आरोप और आरोप की अंतर्वस्तु | Charge & it’s content | CrPC Chapter 17 Sec. 211-224

प्रावधान: आरोप किसी व्यक्ति के विरुद्ध किए गए विशिष्ट दोषारोपण का संक्षिप्त प्रतिपादन होता है। इसके अन्तर्गत अभियुक्त पर लगाये गए उस अपराध की सूचना होती है, जिसका अभियुक्त द्वारा किया गया आरोपित है। आरोपों का प्रारुप–धारा २११-२१४ आरोप की अर्न्तवस्तुओं से सम्बन्धित है जबकि धारा २१५ में यह बताया गया है कि आरोप में की गई त्रुटि के क्या प्रभाव होंगे। धारा २१६ में यह उपबन्धित है कि आरोप में परिवर्तन कब एवं किसके द्वारा किया जा सकता है तथा धारा २१७ में आरोप में परिवर्तन के बाद अपनायी जाने वाली प्रक्रिया का प्रावधान है।

आरोप का अर्थ

आरोप अभियोजन की प्रथम कड़ी होती है तथा आरोप के बाद ही अभियोजन की अगली कार्यवाही की जाती है। आरोप के अभाव में अभियोजन प्रारंभ नहीं हो सकता। आरोप अभियुक्त के विरुद्ध अपराध की जानकारी का ऐसा लिखित कथन होता है जिसमें आरोप के आधार के साथ साथ अपराध की ‘विधि’ ‘समय’ ‘स्थान’ उसमें शामिल ‘व्यक्ति’ एवं ‘वस्तु’ का भी उल्लेख रहता है। आरोप के आधार पर ही अभियुक्त अपना बचाव प्रस्तुत करता है। सामान्यता आरोप तभी लगाया जाता है जब मजिस्ट्रेट इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि आरोपी के विरुद्ध प्रथम दृष्टया अपराध बनता है। संहिता का अध्याय १७ आरोपों के प्रारुप (खण्ड क) और आरोपों के संयोजन (खण्ड ख) से सम्बन्धित उपबंध करता है। आरोप को संहिता के अन्तर्गत परिभाषित नहीं किया गया है। संहिता के धारा २(ख) के अन्तर्गत आरोप के सम्बन्ध में केवल इतना कहा गया है कि आरोप के अन्तर्गत, जब आरोप में एक से अधिक शीर्ष हों, आरोप का कोई भी शीर्ष है।

आपराधिक प्रकरण संचालन के लिए प्रक्रिया विधि में आरोप का महत्वपूर्ण स्थान है। दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 17 में आरोप के लिए यह पूरा अध्याय है, जिसमें धारा 211 से लेकर 224 तक आरोप संबंधित सभी प्रावधान दिए गए हैं। इस लेख तथा इसके बाद के अन्य लेखों के माध्यम से हम आरोप क्या होता है और आरोप का प्ररूप क्या है इसे समझने का प्रयास करेंगे तथा अगले लेखों में आरोप से संबंधित अन्य विशेष जानकारियों पर चर्चा होगी।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 के अंतर्गत अभियोजन अपना अंतिम प्रतिवेदन पेश करता है। अंतिम प्रतिवेदन के पेश होने के उपरांत मजिस्ट्रेट आरोप लगाता है। न्यायालय आरोप को लिखता है तथा अभियुक्त व्यक्ति को यह संज्ञान देता है कि उस पर क्या आरोप लगाए गए हैं और कौन से अपराध का विचारण उस अभियुक्त पर आगे चलाया जाएगा।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 211 आरोप के प्ररूप का वर्णन करती है। इस धारा में आरोप की अंतर्वस्तु के बारे में उपबंध दिए गए हैं। आरोप को संहिता की धारा 2 के परिभाषा खंड के अधीन परिभाषित किया गया है परंतु धारा 2 के अंतर्गत केवल आरोप की परिभाषा मात्र दी गई है तथा संहिता के अध्याय 17 में आरोप से संबंधित समस्त जिज्ञासाओं को शांत किया गया है। साधरण भावबोध में आरोप शब्द से तात्पर्य अभियुक्त को उसके अपराध के बारे में जानकारी देने का एक साधन है, जिसमें आरोप के आधारों के साथ-साथ समय स्थान तथा उस व्यक्ति या वस्तु का उल्लेख रहता है जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है।

