आपराधिक मानव वध (Culpable Homicide) - IPC Sections 299 Indian Penal Code 1860

आपराधिक मानव वध और हत्या को भारतीय दण्ड संहिता 1860 के अध्याय 16 में वर्णित किया गया है। यह मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले सबसे गंभीर अपराध है। शब्द मानव-वध (Homicide) लैटिन भाषा के दो शब्दों Homo एवं Cido से मिलकर बना है। Homo का अर्थ है Man अर्थात् मानव एवं Cido का अर्थ है Cut काटना या वध करना। स्टीफेन ने एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य को जान से मार डालना मानव-वध बताया है। मानव वध विधिपूर्ण और अविधिपूर्ण दो प्रकार का होता है।

ऐसा मानव वध जो हत्या है

  • धारा 299(1),
  • धारा 300
  • धारा 301 सपठित 302

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ऐसा मानव वध जो हत्या नहीं होता

धारा 299(2),(3), अपवाद धारा 300, धारा 301 सपठित धारा 304 आपराधिक मानव: वध जो हत्या की कोटि में नहीं आते। उपेक्षा द्वारा मृत्यु कारित करना धारा 304(क) तथा दहेज़ मृत्यु 304(ख) भी ऐसे मानव वध है जो कि अमान्य है परन्तु संहिता इन्हें आपराधिक मानव वध की क्ष्रेणी में नहीं रखती।

विधिपूर्ण मानव-वध भी दो प्रकार के होते है।

माफ़ी योग्य

ऐसे मानव वध जिसमें न तो मृत्यु कारित करने का आशय और न ही ज्ञान, ऐसे मानव वध को दण्ड संहिता माफ़ी योग्य मानती है। जैसे धारा 80 विधिपूर्ण कार्य करने में दुर्घटना, धारा 82 से 85 अपराध करने में अक्षम व्यक्ति, धारा 87 से 89 सहमति और धारा 92 सम्मति के बिना किसी ब्यक्ति के फायदे के लिये सदभावना पूर्वक किया गया कार्य।

न्यायोचित मानव वध

ऐसा मानव वध जिसमे मृत्यु कारित करने का आशय या ज्ञान होता है। परन्तु विधि कुछ परिस्थितियों में इन्हें किया जाना न्यायोचित मानती है। जैसे धारा 76,79 तथ्य की भूल, धारा 81 आवश्यकता, तथा धारा 96 से 106 निजी प्रतिरक्षा।

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आपराधिक मानव-वध

अविधिपूर्ण मानव-वध की कोटि में आने वाला सबसे पहला अपराध है आपराधिक मानव-वध। धारा २९९ का शीर्षक है-“आपराधिक मानव-वध”। इसके अनुसार- “जो भी कोई मॄत्यु कारित करने के आशय से, या ऐसी शारीरिक क्षति पहुँचाने के आशय से जिससे मॄत्यु होना सम्भाव्य हो, या यह जानते हुए कि यह सम्भाव्य है कि ऐसे कार्य से मॄत्यु होगी, कोई कार्य करके मॄत्यु कारित करता है, वह गैर इरादतन हत्या/आपराधिक मानव वध का अपराध करता है।

