आपराधिक मामलों का स्थानांतरण (Transfer of Criminal Cases) – CrPC 1973 Chapters 31 – Section 406 – 412

दंड प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code) 1973 के चैप्टर 31 में सेक्शन 406 से लेकर सेक्शन 412 तक का विवरण दिया गया है, जो सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के केस ट्रांसफर करने की पावर से के बारे में बताया गया है। किसी केस या अपील को एक राज्य से दूसरे राज्य में ट्रांसफर करने का अधिकार सिर्फ सुप्रीम कोर्ट को है और उसे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 406 से यह अधिकार मिलता है। ह अध्याय एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय में मामलो के अंतरण से सम्बंधित है। किसी मामले को किसी न्यायालय में अंतरित कराने के लिए बहुत से कारण हो सकते हैं, जैसे कि –

  1. न्यायालय से न्याय न मिलने की आशंका
  2. पक्षकारो की सुविधा
  3. न्याय के हित में अन्य कारण

उदाहरण स्वरूप : सेशन न्यायालय में उसी राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के निकट सम्बन्धी के विरुद्ध मामला हो तो अन्य राज्य में मामला अंतरित करना उचित है।

पढ़ें - अपील | Appeal | CrPC Chapter 29 Sec. 372-394 | दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 | Criminal Procedure Code 1973

मामलों और अपीलों को अन्तरित करने की उच्चतम न्यायालय की शक्ति (Power of Supreme Court to transfer cases and appeals) CrPC 1973 Section 406

  1. जब कभी उच्चतम न्यायालय को यह प्रतीत कराया जाता है कि न्याय के उद्देश्यों के लिए यह समीचीन है कि इस धारा के अधीन आदेश किया जाए, तब वह निदेश दे सकता है कि कोई विशिष्ट मामला या अपील एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय को या एक उच्च न्यायालय के अधीनस्थ दंड न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय के अधीनस्थ समान या वरिष्ठ अधिकारिता वाले दूसरे दंड न्यायालय को अन्तरित कर दी जाए।
  2. उच्चतम न्यायालय भारत के महान्यायवादी या हितबद्ध पक्षकार के आवेदन पर ही इस धारा के अधीन कार्य कर सकता है और ऐसा प्रत्येक आवेदन समावेदन द्वारा किया जाएगा जो उस दशा के सिवाय, जब कि आवेदक भारत का महान्यायवादी या राज्य का महाधिववक्ता है, शपथपत्र या प्रतिज्ञान द्वारा समर्थित होगा।
  3. जहां इस धारा द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिए कोई आवेदन खारिज कर दिया जाता है वहां, यदि उच्चतम न्यायालय की यह राय है कि आवेदन तुच्छ या तंग करने वाला था तो वह आवेदक को आदेश दे सकता है कि वह एक हजार रुपए से अनधिक इतनी राशि, जितनी वह न्यायालय उस मामले की परिस्थितियों में समुचित समझे, प्रतिकर के तौर पर उस व्यक्ति को दे जिसने आवेदन का विरोध किया था।

पढ़ें - निर्देश और पुनरीक्षण Reference and Revision - CrPC Chapter 30 Section 395-405

मामलों और अपीलों को अन्तरित करने की उच्च न्यायालय की शक्ति (Power of High Court to transfer cases and appeals) CrPC 1973 Section 407

(1) जब कभी उच्च न्यायालय को यह प्रतीत कराया जता है कि

(क) उसके अधीनस्थ किसी दण्ड न्यायालय में ऋजु और पक्षपात रहित जांच या विचारण न हो सकेगा; अथवा

(ख) किसी असाधारणत: कठिन विधि प्रश्न के उठने की संभाव्यता है; अथवा

(ग) इस धारा के अधीन आदेश इस संहिता के किसी उपबन्ध द्वारा अपेक्षित है, या पक्षकारों या साक्षियों के लिए साधारण सुविधाप्रद होगा, या न्याय के उद्देश्यों के लिए समीचीन है, तब वह आदेश दे सकेगा कि–