न्यायालय द्वारा आरोप उसी सूरत में लगाया जाता है जब न्यायालय को यह समाधान हो जाता है कि प्रथम दृष्टया कोई अपराध बनता है। अजय कुमार बनाम झारखंड राज्य के एक प्रसिद्ध मामले में न्यायालय ने यह कहा है कि आरोपों को तय करने से पहले अभियोजन के साक्षियों का प्रति परीक्षण करने का अवसर अवश्य दिया जाना चाहिए परंतु विजयन बनाम केरल राज्य के मामले में न्यायालय ने कहा है कि जब मजिस्ट्रेट को यह प्रथम दृष्टया समाधान होता है की कोई अपराध किया गया है तो उस आधार पर ही आरोप तय होते है तथा दोनों पक्षों को बहस मात्र कर लेने से ही आरोप तय करने का अधिकार न्यायालय को प्राप्त हो जाता है।

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Section 211 आरोप की अन्तर्वस्तु

  1. इस संहिता के अधीन प्रत्येक आरोप में उस अपराध का कथन होगा जिसका अभियुक्त पर आरोप है।
  2. यदि उस अपराध का सृजन करने वाली विधि द्वारा उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम दिया गया है तो आरोप में उसी नाम से उस अपराध का वर्णन किया जाएगा।
  3. यदि उस अपराध का सृजन करने वाली विधि द्वारा उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम नहीं दिया गया है तो अपराध की इतनी परिभाषा देनी होगी जितनी से अभियुक्त को उस बात की सूचना हो जाए जिसका उस पर आरोप है।
  4. वह विधि और विधि की वह धारा, जिसके विरुद्ध अपराध किया जाना कथित है, आरोप में उल्लिखित होगी।
  5. यह तथ्य कि आरोप लगा दिया गया है इस कथन के समतुल्य है कि विधि द्वारा अपेक्षित प्रत्येक शर्त जिससे आरोपित अपराध बनता है उस विशिष्ट मामले में पूरी हो गई हैं।
  6. आरोप न्यायालय की भाषा में लिखा जाएगा।
  7. यदि अभियुक्त किसी अपराध के लिए पहले दोषसिद्ध किए जाने पर किसी पश्चात्वर्ती अपराध के लिए ऐसी पूर्व दोषसिद्धि के कारण वर्धित दंड का या भिन्न प्रकार के दंड का भागी है और यह आशयित है कि ऐसी पूर्व दोषसिद्धि उस दंड को प्रभावित करने के प्रयोजन के लिए साबित की जाए जिसे न्यायालय पश्चात्वर्ती अपराध के लिए देना ठीक समझे तो पूर्व दोषसिद्धि का तथ्य, तारीख और स्थान आरोप में कथित होंगे; और यदि ऐसा कथन रह गया है तो न्यायालय दंडादेश देने के पूर्व किसी समय भी उसे जोड़ सकेगा।

दृष्टान्त

  1. क पर ख की हत्या का आरोप है। यह बात इस कथन के समतुल्य है कि क का कार्य भारतीय दंड संहिता (1860 का । 45) की धारा 299 और 300 में दी गई हत्या की परिभाषा के अंदर आता है और वह उसी संहिता के साधारण अपवादों में से किसी के अंदर नहीं आता और वह धारा 300 के पांच अपवादों में से किसी के अंदर भी नहीं आता, या यदि वह अपवाद 1 के अंदर आता है। तो उस अपवाद के तीन परंतुकों में से कोई न कोई परंतुक उसे लागू होता है।
  2. क पर असन के उपकरण द्वारा ख को स्वेच्छया घोर उपहति कारित करने के लिए भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 326 के अधीन आरोप है। यह इस कथन के समतुल्य है कि उस मामले के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 335 द्वारा उपबंध नहीं किया गया है और साधारण अपवाद उसको लागू नहीं होते हैं।
  3. क पर हत्या, छल, चोरी, उद्दीपन, जारकर्म या आपराधिक अभित्रास या मिथ्या संपत्ति चिह्न को उपयोग में लाने का अभियोग है। आरोप में उन अपराधों की भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) में दी गई परिभाषाओं के निर्देश के बिना यह कथन हो सकता है कि क ने हत्या या छल या चोरी या उद्दीपन या जारकर्म या आपराधिक अभित्रास किया है या यह कि उसने मिथ्या संपत्ति चिह्न का उपयोग किया है; किंतु प्रत्येक दशा में वे धाराएं, जिनके अधीन अपराध दंडनीय है, आरोप में निर्दिष्ट करनी पड़ेगी।
  4. क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 184 के अधीन यह आरोप है कि उसने लोक सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा विक्रय के लिए प्रस्थापित संपत्ति के विक्रय में साशय बाधा डाली है। आरोप उन शब्दों में ही होना चाहिए।

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Section 212 समय, स्थान और व्यक्ति के बारे में विशिष्टियाँ