स्पष्टीकरण

  1. वह व्यक्ति, जो किसी दूसरे व्यक्ति को, जो किसी विकार रोग अंगशैथिल्य से ग्रस्त है, शारीरिक क्षति कारित करता है और तद्द्वारा उस दूसरे व्यक्ति की मॄत्यु शीघ्र कर देता है, उसकी मॄत्यु कारित करता है, यह समझा जाएगा। इस स्पष्टीकरण के अन्तर्गत जो कोई किसी दूसरे व्यक्ति को, जो किसी विकार, रोग, अंग-शैथिल्य से ग्रस्त है, शारीरिक क्षति कारित कर उसकी मृत्यु अग्रसारित करता है तो यह माना जायेगा कि उसने उसकी मृत्यु कारित किया। किन्तु यह आवश्यक है कि धारा 299 में वर्णित आपराधिक मानव-वध के अपराध का कोई भी एक तत्व निश्चयतः उपस्थित हो दूसरे शब्दों में, यदि इस प्रकार कारित उपहति धारा 299 में अपेक्षित आशय या ज्ञान से नहीं की गयी थी तो कार्य आपराधिक मानव-वध का अपराध नहीं होगा।
    2.जहां कि शारीरिक क्षति से मॄत्यु कारित की गई हो, वहां जिस व्यक्ति ने, ऐसी शारीरिक क्षति कारित की हो, उसने वह मॄत्यु कारित की है, यह समझा जाएगा, यद्यपि उचित उपचार और कौशलपूर्ण चिकित्सा करने से वह मॄत्यु रोकी जा सकती थी। इस स्पष्टीकरण के अनुसार इस तर्क को कि समुचित उपचार तथा कौशलपूर्ण दवा से मृत्यु निवारित की जा सकती थी कि किसी अभियोजन को विनष्ट करने के प्रयोजन से नहीं उठाने दिया जायेगा, क्योंकि वह सदैव क्षतिग्रस्त व्यक्ति की पहुँच के अन्तर्गत नहीं होता। अत: यदि मृत्यु स्वेच्छया कारित उपहति के कारण होती है, तो जो व्यक्ति ऐसी क्षति कारित करता है ऐसा माना जायेगा कि उसी ने मृत्यु कारित किया है, भले ही क्षतिग्रस्त व्यक्ति को समुचित उपचार तथा कौशलपूर्ण दवा-दारू से बचाया जा सकता था, और यह कि यदि दी गई चिकित्सीय सुविधा समुचित सुविधा नहीं थी तो भी वह दोषी माना जायेगा, यदि चिकित्सीय सुविधा किसी सक्षम फिजीशियन या सर्जन द्वारा सद्भावपूर्वक प्रदान की गयी थी। उदाहरण के लिये यदि अपनी पत्नी पर पैर से प्रहार करता है तथा सर्जन ब्रांडी का प्रयोग पौष्टिक औषधि के रूप में करता है। कुछ ब्रांडी किसी गलत जगह पहुँच कर उसके फेफड़े में पहुँच जाती है जिससे उसकी मृत्यु कारित होनी सम्भाव्य है। अभियुक्त मानव-वध का दोषी होगा।स्पष्टीकरण
  2. मां के गर्भ में स्थित किसी शिशु की मॄत्यु कारित करना मानव वध नहीं है। किन्तु किसी जीवित शिशु की मॄत्यु कारित करना आपराधिक मानव वध की कोटि में आ सकेगा, यदि उस शिशु का कोई भाग बाहर निकल आया हो, यद्यपि उस शिशु ने श्वास न ली हो या वह पूर्णतः उत्पन्न न हुआ हो। इस स्पष्टीकरण में यह प्रावधान किया गया है कि माता के गर्भ में शिशु की मृत्यु कारित करना मानव-वध नहीं है। किन्तु किसी ऐसे जीवित शिशु की मृत्यु कारित करना जिसके शरीर का कोई भाग माता के गर्भ से बाहर निकल चुका था, भले ही शिशु ने श्वांस न लिया रहा हो या वह पूर्णतया पैदा न हुआ रहा हो, आपराधिक मानव-वध होगा। यह आवश्यक नहीं है कि शिशु पूर्ण रूप से पैदा हो गया रहा हो। किसी अनिश्चित समय जिसे पूर्णतया परिभाषित करना दुष्कर होगा तथा जो शिशु-वध के अनेक प्रकरणों में साक्ष्य की कठिनाई को और विस्तृत करता है, के बदले एक सुनिश्चित तथा ग्राह्य समय बिन्दु अभिनिर्धारित किया गया है जो यह इंगित करता है कि कब कोई शिशु आपराधिक मानव-वध का विषय-वस्तु बन सकता है।

आपराधिक मानव वध के निम्नलिखित तत्व है

  1. किसी मानव की मृत्यु कारित की गई हो ;
  2. ऐसी मृत्यु कोई कृत्य करके कारित की गई हो ;
  3. कृत्य - (क) वह कृत्य मृत्यु कारित करने के आशय से किया गया हो ; या (ख) कृत्य कोई ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से किया गया हो, जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु कारित हो जाना सम्भाव्य हो ; या (ग) यह ज्ञान रखते हुए किया गया हो कि यह सम्भाव्य है कि उस कार्य से वह मृत्यु कारित कर देगा।

