देश करता है, उस पर उच्च न्यायालय का । विनिश्चय होने तक, अभियुक्त को जेल को सुपुर्द कर सकता है या अपेक्षा किए जाने पर हाजिर होने के लिए जमानत पर छोड़ सकता है।

निर्देश का प्रभाव

उपरोक्त शर्त के पूर्ण होने पर अधीनस्थ न्यायालय उच्च न्यायालय को मामला सौप देगी और निर्देश लंबित रहने के दौरान अपनी कार्यवाही को रोक देगी और यदि अभियुक जेल में है तो न्यायालय उसे जमानत पर छोड़ देगी।

निर्देश के पश्चात प्रक्रिया

धारा 396(1) के अनुसार अधीनस्थ न्यायालय जिसके अनुसार निर्देश किया गया था उच्च न्यायालय के दिशा निर्देशानुसार मामले को निपटाएगी।

धारा 396(2) के अंतर्गत उच्च न्यायालय निदेश दे सकता है कि ऐसे निदेश का खर्चा कौन देगा।

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पुनरीक्षण की शक्तियों का प्रयोग करने के लिए अभिलेख मंगाना (Calling for Records to Exercise Powers of Revision) - धारा 397

उच्च न्यायालय या कोई सेशन न्यायाधीश अपनी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर स्थित किसी अवर दण्ड न्यायालय के समक्ष किसी कार्यवाही के अभिलेख को, किसी अभिलिखित या पारित किए गए निष्कर्ष, दण्डादेश या आदेश की शुद्धता, वैधता या औचित्य के बारे में और ऐसे अवर न्यायालय की किन्हीं कार्यवाहियों की नियमितता के बारे में अपना समाधान करने के प्रयोजन से, मंगा सकता है और उसकी परीक्षा कर सकता है और ऐसा अभिलेख मंगाते समय निदेश दे सकता है कि अभिलेख की परीक्षा लंबित रहने तक किसी दण्डादेश का निष्पादन निलंबित किया जाए और यदि अभियुक्त परिरोध में है तो उसे जमानत पर या उसके अपने बन्धपत्र पर छोड़ दिया जाए।

सेशन न्यायाधीश की पुनरीक्षण की शक्तियाँ (Sessions Judge’ s Powers of Revision) - धारा 399

(1) ऐसी किसी कार्यवाही के मामले में जिसका अभिलेख सेशन न्यायाधीश ने स्वयं मंगवाया है, वह उन सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर सकता है जिनका प्रयोग धारा 401 की उपधारा (1) के अधीन उच्च न्यायालय कर सकता है।

(2) जहां सेशन न्यायाधीश के समक्ष पुनरीक्षण के रूप में कोई कार्यवाही उपधारा (1) के अधीन प्रारंभ की गई है वहां धारा 401 की उपधारा (2), (3), (4) और (5) के उपबंध, जहां तक हो सके, ऐसी कार्यवाही को लागू होंगे और उक्त उपधाराओं में उच्च न्यायालय के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे सेशन न्यायाधीश के प्रति निर्देश हैं।

(3) जहां किसी व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से पुनरीक्षण के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश के समक्ष किया जाता है वहां ऐसे व्यक्ति के संबंध में उस बाबत सेशन न्यायाधीश का विनिश्चय अन्तिम होगा और ऐसे व्यक्ति की प्रेरणा पर पुनरीक्षण के रूप में और कार्यवाही उच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय द्वारा ग्रहण नहीं की जाएगी।

पढ़ें - आपराधिक मामलों का स्थानांतरण (Transfer of Criminal Cases) – CrPC 1973 Chapters 31 – Section 406 – 412

उच्च न्यायालय की पुनरीक्षण की शक्तियाँ (High Court’s Powers of Revision) - धारा 401