  1. अभिकथित अपराध के समय और स्थान के बारे में और जिस व्यक्ति के (यदि कोई हो) विरुद्ध अथवा जिस वस्तु के (यदि कोई हो) विषय में वह अपराध किया गया उस व्यक्ति या वस्तु के बारे में ऐसी विशिष्टियां, जैसी अभियुक्त को उस बात की, जिसका उस पर आरोप है, सूचना देने के लिए उचित रूप से पर्याप्त हैं आरोप में अंतर्विष्ट होंगी।
  2. जब अभियुक्त पर आपराधिक न्यासभंग या बेईमानी से धन या अन्य जंगम संपत्ति के दुर्विनियोग का आरोप है तब इतना ही पर्याप्त होगा कि विशिष्ट मदों का जिनके विषय में अपराध किया जाना अभिकथित है, या अपराध करने की ठीक-ठीक तारीखों का विनिर्देश किए बिना, यथास्थिति, उस सकल राशि का विनिर्देश या उस जंगम संपत्ति का वर्णन कर दिया जाता है जिसके विषय में अपराध किया जाना अभिकथित है, और उन तारीखों का, जिनके बीच में अपराध का किया जाना अभिकथित है, विनिर्देश कर दिया जाता है और ऐसे विरचित आरोप धारा 219 के अर्थ में एक ही अपराध का आरोप समझा जाएगा: परंतु ऐसी तारीखों में से पहली और अंतिम के बीच का समय एक वर्ष से अधिक का न होगा।

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Section 213 कब अपराध किए जाने की रीति कथित की जानी चाहिए

जब मामला इस प्रकार का है कि धारा २११ और २१२ में वर्णित विशिष्टियां अभियुक्त को उस बात की, जिसका उस पर आरोप है, पर्याप्त सूचना नहीं देती तब उस रीति की जिसमें अभिकथित अपराध किया गया, ऐसी विशिष्टियां भी, जैसी उस प्रयोजन के लिए पर्याप्त है, आरोप में अन्तर्विष्ट होंगी।

दृष्टांत

  1. क पर वस्तु-विशेष की विशेष समय और स्थान में चोरी करने का अभियोग है। यह आवश्यक नहीं है कि आरोप में वह रीति उपवर्णित हो जिससे चोरी की गई।
  2. क पर ख के साथ कथित समय पर और कथित स्थान में छल करने का अभियोग है। आरोप में वह रीति, जिससे क ने ख के साथ छल किया, उपवर्णित करनी होगी।
  3. क पर कथित समय पर और कथित स्थान में मिथ्या साक्ष्य देने का अभियोग है। आरोप में क द्वारा किए गए साक्ष्य का वह भाग उपवर्णित करना होगा जिसका मिथ्या होना अभिकथित है।
  4. क पर लोक सेवक ख को उसके लोक कृत्यों के निर्वहन में कथित समय पर और कथित स्थान में बाधित करने का । अभियोग है। आरोप में वह रीति उपवर्णित करनी होगी जिससे क ने ख को उसके कृत्यों के निर्वहन में बाधित किया।
  5. क पर कथित समय पर और कथित स्थान में ख की हत्या करने का अभियोग है। यह आवश्यक नहीं है कि आरोप में वह रीति कथित हो जिससे क ने ख की हत्या की।
  6. क पर ख को दंड से बचाने के आशय से विधि के निदेश की अवज्ञा करने का अभियोग है। आरोपित अवज्ञा और। अतिलंधित विधि का उपवर्णन आरोप में करना होगा।

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Section 214 आरोप के शब्दों का वह अर्थ लिया जाएगा जो उनका उस विधि में है जिसके अधीन वह अपराध दंडनीय है

प्रत्येक आरोप में अपराध का वर्णन करने में उपयोग में लाए गए शब्दों को उस अर्थ में उपयोग में लाया गया समझा जाएगा जो अर्थ उन्हें इस विधि द्वारा दिया गया है जिसके अधीन ऐसा अपराधदंडनीय है।

Section 215 गलतियों का प्रभाव

अपराध के या उन विशिष्टियां के, कथन करने में किसी गलती को और उस अपराध या उन विशिष्टियों के कथन करने में किसी लोप को मामले के किसी प्रक्रम में तब ही, तात्त्विक माना जाएगा जब ऐसी गलती या लोप से अभियुक्त वास्तव में भुलावे में पड़ गया है और उसके कारण न्याय नहीं हो पाया है, अन्यथा नहीं।