आशय का तात्पर्य है परिणाम की प्रत्याशा। आशय का निष्कर्ष अभियुक्त द्वारा किये गये कार्य तथा मामले की परिस्थितियों से निकाला जाता है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर भरी बन्दूक से गोली चलाता है तो यह निष्कर्ष निकलता है कि उसका आशय मृत्यु कारित करने का था।

इन दोनों पदावलियों ‘‘मृत्यु कारित करने का आशय” तथा ‘‘ऐसी शारीरिक उपहति कारित करने का आशय जिससे मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है” में अन्तर केवल उनकी आपराधिकता की मात्रा में है। प्रथम पदावली की अपेक्षा दूसरी पदावली में आपराधिकता की मात्रा कम होती है। किन्तु दोनों में उद्देश्य चूंकि एक ही होता है अत: दोनों मामलों के लिये एक ही प्रकार के दण्ड का प्रावधान प्रस्तुत किया गया है।

पदावली ‘‘ऐसी उपहति कारित करने का आशय जिससे मृत्यु होनी सम्भाव्य है” का तात्पर्य है, एक विशिष्ट प्रकार की क्षति कारित करना और क्षति ऐसी हो जिससे मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है। यहाँ न तो मृत्यु ही आशयित होती है और न तो क्षति का प्रभाव ही। इस धारा में आवश्यक नहीं है कि क्षति के परिणामों का पूर्वाभास हो, इतना ही पर्याप्त होगा कि क्षति कारित करने का आशय था और क्षति मृत्यु कारित करने की सम्भावना से युक्त थी।

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जो कोई मृत्यु कारित करता है

इस धारा में प्रयुक्त ‘‘मृत्यु” शब्द का तात्पर्य है किसी मानव की मृत्यु। किसी अजन्मे शिशु जैसे माँ के गर्भ में स्थित शिशु की मृत्यु इस धारा के अन्तर्गत नहीं आती। इस धारा के अन्तर्गत यह भी आवश्यक नहीं है कि उसी व्यक्ति की मृत्यु की जाये जिसकी मृत्यु कारित करने का आशय था। अपेक्षित व्यक्ति से भिन्न किसी अन्य व्यक्ति की यदि मृत्यु कर दी जाती है तो भी वह मृत्यु आपराधिक मानव-वध की कोटि में आयेगी। आपराधिक मानव-वध का अपराध उसी क्षण पूर्ण हो जाता है जिस क्षण अभियुक्त द्वारा किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और अभियुक्त मृत्यु कारित करने के आशय से या शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से जिससे मृत्यु कारित हो जाना सम्भाव्य हो या यह ज्ञान रखते हुये कि वह उस कार्य से मृत्यु कारित कर देगा, अभियुक्त कोई कार्य करता है तो वह आपराधिक मानव-वध का दोषी होगा।

किसी कार्य द्वारा मृत्यु कारित करना

मृत्यु कारित करने के विभिन्न प्रक्रम हैं, जैसे भूख, विषपान, प्रहार, डुबोना या आघात पहुँचाने वाले किसी समाचार की सूचना देना इत्यादि। इस धारा के अन्तर्गत कार्य शब्द में अवैध लोप भी सम्मिलित है। कोई लोप अवैध है, यदि वह कोई अपराध है, यदि वह विधि के किसी निर्देश को भंग करता है, या यदि वह ऐसा दोष है जो सिविल कार्यवाही के लिये उत्तम आधार उत्पन्न करता है। अत: अवैध लोप द्वारा कारित की गयी मृत्यु आपराधिक मानव-वध है। यदि कोई जेलर किसी कैदी को खाद्य सामग्री से वंचित कर उसकी मृत्यु कारित करता है या यदि कोई नर्स किसी बच्चे को जो उसे न्यस्त किया गया था, पानी के टब में से जिसमें वह गिर गया था निकालने में लोप कर स्वेच्छया उस बच्चे की मृत्यु कारित करती है या यदि किसी जेल का डाक्टर चिकित्सीय सुविधा से वंचित कर किसी कैदी की मृत्यु कारित करता है तो वह जेलर, नर्स या डाक्टर हत्या का दोषी होगा। अ एक भिक्षुक ब को खाद्य सामग्री देने में लोप करता है। अ इस धारा में वर्णित अपराध का दोषी नहीं है, क्योंकि ब, अ से मानवता के अतिरिक्त किसी अन्य दावे या मांग की अपेक्षा नहीं कर सकता। एक चपरासी अ की नियुक्ति इसलिये की गयी थी कि वह यात्रियों को इस बात की चेतावनी दे कि वह पैदल नदी में घुसकर उसे पार करने का प्रयत्न न करे। अ, ब को यह बताने में लोप करता है कि नदी में पानी बहुत अधिक है, अत: वह उसे सुरक्षित रूप से पार नहीं कर सकता और इस लोप द्वारा वह ब की स्वेच्छया मृत्यु कारित करता है यह हत्या है। यह तब भी हत्या ही होगा यदि अ एक गाइड है और उसने ब से उसे पार कराने के लिये संविदा किया था। क्योंकि ऐसी स्थिति में उसका दायित्व विधिक होगा न कि मानवीय।