(I) किसी अपराध की जांच या विचारण ऐसे किसी न्यायालय द्वारा किया जाए जो ऐसे अपराध की जांच या विचारण करने के लिए अन्यथा सक्षम है;

(II) कोई विशिष्ट मामला या अपील या मामलों या अपीलों का वर्ग उसके प्राधिकार के अधीनस्थ किसी दण्ड न्यायालय ऐसे समान या वरिष्ठ अधिकारिता वाले किसी अन्य दण्ड न्यायालय को अंतरित कर दिया जाए;

(III) कोई विशिष्ट मामला सेशन न्यायालय को विचारणार्थ सुपुर्द कर दिया जाए; अथवा

(IV) कोई विशिष्ट मामला या अपील स्वयं उसको अन्तरित कर दी जाए और उसका विचारण उसके समक्ष किया जाए।

(2) उच्च न्यायालय निचले न्यायालय की रिपोर्ट पर, या हितबद्ध पक्षकार के आवेदन पर या स्वप्रेरणा पर कार्यवाही कर सकता है: परन्तु किसी मामले को एक ही सेशन खण्ड के एक दण्ड न्यायालय से दूसरे दण्ड न्यायालय को अन्तरित करने के लिए आवेदन उच्च न्यायालय से तभी किया जाएगा जब ऐसा अन्तरण करने के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश को कर दिया गया है और उसके द्वारा नामंजूर कर दिया गया है।

(5) ऐसा आवेदन करने वाला प्रत्येक अभियुक्त व्याqक्त लोक अभियोजक को आवेदन की लिखित सूचना उन आधारों की प्रतिलिपि के सहित देगा जिन पर वह किया गया है और आवेदन के गुणागुण पर तब तक कोई आदेश न किया जाएगा जब तक किसी सूचना के दिए जाने और आवेदन की सुनवाई के बीच कम से कम चौबीस घण्टे न बीत गए हों।

पढ़ें - वारण्ट-मामलों का विचारण | Trial of Warrant Cases by Magistrates | CrPC 1973 | Chapters19 | Section 238-250

मामलों और अपीलों को अन्तरित करने की सेशन न्यायाधीश की शक्ति (Power of Sessions Judge to transfer cases and appeals) CrPC 1973 Section 408

सेशन न्यायालय को यह अधिकार है कि वह अपने सेशन खण्ड के एक न्यायालय से अपने ही सेशन खण्ड के दूसरे न्यायालय में मामले का अंतरण कर सकता है। यह कार्यवाही वह किसी पक्षकार के आवेदन पर अथवा स्वयं या अवर न्यायालय की रिपोर्ट पर कर सकता है। सेशन न्यायालय अपने सेशन खण्ड में स्थित अवर सेशन न्यायालय से अपने ही सेशन खण्ड में स्थित दूसरे अवर सेशन न्यायालय में मामला अंतरित कर सकता है। इस धारा के अधीन प्रतिकर की धनराशी 250 रूपये तक हो सकेगी।

सेशन न्यायाधीशों द्वारा मामलों और अपीलों का वापस लिया जाना (Withdrawal of cases and appeals by Sessions Judges) CrPC 1973 Section 409

  1. सेशन न्यायाधीश अपने अधीनस्थ किसी सहायक सेशन न्यायाधीश या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से कोई मामला या अपील वापस ले सकता है या कोई मामला या अपील, जिसे उसने उसके हवाले किया हो, वापस मंगा सकता है।
  2. अपर सेशन न्यायाधीश के समक्ष मामले का विचारण या अपील की सुनवाई प्रारंभ होने से पूर्व किसी समय सेशन न्यायाधीश किसी मामले या अपील को, जिसे उसने अपर सेशन न्यायाधीश के हवाले किया है, वापस मंगा सकता है।
  3. जहां सेशन न्यायाधीश कोई मामला या अपील उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन वापस मंगाता है या वापस लेता है वहां वह, यथास्थिति, या तो उस मामले का अपने न्यायालय में विचारण कर सकता है या उस अपील को स्वयं सुन सकता है या उसे विचारण या सुनवाई के लिए इस संहिता के उपबंधों के अनुसार दूसरे न्यायालय के हवाले कर सकता है।