दृष्टान्त

  1. क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 242 के अधीन यह आरोप है कि उसने कब्जे में ऐसा कूटकृत सिक्का रखा है जिसे वह उस समय, जब वह सिक्का उसके कब्जे में आया था, जानता था कि वह कूटकृत है” और आरोप में कपटपूर्वक” शब्द छूट गया है। जब तक यह प्रतीत नहीं होता है कि क वास्तव में इस लोप से भुलावे में पड़ गया, इस गलती को तात्त्विक नहीं समझा जाएगा।
  2. क पर ख से छल करने का आरोप है और जिस रीति से उसने ख के साथ छल किया है वह आरोप में उपवर्णित नहीं है। या अशुद्ध रूप में उपवर्णित है। क अपनी प्रतिरक्षा करता है, साक्षियों को पेश करता है और संव्यवहार का स्वयं अपना विवरण देता है। न्यायालय इससे अनुमान कर सकता है कि छल करने की रीति के उपवर्णन का लोप तात्त्विक नहीं है।
  3. क पर ख से छल करने का आरोप है और जिस रीति से उसने ख से छल किया है वह आरोप में उपवर्णित नहीं है। क और ख के बीच अनेक संव्यवहार हुए हैं और क के पास यह जानने का कि आरोप का निर्देश उनमें से किसके प्रति है कोई साधन नहीं था और उसने अपनी कोई प्रतिरक्षा नहीं की। न्यायालय ऐसे तथ्यों से यह अनुमान कर सकता है कि छल करने की रीति के उपवर्णन का लोप उस मामले में तात्त्विक गलती थी।
  4. क पर 21 जनवरी, 1882 को खुदाबख्श की हत्या करने का आरोप है। वास्तव में मृत व्यक्ति का नाम हैदरबख्श था और हत्या की तारीख 20 जनवरी, 1882 थी। क पर कभी भी एक हत्या के अतिरिक्त दूसरी किसी हत्या का आरोप नहीं लगाया गया और उसने मजिस्ट्रेट के समक्ष हुई जांच को सुना था जिसमें हैदरबख्श के मामले का ही अनन्य रूप से निर्देश किया गया था। न्यायालय इन तथ्यों से यह अनुमान कर सकता है कि क उससे भुलावे में नहीं पड़ा था और आरोप में यह गलती तात्त्विक नहीं थी।
  5. क पर 20 जनवरी, 1883 को हैदरबख्श की हत्या और 21 जनवरी, 1882 को खुदाबख्श की (जिसने उसे हत्या के लिए गिरफ्तार करने का प्रयास किया था) हत्या करने का आरोप है। जब वह हैदरबख्श की हत्या के लिए आरोपित हुआ, तब उसका विचारण खुदाबख्श की हत्या के लिए हुआ । उसकी प्रतिरक्षा में उपस्थित साक्षी हैदरबख्श वाले मामले में साक्षी थे। न्यायालय इससे अनुमान कर सकता है कि क भुलावे में पड़ गया था और यह गलती तात्त्विक थी।

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Section 216 न्यायालय आरोप परिवर्तित कर सकता है

  1. कोई भी न्यायालय निर्णय सुनाए जाने के पूर्व किसी समय किसी भी आरोप में परिवर्तन या परिवर्धन कर सकता है।
  2. ऐसा प्रत्येक परिवर्तन या परिवर्धन अभियुक्त को पढ़कर सुनाया और समझाया जाएगा।
  3. यदि आरोप में किया गया परिवर्तन या परिवर्धन ऐसा है कि न्यायालय की राय में विचारण को तुरंत आगे चलाने से अभियुक्त पर अपनी प्रतिरक्षा करने में या अभियोजक पर मामले के संचालन में कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है, तो न्यायालय ऐसे परिवर्तन या परिवर्धन के पश्चात् स्वविवेकानुसार विचारण को ऐसे आगे चला सकता है मानो परिवर्तित या परिवर्धित आरोप ही मूल आरोप है।
  4. यदि परिवर्तन या परिवर्धन ऐसा है कि न्यायालय की राय में विचारण को तुरंत आगे चलाने से इस बात की संभावना है कि अभियुक्त या अभियोजक पर पूर्वोक्त रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा तो न्यायालय या तो नए विचारण का निदेश दे सकता है या विचारण को इतनी अवधि के लिए, जितनी आवश्यक हो, स्थगित कर सकता है।
  5. यदि परिवर्तित या परिवर्धित आरोप में कथित अपराध ऐसा है, जिसके अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता है, तो उस मामले में ऐसी मंजूरी अभिप्राप्त किए बिना कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी जब तक कि उन्हीं तथ्यों के आधार पर जिन पर परिवर्तित या परिवर्धित आरोप आधारित हैं, अभियोजन के लिए मंजूरी पहले ही अभिप्राप्त नहीं कर ली गई है।

Section 217 जब आरोप परिवर्तित किया जाता है तब साक्षियों का पुन: बुलाया जाना

विचारण प्रारम्भ होने के पश्चात् न्यायालय द्वारा आरोप परिवर्तित या परिवर्धित किया जाता है तब अभियोजक और अभियुक्त को:- (क) किसी ऐसे साक्षी को, जिसकी परीक्षा की जा चुकी है, पुन: बुलाने की या पुन: समन करने की और उसकी ऐसे परिवर्तन या परिवर्धन के बारे में परीक्षा करने की अनुज्ञा दी जाएगी। (ख) किसी अन्य ऐसे साक्षी को भी, जिसे न्यायालय आवश्यक समझे, बुलाने की अनुज्ञा दी जाएगी।

