संक्षिप्त विचारण - Summary Trials - Chapter 21 Section 260 to 265 - CrPC 1973

संक्षिप्त विचारण - Summary Trials - Chapter 21 Section 260 to 265 - CrPC 1973

प्रावधान

अपील से संबंधित उपबंध दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 के अध्याय 21, धारा 260 से 265 में वर्णित है। **धारा २६०(१)**के अन्तर्गत उल्लिखित अपराधों के विचारण के लिए संक्षिप्त प्रक्रिया (धारा २६० से २६५) को अपनाया जाता है, जिसे संक्षिप्त विचारण के नाम से अभिहित किया जाता है। संक्षिप्त विचारण की प्रक्रिया भी वही होती है जो समन मामलों में होती है, अन्तर केवल उस सीमा तक होता है, जिन्हें इस अध्याय के अन्तर्गत विर्निदष्ट कर दिया गया है।

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धारा 260 संक्षिप्त विचारण करने की शक्ति

संक्षिप्त विचारण करने की शक्ति मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, महानगर मजिस्ट्रेट तथा प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट जो उच्च न्यायालय द्वारा सशक्त किया गया है, को दी गयी है।

निम्न प्रकार के अपराधों का संक्षिप्त विचारण किया जा सकता है

  1. दो वर्ष तक के कारावास से दण्डनीय अपराध।
  2. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 379 , 380 , 381 के अधीन चोरी का अपराध या धारा 411 के अंतर्गत चोरी की संपत्ति प्राप्त करने व रखने का अपराध या धारा 414 के अंतर्गत चुराई हुई संपत्ति को छिपाने या उसका व्यय करने में सहायता करना जहां कि इन सभी मामलों में ऐसी संपत्ति का मूल्य 2000 रुपये से ज्यादे नही है।
  3. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 454 और 456 के अधीन अपराध।
  4. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 504 के अंतर्गत लोक शांति भंग करने के लिए प्रकोपित करने के आशय से अपमान या धारा 506 के अधीन आपराधिक अभित्रास जो दो वर्ष का कारावास या जुर्माना या दोनों से दण्डनीय है।
  5. उपरोक्त अपराधों में से किसी का दुष्प्रेरण या प्रयत्न , जब वह स्वयं अपराध हो।
  6. ऐसे कार्य के बावत कोई अपराध जिसके बावत पशु अतिचार अधिनियम , 1871 की धारा 20 के अधीन परिवाद किया गया है। यह आवश्यक नही है कि इन अपराधों का आवश्यक रूप से संक्षिप्त विचारण ही हो यह मजिस्ट्रेट के विवेक पर निर्भर करता है।

इस सम्बन्ध में कोई निदेशक सिद्धांत नही हैं कि किन मामलो में संक्षिप्ततः विचारण किया जाना चाहिए।

सीताराम राजू बनाम सियाराम राजू के वाद में मद्रास उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि केवल इस आधार पर कि कोई निदेशक सिद्धांत इस शक्ति के प्रयोग के लिए नही बताये गये हैं, यह धारा असंवैधानिक नही है।

रुली राय बनाम सहायक कलेक्टर के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि सीमा शुल्क अधिनियम, 1952 की धारा 138 के अनुसार तीन वर्ष के कारावास से दण्डनीय अपराध भी संक्षिप्ततः विचारणीय हैं ।

लोक अभियोजक बनाम श्री अंजनेयलू, 1986 के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अधीन अपराध इस अधिनियम के अंतर्गत संक्षेपतः विचारणीय हैं।

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धारा 261 - द्वितीय वर्ग के मजिस्ट्रेट के द्वारा संक्षिप्त विचारण

संक्षिप्त विचारण की प्रक्रिया वस्तुतः नियमित विचारण का ही एक लघुकृत स्वरूप होने के कारण केवल वरिष्ठ तथा अनुभवी न्यायिक मजिस्ट्रेटो द्वारा ही ऐसे मामलों में विचारण किया जाना उचित माना गया है।यदि कोई मजिस्ट्रेट जिसे विधि द्वारा संक्षिप्त विचारण की शक्ति नही दी गयी है, किसी अपराध का संक्षिप्त विचारण करता है, तो उसके द्वारा की गयी ऐसी कार्यवाही दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 461 के खण्ड (m) के अनुसार पुर्णतः शून्य एवं अविधिमान्य होगी।इस धारा में द्वितीय वर्ग के मजिस्ट्रेटो को प्राप्त संक्षिप्त विचारण की शक्ति का वर्णन है। ऐसा द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट जिसे उच्च न्यायालय द्वारा संक्षिप्त विचारण करने की शक्ति प्रदान की गयी है, केवल अर्थदण्ड से या अर्थदण्ड सहित या रहित छ : माह से अनधिक कारावास के दण्ड से दण्डनीय अपराधों को संक्षिप्त परिक्षण द्वारा निपटाने के लिए सक्षम होता है। ऐसा मजिस्ट्रेट उक्त अपराधों के दुष्प्रेरण या प्रयत्न के मामले भी संक्षिप्त विचारण द्वारा निपटा सकता है।