पढ़ें - सेशन न्यायालय के समक्ष विचारण CrPC 1973 - Trial before the court of Sessions

न्यायिक मजिस्ट्रेटों द्वारा मामलों का वापस लिया जाना (Withdrawal of cases by Judicial Magistrates) CrPC 1973 Section 410

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को यह शक्ति है कि वह किसी मामले को जो उसने अपने अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट को भेजा था, वापस मंगा ले और या तो स्वयं उसे तय करे या सक्षम मजिस्ट्रेट को तय करने के लिए भेज दे।

कोई न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी मामले को, जो उसने धारा 192 की उपधारा (2) के अधीन किसी अन्य मजिस्ट्रेट के हवाले किया है, वापस मंगा सकता है और ऐसे मामले की जांच या विचारण स्वयं कर सकता है।

करुप्पन बनाम एन. मोहन, 1982 के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी उपखण्ड मजिस्ट्रेट के यहाँ से उस परिस्थिति में भी मामला वापस मंगा सकता है जबकि उसने संज्ञान ले लिया हो और विचारण भी प्रारम्भ कर दिया हो।

कार्यपालक मजिस्ट्रेटों द्वारा मामलों का अपने अधीनस्थ मजिस्ट्रेट के हवाले किया जाना या वापस लिया जाना (Making over or withdrawal of cases by Excutive Magistrates) CrPC 1973 Section 411

कोई जिला मजिस्ट्रेट या उपखण्ड मजिस्ट्रेट –

(क) किसी ऐसी कार्यवाही जो उसके समक्ष आरम्भ हो चुकी है, निपटाने के लिए अपने अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट के हवाले कर सकता है।

(ख) अपने अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट से किसी मामले को वापस ले सकता है या किसी मामले को, जिसे उसने ऐसे मजिस्ट्रेट के हवाले किया हो, वापस मंगा सकता है और ऐसी कार्यवाही को स्वयं निपटा सकता है या उसे निपटाने के लिए निर्देशित कर सकता है।

इस धारा के अधीन जिला मजिस्ट्रेट या उपखण्ड मजिस्ट्रेट को प्राप्त शक्ति व्यापक होने के कारण उनके द्वारा इस शक्ति का प्रयोग अत्यंत सावधानीपूर्वक किया जाना अपेक्षित है। इस शक्ति का प्रयोग केवल तभी किया जाना चाहिए जब ऐसा करना अत्यंत आवश्यक तथा न्यायहित में हो।

यदि कोई कार्यवाही उपखण्ड मजिस्ट्रेट के पास लंबित हो, तो ऐसी कार्यवाही के अंतरण सम्बन्धी आवेदन को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए तथा सेशन न्यायाधीश द्वारा उसकी सुनवाई नहीं की जानी चाहिए। जहां जिला मजिस्ट्रेट ने किसी मामले को अपने अधीनस्थ किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को अंतरित किया हो और वह कार्यपालक मजिस्ट्रेट उपखण्ड मजिस्ट्रेट के भी अधीनस्थ हो, तो ऐसी दशा में उपखण्ड मजिस्ट्रेट उस मामले को स्वयं के पास पुनः अंतरित करने के लिए सक्षम नही होगा।

पढ़ें - आरोप और आरोप की अंतर्वस्तु | Charge & it’s content | CrPC Chapter 17 Sec. 211-224

कारणों का अभिलिखित किया जाना (Reasons to be recorded) CrPC 1973 Section 412

धारा 408, धारा 409, धारा 410 या धारा 411 के अधीन आदेश करने वाला सेशन। न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट ऐसा आदेश करने के अपने कारणों को अभिलिखित करेगा।

पढ़ें - संक्षिप्त विचारण - Summary Trials - Chapter 21 Section 260 to 265 - CrPC 1973

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