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Section 218 आरोपों का संयोजन

  1. प्रत्येक सुभिन्न अपराध के लिए, जिसका किसी व्यक्ति पर अभियोग है, पृथक् आरोप होगा और ऐसे प्रत्येक आरोप का विवरण पृथक्तत: किया जाएगा : परंतु जहां अभियुक्त व्यक्ति, लिखित आवेदन द्वारा, ऐसा चाहता है और मजिस्ट्रेट की राय है कि उससे ऐसे व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा वहां मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति के विरुद्ध विरचित सभी या किन्हीं आरोपों का विचारण एक साथ कर सकता है।
  2. उपधारा (१) की कोई बात धारा २१९, २२०, २२१ और २२३ के उपबंधों के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी। Note धारा २१८ के अन्तर्गत आरोपों के संयोजन से सम्बन्धित सामान्य सिद्धान्त उपबन्धित है जबकि इसी धारा के परन्तुक एवं उपधारा में उपरोक्त सामान्य सिद्धान्त के अपवाद दिए गये हैं। धारा २१९, २२०, २२१ में यह उपबन्धित है कि किन अपराधों का संयुक्त रूप से विचारण हो सकता है जबकि धारा २२३ यह उपबन्धित करती है कि किन व्यक्तियों पर संयुक्त रूप से आरोप लगाये जा सकते हैं और उनका विचारण एक साथ किया जा सकता है।

दृष्टांत

क पर एक अवसर पर चोरी करने और दूसरे किसी अवसर पर घोर उपहति कारित करने का अभियोग है। चोरी के लिए और घोर उपहति कारित करने के लिए क पर पृथक्-पृथक् आरोप लगाने होंगे और उनका विचारण पृथक्तत: करना होगा।

Section 219 एक ही वर्ष में किए गए एक ही किस्म के तीन अपराधों का आरोप एक साथ लगाया जा सकेगा

  1. जब किसी व्यक्ति पर एक ही किस्म के ऐसे एक से अधिक अपराधों का अभियोग है जो उन अपराधों में से पहले अपराध से लेकर अंतिम अपराध तक बारह मास के अंदर ही किए गए हैं, चाहे वे एक ही व्यक्ति के बारे में किए गए हों या नहीं, तब उस पर उनमें से तीन से अनधिक कितने ही | अपराधों के लिए एक ही विचारण में आरोप लगाया और विचारण किया जा सकता है।
  2. अपराध एक ही किस्म के तब होते हैं जब वे भारतीय दंड संहिता (१८६० का ४५) या किसी विशेष या स्थानीय विधि की एक ही। धारा के अधीन दंड की समान मात्रा से दंडनीय होते हैं: परंतु इस धारा के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि भारतीय दंड संहिता (१८६० का ४५) की धारा ३७९ के अधीन दंडनीय अपराध उसी किस्म का अपराध है जिस किस्म का उक्त संहिता की धारा ३८० के अधीन दंडनीय अपराध है, और भारतीय दंड संहिता या किसी विशेष या स्थानीय विधि की किसी धारा के अधीन दंडनीय अपराध उसी किस्म का अपराध है जिस किस्म का ऐसे अपराध करने का प्रयत्न है, जब ऐसा प्रयत्न अपराध हो।

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33 Section 220 एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण

  1. यदि परस्पर संबद्ध ऐसे कार्यों के, जिनसे एक ही संव्यवहार बनता है, एक क्रम में एक से अधिक अपराध एक ही व्यक्ति द्वारा किए गए हैं तो ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए एक ही विचारण में उस पर आरोप लगाया जा सकता है और उसका विचारण किया जा सकता है।
  2. जब धारा 212 की उपधारा (2) में या धारा 219 की उपधारा (1) में उपबंधित रूप में, आपराधिक न्यासभंग या बेईमानी से सम्पत्ति के दुर्विनियोग के एक या अधिक अपराधों से आरोपित किसी व्यक्ति पर उस अपराध या अपराधों के किए जाने को सुकर बनाने या छिपाने के प्रयोजन से लेखाओं के मिथ्याकरण के एक या अधिक अपराधों का अभियोग है, तब उस पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए एक ही विचारण में आरोप लगाया जा सकता है और विचारण किया जा सकता है।
  3. यदि अभिकथित कार्यों से तत्समय प्रवृत्त किसी विधि की, जिससे अपराध परिभाषित या दंडनीय हों, दो या अधिक पृथक परिभाषाओं में आने वाले अपराध बनते हैं तो जिस व्यक्ति पर उन्हें करने का अभियोग है उस पर ऐसे अपराधों में से प्रत्येक के लिए एक ही विचारण में आरोप लगाया जा सकता है और विचारण किया जा सकता है।
  4. यदि कई कार्य, जिनमें से एक से या एक से अधिक से स्वयं अपराध बनते हैं, मिलकर भिन्न अपराध बनते हैं तो ऐसे कार्यों से मिलकर बने अपराध के लिए और ऐसे कार्यों में से किसी एक या अधिक द्वारा बने किसी अपराध के लिए अभियुक्त व्यक्ति पर एक ही विचारण में आरोप लगाया जा सकता है और विचारण किया जा सकता है।
  5. इस धारा की कोई बात भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 71 पर प्रभाव न डालेगी।