शब्दों के प्रभाव द्वारा कारित की गयी मृत्यु

शब्दों के प्रभाव द्वारा भी मृत्यु कारित की जा सकती है। उदाहरण के लिये किसी व्यक्ति को ऐसी सूचना देना जिससे वह उत्तेजित हो जाता है और उत्तेजना की परिणति उसकी मृत्यु में होती है, यद्यपि यह सिद्ध करना दुष्कर होगा कि उस व्यक्ति ने जिसके मुख से शब्द मुखरित हुये थे, ऐसे किसी परिणाम की परिकल्पना की थी जिसकी परिकल्पना विशिष्ट परिस्थिति के अन्तर्गत और संरचना के आधार पर ही की जा सकती है। अन्यथा केवल शब्दों में ऐसे परिणाम की अभिकल्पना नहीं की जा सकती। अ यदि उपरोक्त आशय या ज्ञान से ब को जो किसी घातक बीमारी के कारण गंभीर हालत में है, कोई उत्तेजित या प्रदीप्त करने वाली सूचना देता है और इस सूचना के कारण उसकी मृत्यु हो जाती है। अ आपराधिक मानव-वध के लिये उत्तरदायी होगा। इसी प्रकार यदि अ उपरोक्त आशय या ज्ञान से ब को यह विकल्प देता है कि वह या तो अपनी हत्या कर ले या चिरकालिक यन्त्रणा भुगतने को तैयार रहे। ब विषपान द्वारा अपनी हत्या कर लेता है। अ आपराधिक मानव वध के लिये उत्तरदायी होगा। इस संहिता के मूल ड्राफ्ट में यही दोनों दृष्टान्त प्रस्तावित थे।

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घोर उपेक्षा

घोर उपेक्षा भी कभी-कभी ज्ञान के तुल्य हो सकती है। यदि कोई व्यक्ति उपेक्षा पूर्वक कार्य करता है या बिना उपयुक्त सावधानी बरते कार्य करता है तो यह अभिकल्पना की जायेगी कि उसके कृत्यों से उत्पन्न होने वाले परिणामों का ज्ञान था। कांगला के बाद में अभियुक्त ने एक व्यक्ति पर गदा से प्रहार किया। प्रहार करते समय उसे ऐसा विश्वास था कि जिस वस्तु पर वह प्रहार कर रहा है वह कोई मानव नहीं बल्कि एक अलौकिक वस्तु है किन्तु प्रहार के पूर्व उसने यह सुनिश्चित करने का प्रयास नहीं किया कि वह कोई मानव है या नहीं। चूंकि अभियुक्त ने घोर उपेक्षा से बिना यह सुनिश्चित किये कि जिस वस्तु पर प्रहार कर रहा है मानव है या नहीं, कार्य किया था इसलिये वह हत्या की कोटि में न आने वाले आपराधिक मानव-वध का दोषी घोषित किया गया।