(1) ऐसी किसी कार्यवाही के मामले में, जिसका अभिलेख उच्च न्यायालय ने स्वयं मंगवाया है या जिसकी उसे अन्यथा जानकारी हुई है, उसके सम्बन्ध में वह अपील न्यायालय या सेशन न्यायालय को प्रदत्त शाqक्तयों में से किसी का स्वविवेकानुसार प्रयोग कर सकता है।

(2) उच्च न्यायालय जब पुरीक्षण शक्ति का प्रयोग कर रहे हों, यदि उसके आदेश से अभियुक्त या अन्य व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने वाला हो, तो अभियुक्त या उसके अधिवक्ता को सुनवायी का अवसर प्रदान करेगा।

(3) इस धारा के अन्तर्गत उच्च न्यायालय दोषमुक्ति के निष्कर्ष को दोषसिद्धि के रूप में अभिलिखित नहीं कर सकता है।

(4) पुनरीक्षण तभी ग्राह्य होगा जब आक्षेपित आदेश से कोई अपील तो हो सकता था किन्तु अपील नहीं किया गया है।

(5) यदि पुनरीक्षण इस विश्वास पर किया गया है कि उक्त आदेश से अपील नहीं हो सकता है तो न्यायालय उस आवेदन को अपील मानते हुए कार्यवाही करेगा।

उच्च न्यायालय की पुनरीक्षण के मामलों को वापस लेने या अन्तरित करने की शक्ति (Powers of High Court to withdraw or tranfer revision cases) - धारा 402

(1) जब एक ही विचारण में दोषसिद्ध एक या अधिक व्यक्ति पुनरीक्षण के लिए आवेदन उच्च न्यायालय को करते हैं और उसी विचारण में दोषसिद्ध कोई अन्य व्यक्ति पुनरीक्षण के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश को करता है तब उच्च न्यायालय, पक्षकारों की सुविधा और अन्तग्र्रस्त प्रश्नों के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए यह विनिश्चय करेगा कि उन दोनों में से कौन-सा न्यायालय पुनरीक्षण के लिए आवेदनों को आqन्तम रूप से निपटाएगा और जब उच्च न्यायालय यह विनिश्चय करता है कि पुनरीक्षण के लिए सभी आवेदन उसी के द्वारा निपटाए जाने चाहिए तब उच्च न्यायालय यह निदेश देगा कि सेशन न्यायाधीश के समक्ष लंबित पुनरीक्षण के लिए आवेदन उसे अन्तरित कर दिए जाएं और जहां उच्च न्यायालय द्वारा निपटाए जाने आवश्यक नहीं है वहां वह यह निदेश देगा कि उसे किए गए पुनरीक्षण के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश को अन्तरित किए जाएं।

(2) जब कभी पुनरीक्षण के लिए आवेदन उच्च न्यायालय को अन्तरित किया जाता है तब वह न्यायालय उसे इस प्रकार निपटाएगा मानो वह उसके समक्ष सम्यक्तत: किया गया आवेदन है।

(3) जब कभी पुनरीक्षण के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश को अन्तरित किया जाता है तब वह न्यायाधीश उसे इस प्रकार निपटाएगा मानो वह उसके समक्ष सम्यक्तत: किया गया आवेदन है।

(4) जहां पुनरीक्षण के लिए आवेदन उच्च न्यायालय द्वारा सेशन न्यायाधीश को अन्तरित किया जाता है वहां उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों की प्रेरणा पर जिनके पुनरीक्षण के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश द्वारा निपटाए गए हैं पुनरीक्षण के लिए कोई और आवेदन उच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय में नहीं होगा।

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पक्षकारो को सुनने का न्यायालय का विकल्प (Option of Court to hear parties) - धारा 403

पुनरीक्षण कार्यवाही में पक्षकारों को सुनवाई का अधिकार न्यायालय के विकल्प पर निर्भर करेगा। इस धारा के उपबंधो के अधीन पुनरीक्षण शक्ति के प्रयोग में न्यायालय के समक्ष किसी भी पक्षकार को स्वयं या उसके अधिवक्ता द्वारा सुने जाने का अधिकार प्राप्त नही है। परन्तु यदि न्यायालय उचित समझे, तो वह पक्षकार को स्वयं या उसके अधिवक्ता विकल्प पर सुन सकता है।