उपधारा (1) के दृष्टांत

  1. क एक व्यक्ति ख को, जो विधिपूर्ण अभिरक्षा में है, छुड़ाता है और ऐसा करने में कांस्टेबल ग को, जिसकी अभिरक्षा । में ख है, घोर उपहति कारित करता है। क पर भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 225 और 333 के अधीन अपराधों के । लिए आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
  2. ख दिन में गृहभेदन इस आशय से करता है कि जारकर्म करे और ऐसे प्रवेश किए गए गृह में ख की पत्नी से जारकर्म करता है। क पर भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 454 और 497 के अधीन आरोपों के लिए पृथक्तत: आरोप लगाया। जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
  3. क इस आशय से ख को, जो ग की पत्नी है, फुसलाकर ग से अलग ले जाता है कि ख से जारकर्म करे और फिर वह उससे जारकर्म करता है। क पर भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 498 और 497 के अधीन अपराधों के लिए पृथक्तत: आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
  4. क के कब्जे में कई मुद्राएं हैं जिन्हें वह जानता है कि वे कूटकृत हैं और जिनके संबंध में वह यह आशय रखता है कि भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 466 के अधीन दंडनीय कई कूट रचनाएं करने के प्रयोजन से उन्हें उपयोग में लाए। ‘क’ पर प्रत्येक मुद्रा पर कब्जे के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 473 के अधीन पृथक्तत: आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।

दृष्टांत (1) से लेकर (4) तक में क्रमशः निर्दिष्ट पृथक् आरोपों का विचारण एक ही समय किया जा सकेगा।

उपधारा (3) के दृष्टांत

  1. क बेंत से ख पर संदोष आघात करता है। क पर भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 352 और 323 के अधीन अपराधों के लिए पृथक्तत: आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
  2. चुराए हुए गेंहू के कई बोरे क और ख को, जो यह जानते हैं कि वे चुराई हुई संपत्ति हैं, इस प्रयोजन से दे दिए जाते हैं कि वे उन्हें छिपा दें। तब क और ख उन बोरों को छिपाने में स्वेच्छया एक दूसरे की मदद करते हैं। क और ख पर भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 411 और 414 के अधीन अपराधों के लिए पृथक्तत: आरोप लगाया जा सकेगा और वे दोषसिद्ध किए जा सकेंगे।
  3. क अपने बालक को यह जानते हुए आरक्षित डाल देती है कि यह संभाव्य है कि उससे वह उसकी मृत्यु कारित कर दे। बालक ऐसे अरक्षित डाले जाने के परिणामस्वरूप मर जाता है। क पर भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 317 और 304 के अधीन अपराधों के लिए पृथक्तत: आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध की जा सकेगी।
  4. क कूटरचित दस्तावेज को बेईमानी से असली साक्ष्य के रूप में इसलिए उपयोग में लाता है कि एक लोक सेवक ख को भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 167 के अधीन अपराध के लिए दोषसिद्ध करे। क पर भारतीय दंड संहिता की। (धारा 466 के साथ पठित) धारा 471 के और धारा 196 के अधीन अपराधों के लिए पृथक्तत: आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।