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धारा 262 - संक्षिप्त विचारण की प्रक्रिया

  1. उपधारा (1) यह उल्लेख करती है कि संक्षिप्त विचारण में समन मामले हेतु निर्धारित प्रक्रिया का अनुपालन किया जाना चाहिए। यह उपबंध आदेशात्मक है।
  2. उपधारा (2) में संक्षिप्त विचारण के मामले में अधिकतम कारावास के दण्ड की सीमा निर्धारित की गयी है। इसके अनुसार एक से अधिक अपराधों की दशा में संक्षिप्त विचारण में दोषसिद्ध अपराधी को देय कारावास की सजा कुल मिलकर तीन माह से अधिक नही हो सकती। मजिस्ट्रेट प्रत्येक अपराध के लिए तीन माह के कारावास का दण्ड दे सकता है, लेकिन ये दण्ड साथ साथ चलेंगे न कि एक के बाद दूसरा। इसमें जुर्माना का भुगतान न किये जाने के कारण विकल्प में दिए गये कारावास के दण्ड की अवधि की गणना नही होगी अर्थात ये अवधि उस अवधि के अतिरिक्त होगा। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि जर्माने के सन्दर्भ में कोई सीमा निर्धारित नही की गयी है।

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धारा 263 - संक्षिप्त विचारण में अभिलेख

संक्षिप्त विचारण के मामले में सभी विशिष्टियों को ऐसे प्रारूप में अभिलिखित किया जाएगा जैसा कि राज्य सरकार निर्दिष्ट करे। इस धारा के अधीन संक्षिप्त विचारण के मामले में विशिष्टियां मजिस्ट्रेट के द्वारा स्वयं अभिलिखित किया जाना अनिवार्य है। इस हेतु वह किसी अन्य को प्रतिनियुक्त नही कर सकेगा। इसी प्रकार उसे अपने हस्ताक्षर स्वयं करने होंगे तथा इस हेतु हस्ताक्षर की मुहर मात्र लगाना पर्याप्त नही होगा। विचारण की प्रविष्टियां संक्षिप्त विचारण के दौरान ही की जानी चाहिए न कि स्मरणशक्ति के आधार पर विचारण के पश्चात।

इसमें निम्न समाविष्ट होंगे

  1. मामले की क्रम संख्या;
  2. अपराध किये जाने की तारीख;
  3. रिपोर्ट या परिवाद की तारीख;
  4. परिवादी (यदि कोई हो) का नाम;
  5. अभियुक्त का नाम, उसके माता पिता का नाम और उसका निवास स्थान;
  6. वह अपराध जिसका परिवाद किया गया है और वह अपराध जो साबित हुआ है साथ ही यदि अपराध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 379, 380, 381, 411, 414 के अधीन आने वाले मामलों का है तो उस संपत्ति का मूल्य, जिसके बारे में अपराध किया गया है;
  7. अभियुक्त का अपराध के विषय में अभिवाक और उसकी परीक्षा यदि मजिस्ट्रेट द्वारा की गयी हो;
  8. मजिस्ट्रेट का निष्कर्ष जो उसने दोनों पक्षकारों के साक्ष्य पर विचार करके निकाला हो;
  9. दण्ड का अंतिम आदेश;
  10. कार्यवाही समाप्त होने की तारीख

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धारा 264 - संक्षेपतः विचारित मामलो में निर्णय

इस धारा के अनुसार प्रत्येक ऐसे संक्षिप्त विचारण के मामले में जिसमे अभियुक्त दोषी होने का अभिवाक नही करता है, मजिस्ट्रेट साक्ष्य के सारांश तथा अपने निष्कर्ष के कारणों का उल्लेख निर्णय में करेगा। इस धारा का उद्देश्य मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गये निर्णय के विरुद्ध अपील की दशा में अपीलीय न्यायालय को समुचित जानकारी उपलब्ध कराना है। यदि मजिस्ट्रेट ने साक्ष्य के सारांश का उल्लेख अपने निर्णय में नही किया है, तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय के द्वारा सम्राट बनाम करण सिंह के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि वह साक्षियों का पुनः परिक्षण करके या पुनः संक्षिप्त विचारण की कार्यवाही करके इस कमी को पूरा कर सकता है।

धारा 265 - अभिलेख और निर्णय की भाषा

  1. उपधारा (1) इस धारा के अनुसार पूर्ववर्ती धारा 264 में उल्लिखित संक्षिप्त विचारण के साक्ष्य का सारांश तथा मजिस्ट्रेट का निर्णय न्यायालय में प्रयुक्त भाषा में लिखा जाना अनिवार्य है।
  2. उपधारा (2) में यह भी उल्लेख है कि ऐसे अभिलेख तथा निर्णय पर मजिस्ट्रेट द्वारा स्वयं हस्ताक्षर किये जायेंगे। उसे अपना पूरा नाम हस्ताक्षरित करना आवश्यक है।

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