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महानगर मजिस्ट्रेट के विनिश्चय के आधारों के कथन पर उच्च न्यायालय द्वारा विचार किया जाना (Statement by Metropolitan Magistrate of ground of his decision to be considered by High Court) - धारा 404

जब उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय द्वारा किसी महानगर मजिस्ट्रेट का अभिलेख धारा 397 के अधीन मंगाया जाता है तब वह मजिस्ट्रेट अपने विनिश्चय या आदेश के आधारों का और किन्हीं ऐसे तथ्यों का, जिन्हें वह विवाद्यक के लिए तात्त्विक समझता है, वर्णन करने वाला कथन अभिलेख के साथ भेज सकता है और न्यायालय उक्त विनिश्चय या आदेश को उलटने या अपास्त करने से पूर्व ऐसे कथन पर विचार करेगा।

उच्च न्यायालय के आदेश का प्रमाणित करके निचले न्यायालय को भेजा जाना (High Courts’ order to be certified to lower Court) - धारा 405

जब उच्च न्यायालय या सेशन न्यायाधीश द्वारा कोई मामला पुनरीक्षित किया जाता है तब वह अपना विनिश्चय या आदेश प्रमाणित करके उस न्यायालय को भेजेगा, जिसके द्वारा पुनरीक्षित निष्कर्ष, दण्डादेश या आदेश अभिलिखित किया गया या पारित किया गया था, और तब वह न्यायालय, ऐसे आदेश करेगा, जो ऐसे प्रमाणित विनिश्चय के अनुरूप है और यदि आवश्यक हो तो अभिलेख में तद्नुसार संशोधन कर दिया जाएगा।यह धारा यह उल्लेखित करती है कि पुनरीक्षण न्यायालय के आदेश को प्रमाणित करके धारा 388 द्वारा उपबंधित रीति से अधीनस्थ न्यायालय को भेजा जाएगा

निर्देश और पुनरीक्षण में अंतर (Difference between Reference & Revision)

  1. निर्देश में किसी अधिनियम, विनियम या अध्यादेश की विधिमान्यता का प्रश्न अंतर्ग्रस्त रहता है जबकि पुनरीक्षण में किसी निर्णय या दण्डादेश की वैधता या औचित्य का प्रश्न अंतर्ग्रस्त होता है।
  2. निर्देश केवल लंबित प्रकरणों में ही किया जा सकता है जबकि पुनरीक्षण लंबित एवं निर्णीत, दोनों ही मामलो में हो सकता है।
  3. निर्देश की शक्ति केवल उच्च न्यायालय को ही प्राप्त है जबकि पुनरीक्षण उच्च न्यायालय एवं सेशन न्यायालय, दोनों के द्वारा किया जा सकता है।

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अपील एवं पुनरीक्षण में अंतर (Difference between Appeal & Revision)

  1. अपील एक विधिक अधिकार है लेकिन पुनरीक्षण न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है अतः इसकी मांग अधिकार के रूप में नही की जा सकती है।
  2. अपील विधि अथवा तथ्य, दोनों के प्रश्न पर की जा सकती है जबकि पुनरीक्षण सामान्यतया विधि के प्रश्न पर ही किया जाता है। केवल विशेष परिस्थितियों में ही तथ्य के प्रश्न पर पुनरीक्षण हो सकता है।
  3. अपील में अपीलकर्ता को सुना जाता है जबकि पुनरीक्षण में यह आवश्यक नही है।
  4. उच्च न्यायालय अपील में उन्मोचन को दोषसिद्धि में बदल सकता है परन्तु पुनरीक्षण में ऐसा नही किया जा सकता है।
  5. अपील में एक ही प्रक्रिया होती है जबकि पुनरीक्षण की प्रक्रिया दो स्तरों पर होती है – प्रारम्भिक एवं अंतिम।