उपधारा (4) का दृष्टांत

  1. ख को क लूटता है और ऐसा करने में उसे स्वेच्छया उपहति कारित करता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 323, 392, और 394 के अधीन अपराधों के लिए पृथक्तत: आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया। जा सकेगा।
  2. क पर ऐसे कार्य का अभियोग है जो चोरी की, या चुराई गई संपत्ति प्राप्त करने की, या आपराधिक न्यासभंग की, या छल की कोटि में आ सकता है। उस पर चोरी करने, चुराई हुई संपत्ति प्राप्त करने, आपराधिक न्यासभंग करने और छल करने का आरोप लगाया जा सकेगा अथवा उस पर चोरी करने का या चोरी की संपत्ति प्राप्त करने का या आपराधिक न्यासभंग करने का या छल करने का आरोप लगाया जा सकेगा।
  3. ऊपर वर्णित मामले में क पर केवल चोरी का आरोप है। यह प्रतीत होता है कि उसने आपराधिक न्यासभंग का यह चुराई हुई संपत्ति प्राप्त करने का अपराध किया है। वह (यथास्थिति) आपराधिक न्यासभंग या चुराई हुई संपत्ति प्राप्त करने के लिए दोषसिद्ध किया जा सकेगा, यद्यपि उस पर उस अपराध का आरोप नहीं लगाया गया था।
  4. क मजिस्ट्रेट के समक्ष शपथ पर कहता है कि उसने देखा कि ख ने ग को लाठी मारी। सेशन न्यायालय के समक्ष क शपथ पर कहता है कि ख ने ग को कभी नहीं मारा। यद्यपि यह साबित नहीं किया जा सकता कि इन दो परस्पर विरुद्ध कथनों में से कौन सा मिथ्या है तथापि क पर साशय मिथ्या देने के लिए अनुकल्पत: आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।

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Section 221 जहां इस बारे में संदेह है कि कौन-सा अपराध किया गया है

  1. यदि कोई एक कार्य या कार्यों का क्रम इस प्रकार का है कि यह संदेह है कि उन तथ्यों से, जो सिद्ध किए जा सकते हैं, कई अपराधों में से कौन सा अपराध बनेगा तो अभियुक्त पर ऐसे सब अपराध या उनमें से कोई करने का आरोप लगाया जा सकेगा और ऐसे आरोपों में से कितनों ही का एक साथ विचारण किया जा सकेगा; या उस पर उक्त अपराधों में से किसी एक को करने का अनुकल्पत: आरोप लगाया जा सकेगा।
  2. यदि ऐसे मामले में अभियुक्त पर एक अपराध का आरोप लगाया गया है और साक्ष्य से यह प्रतीत होता है कि उसने भिन्न अपराध किया है, जिसके लिए उस पर उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन आरोप लगाया जा सकता था, तो वह उस अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकेगा जिसका उसके द्वारा किया जाना दर्शित है, यद्यपि उसके लिए उस पर आरोप नहीं लगाया गया था।

Section 222 जब वह अपराध, जो साबित हुआ है, आरोपित अपराध के अंतर्गत है

  1. जब किसी व्यक्ति पर ऐसे अपराध का आरोप है। जिसमें कई विशिष्टियां हैं, जिनमें से केवल कुछ के संयोग से एक पूरा छोटा अपराध बनता है और ऐसा संयोग साबित हो जाता है किन्तु शेष विशिष्टियां साबित नहीं होती हैं तब वह उस छोटे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकता है यद्यपि उस पर उसका आरोप नहीं था।
  2. जब किसी व्यक्ति पर किसी अपराध का आरोप लगाया गया है और ऐसे तथ्य साबित कर दिए जाते हैं जो उसे घटाकर छोटा अपराध कर देते हैं तब वह छोटे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकता है यद्यपि उस पर उसका आरोप नहीं था।
  3. जब किसी व्यक्ति पर किसी अपराध का आरोप है तब वह उस अपराध को करने के प्रयत्न के लिए दोषसिद्ध किया जा सकता है। यद्यपि प्रयत्न के लिए पृथक् आरोप न लगाया गया हो।
  4. इस धारा की कोई बात किसी छोटे अपराध के लिए उस दशा में दोषसिद्ध प्राधिकृत करने वाली न समझी जाएगी जिसमें ऐसे छोटे अपराध के बारे में कार्यवाही शुरू करने के लिए अपेक्षित शर्ते पूरी नहीं हुई हैं।

दृष्टांत

क पर उस संपत्ति के बारे में, जो वाहक के नाते उसके पास न्यस्त है, आपराधिक न्यासभंग के लिए भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 407 के अधीन आरोप लगाया गया है। यह प्रतीत होता है कि उस संपत्ति के बारे में धारा 406 के अधीन उसने आपराधिक न्यासभंग तो किया है किन्तु वह उसे वाहक के रूप में न्यस्त नहीं की गई थी। वह धारा 406 के अधीन आपराधिक न्यासभंग के लिए दोषसिद्ध किया जा सकेगा।

क पर घोर उपहति कारित करने के लिए भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 325 के अधीन आरोप है। वह साबित कर देता है कि उसने घोर और आकस्मिक प्रकोपन पर कार्य किया था। वह उस संहिता की धारा 335 के अधीन दोषसिद्ध किया जा सकेगा।

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Section 223 किन व्यक्तियों पर संयुक्त रूप से आरोप लगाया जा सकेगा