मृत्यु ही कारित करना हो, इतना ही पर्याप्त होगा यदि उसका आशय ऐसी शारीरिक क्षति कारित करना था जिससे मृत्यु होनी सम्भाव्य थी। ‘कार्य” तथा कार्य द्वारा कारित मृत्यु के बीच सीधा और प्रत्यक्ष सम्बन्ध होना चाहिये। यह आवश्यक नहीं है कि मृत्यु कार्य का शीघ्रगामी परिणाम हो परन्तु इसे दूरगामी परिणाम भी नहीं होना चाहिये। यदि कार्य तथा मृत्यु के बीच अस्पष्ट सम्बन्ध है या यदि समवर्ती कारणों द्वारा यह सम्बन्ध हो जाता है या यदि पश्चात्वर्ती कारणों से उत्पन्न व्यवधान से यह सम्बन्ध टूट जाता है या यदि कार्य तथा मृत्यु के बीच समय का बहुत लम्बा अन्तराल व्यतीत होता है तो उपरोक्त शर्त पूर्ण नहीं होती है। मुहम्मद हुसैन के वाद में न्यायमूर्ति ग्रोवर ने कहा है कि मृत्यु तथा हिंसात्मक कार्य के बीच सीधा सम्बन्ध होना आवश्यक है और यह सम्बन्ध कारणों और परिणामों की केवल एक श्रृंखला द्वारा ही नहीं होना चाहिये अपितु ऐसा होना चाहिये, जिससे अपेक्षित परिणाम का परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए बिना सृजित होना सम्भाव्य हो।

धारा २९९ में वर्णित अपराध कारित करने की दशा में दण्ड धारा ३०४ में वर्णित है। जो कोई ऐसा आपराधिक मानव-वध करेगा, जो हत्या की कोटि में नहीं आता है, यदि वह कार्य जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गई है,

  1. मृत्यु कारित करने के आशय से किया गया है, या
  2. ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से किया गया है जिससे मृत्यु होना सम्भाव्य है,
  3. तो वह आजीवन कारावास से, या
  4. दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि १० वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जायेगा।
  5. यदि वह कार्य इस ज्ञान के साथ की उससे मृत्यु कारित करना सम्भाव्य है, किन्तु मृत्यु या ऐसी शारीरिक क्षति, जिससे मृत्यु कारित करना सम्भाव्य है, कारित करने के किसी आशय के बिना किया जाये, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जायेगा।

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न्याय दृष्टांत

कुसामाझी बनाम उड़ीसा राज्य (1985) Cr. L.J. 1460

इस वाद में मृतक ने, अभियुक्त को जो उसका अपना पुत्र था, इसलिये खरी-खोटी सुनाया कि वह मछली पकड़ने के लिये नहीं जा रहा था। इस बात पर चिढ़ कर उसने कुल्हाड़ी से अपनी माँ के कन्धे पर प्रहार किया जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। प्रहार करने से पूर्व अभियुक्त का आशय अपनी माँ की हत्या करना नहीं था न ही उसकी कोई पूर्व-योजना थी। चोट न तो सिर पर लगी थी और न ही गले पर। यह अभिनिर्णीत हुआ कि वह सदोष मानव-वध का दोषी है न कि धारा 300 के अन्तर्गत हत्या का। अभियुक्त ने केवल शारीरिक उपहति कारित किया था और वह भी क्षणिक आवेश में। अत: यह मामला धारा 299 के अन्तर्गत आयेगा।

लक्ष्मण कालू (1968) B.L.R. 244 SC

इस प्रकरण में अभियुक्त ससुराल से अपनी पत्नी को लिवाने गया था। अभियुक्त तथा उसके साले में विदाई के प्रश्न पर कि वे उसी रात्रि की ट्रेन से जायेंगे या दूसरे दिन सुबह की ट्रेन से जायेंगे, कुछ झडप हो गयी। झड़प के दौरान वह अपने पर काबू नहीं रख सका और अपने साले के सीने पर बलपूर्वक चाकू से प्रहार कर दिया जिससे साले की मृत्यु हो गयी। यह अभिनिर्धारित किया गया कि अ हत्या की कोटि में न आने वाले आपराधिक मानव-वध के अपराध के लिये धारा 304 खण्ड II के द्वितीय भाग के अन्तर्गत दण्डनीय होगा, क्योंकि मृत्यु एक ऐसे कार्य द्वारा की गयी थी जिससे मृत्यु कारित होना सम्भाव्य थी और जिसे अभियुक्त जानता था।

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