निम्नलिखित व्यक्तियों पर एक साथ आरोप लगाया जा सकेगा और उनका एक साथ विचारण किया जा सकेगा, अर्थात् :-

  1. वे व्यक्ति जिन पर एक ही संव्यवहार के अनुक्रम में किए गए एक ही अपराध का अभियोग है;
  2. वे व्यक्ति जिन पर किसी अपराध का अभियोग है और वे व्यक्ति जिन पर ऐसे अपराध का दुप्रेरण या प्रयत्न करने का अभियोग है;
  3. वे व्यक्ति जिन पर बारह मास की अवधि के अन्दर संयुक्त रूप में उनके द्वारा किए गए धारा 219 के अर्थ में एक ही । किस्म के एक से अधिक अपराधों का अभियोग है।
  4. वे व्यक्ति जिन पर एक ही संव्यवहार के अनुक्रम में दिए गए भिन्न अपराधों का अभियोग है;
  5. वे व्यक्ति जिन पर ऐसे अपराध का, जिसके अन्तर्गत चोरी, उद्दापन, छल या आपराधिक दुर्विनियोग भी है, अभियोग है। और वे व्यक्ति, जिन पर ऐसी संपत्ति को, जिसका कब्जा प्रथम नामित व्यक्तियों द्वारा किए गए किसी ऐसे अपराध द्वारा अन्तरित किया जाना अभिकथित है, प्राप्त करने या रखे रखने या उसके व्ययन या छिपाने में सहायता करने का या किसी ऐसे अंतिम नामित अपराध का दुप्रेरण या प्रयत्न करने का अभियोग है;
  6. वे व्यक्ति जिन पर ऐसी चुराई हुई संपत्ति के बारे में, जिसका कब्जा एक ही अपराध द्वारा अंतरित किया गया है, भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 411 और धारा 414 के, या उन धाराओं में से किसी के अधीन अपराधों का अभियोग है;
  7. वे व्यक्ति जिन पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 12 के अधीन कूटकृत सिक्के के संबंध में किसी अपराध का अभियोग है और वे व्यक्ति जिन पर उसी सिक्के के संबंध में उक्त अध्याय के अधीन किसी भी अन्य अपराध का या किसी ऐसे अपराध का दुप्रेरण या प्रयत्न करने का अभियोग है; और इस अध्याय के पूर्ववर्ती भाग के उपबंध सब ऐसे आरोपों को यथाशक्य लागू होंगे:

परन्तु जहां अनेक व्यक्तियों पर पृथक् अपराधों का आरोप लगाया जाता है और वे व्यक्ति इस धारा में विनिर्दिष्ट कोटियों में से किसी में नहीं आते हैं वहां ‘मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय ऐसे सब व्यक्तियों का विचारण एक साथ कर सकता है यदि ऐसे व्यक्ति लिखित आवेदन द्वारा ऐसा चाहते हैं और मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालयों का समाधान हो जाता है कि उससे ऐसे व्यक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा और ऐसा करना समीचीन है।

संहिता में वर्ष २००५ में किये गये संशोधन से अनेक व्यक्तियों पर लगाये गये पृथक अपराधों के आरोप के सन्दर्भ में उन व्यक्तियों द्वारा एक साथ विचारण का लिखित आवेदन किये जाने पर न्यायालय का यह समाधान हो जाने पर कि उससे ऐसे व्यक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा तथा ऐसा करना समीचीन है, आरोपों का संयुक्त विचारण की शक्ति मजिस्ट्रेट के साथ ही सेशन न्यायालय को भी प्रदान की गयी है। संशोधन के पूर्व मात्र मजिस्ट्रेट को ही उक्त शक्ति प्राप्त थी।

Section 224 कई आरोपों में से एक के लिए दोषसिद्धि पर शेष आरोपों को वापस लेना

जब एक ही व्यक्ति के विरुद्ध ऐसा आरोप विरचित किया जाता है जिसमें एक से अधिक शीर्ष हैं और जब उनमें से एक या अधिक के लिए, दोषसिद्धि कर दी जाती है तब परिवादी। या अभियोजन का संचालन करने वाला अधिकारी न्यायालय की सम्मति से शेष आरोप या आरोपों को वापस ले सकता है अथवा न्यायालय ऐसे आरोप या आरोपों की जांच या विचारण स्वप्रेरणा से रोक सकता है और ऐसे वापस लेने का प्रभाव ऐसे आरोप या आरोपों से दोषमुक्ति होगा; किन्तु यदि दोषसिद्धि अपास्त कर दी जाती है तो उक्त न्यायालय (दोषसिद्धि अपास्त करने वाले न्यायालय के आदेश के अधीन रहते हुए) ऐसे वापस लिए गए आरोप या आरोपों की जांच या विचारण में आगे कार्यवाही कर सकता है।

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