हिंदू विवाह (Hindu Marriage) | Family Law | Hindu Law

हिंदू विवाह (Hindu Marriage) का आदर्श हमेशा उच्च रहा है। वैदिक युग से आज तक वैवाहिक संबंध को हमेशा पवित्र और पावन माना गया है। विवाह = वि+वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है – विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना। पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से हिंदू विवाह के नाम से जाना जाता है। हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संम्बंध से अधिक आत्मिक संम्बंध होता है और इस संम्बंध को अत्यंत पवित्र माना गया है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार मानव जीवन को चार आश्रमों (ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, सन्यास आश्रम तथा वानप्रस्थ आश्रम) में विभक्त किया गया है और गृहस्थ आश्रम के लिये पाणिग्रहण संस्कार अर्थात् विवाह नितांत आवश्यक है। हिंदू विवाह में शारीरिक संम्बंध केवल वंश वृद्धि के उद्देश्य से ही होता है। विवाह संस्कार’ हिन्दू धर्म संस्कारों में ‘त्रयोदश संस्कार’ है। यह संस्कार पितृ ऋण से उऋण होने के लिए किया जाता है।

विवाह प्रत्येक समाज चाहे वह आदिम समाज या सभ्य समाज की संस्कृति का एक आवश्यक अंग रहा है। क्योंकि यह वह साधन है जिसके आधार पर समाज के प्रारंभिक इकाई परिवार का निर्माण होता है। विवाह एक सामान्य तथा संभावित घटना है। मनु ने स्वीकारा है “जैसे सब जंतु वायु के सहारे जीते हैं वैसे ही सब प्राणी गृहस्थ आश्रम से जीवन धारण करते हैं जैसे सब नदी नद समुद्र में जाकर स्थिर हो जाते हैं वैसे ही तीनों आश्रम गृहस्थी से ही स्थिति प्राप्त करते हैं उसी की सहायता से जीवित हैं हिंदू विवाह इसी गृहस्थ आश्रम में प्रवेश पाने का साधन है।”

हिंदुओं में विवाह को एक धार्मिक संस्कार के रूप में स्वीकार किया गया है। प्रत्येक हिंदू के लिए विवाह एक अनिवार्य कर्तव्य माना गया है। हिंदुओं में चार प्रकार के पुरुषार्थ तथा तीन प्रकार के ऋण का वर्णन है।

हिंदुओं में चार पुरुषार्थ - धर्म अर्थ काम और मोक्ष जिनकी पूर्ति गृहस्थ आश्रम से ही संभव है, और मोक्ष -जीवन का अंतिम लक्ष्य।

हिंदुओं में तीन ऋण - पितृ ऋण ,ऋषि ऋण ,देव ऋण।

पितृ ऋण - संतान उत्पन्न कर व्यक्ति अपने पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है।

ऋषि ऋण - अपने पुत्र को शिक्षित कर व्यक्ति ऋषि ऋण से मुक्त हो जाता है।

देव ऋण - धार्मिक अनुष्ठान एवं यज्ञ करके व्यक्ति अपने देव ऋण से मुक्त हो जाता है।

विवाह चाहे संस्कार माना जाये या अनुबन्ध, यह प्रास्थिति को जन्म देता है। विवाह के पक्षकार पति-पत्नी की प्रास्थिति प्राप्त करते हैं। विवाह की सन्तान धर्मज की प्रास्थिति प्राप्त करती है। लगभग सभी विधि-व्यवस्थाओं में वैध विवाह के लिये दो शर्तों का होना अनिवार्य है।

(क) वैवाहिक सामर्थ्य का होना, और

(ख) वैवाहिक अनुष्ठानों का सम्पन्न करना।

वर्तमान समय में दुनिया के अधिकांश देश दोनों ही शर्तों को विधि द्वारा निर्धारित करते हैं। दोनों शर्तों के पालन करने पर ही विवाह वैध होता है। मनु ने विवाह को यौन संबंधों के उचित नियंत्रण एवं इसलोक से परलोक के सुख के लिए आवश्यक मानते हैं। शास्त्रों में लिखा है कि पति पत्नी एवं बच्चों से युक्त मानो ही पूर्ण मानव है वेदों में अविवाहित व्यक्ति को अपवित्र माना गया है।

जिस प्रकार एक पुरुष बिना विवाह के पूर्ण नहीं माना जाता उसी प्रकार स्त्री भी बिना विवाह के अपूर्ण मानी जाती है। हिंदू शास्त्र के अनुसार स्त्री हो या पुरुष दोनों के लिए विवाह की अनिवार्यता पर विशेष जोर दिया गया है। दोनों के लिए विवाह सोलह संस्कारों में से एक संस्कार है। बिना विवाह के स्त्री या पुरुष दोनों को स्वर्ग नहीं मिल सकता। महाभारत में एक कथा का वर्णन है की कुणी ऋषि की पुत्री सुश्रु तपस्या के बल पर स्वर्ग जाना चाहती थी, परंतु जब नारद जी ने उसे बताया कि विवाह के बिना ऐसा संभव नहीं है तो उसने अपनी तपस्या का आधा भाग श्रृंगावत ऋषि को देखकर विवाह किया तभी वह स्वर्ग जा सकी।

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कुछ विद्वानों के अनुसार हिंदू-विवाह का वर्णन

बोगार्ड्स के अनुसार, विवाह स्त्री और पुरुष को पारिवारिक जीवन में प्रवेश करवाने की एक संस्था है। डॉक्टर कापड़िया के अनुसार हिंदू विवाह को संस्कार के रूप में स्वीकारा है, उनके अनुसार “हिंदू विवाह एक संस्कार हैं।”

विवाह के प्रकार

हिन्दू विवाह का आदर्श हमेशा उच्च रहा है। वैदिक युग से आज तक वैवाहिक सम्बन्ध को हमेशा पवित्र और पावन माना गया है। पत्नी की विधिक स्थिति कुछ भी रही हो, परिवार में उसका स्थान हमेशा आदर और सम्मान का था। बहुपत्नीत्व विवाह मान्य था, परन्तु हिन्दू विवाह के इतिहास में बहुपत्नीत्व विवाह को हेय माना गया है। व्यवहार में बहुत कम लोग एक से अधिक विवाह करते थे। भारत के कुछ भागों में बहुपतित्व विवाह का भी प्रचलन रहा है, परन्तु यह सीमित क्षेत्र में ही प्रचलित था।

आर्य समाज में विवाह पवित्र संस्कार के रूप में माना जाता है। आर्य समाज में विवाह दो प्रकार के होते हैं।

  1. अनुलोम विवाह: उच्च वर्ग का पुरुष और निम्न वर्ग की स्त्री।
  2. प्रतिलोम विवाह: उच्च वर्ग की स्त्री और निम्न वर्ग का पुरुष।

मनुस्मृति में विवाह के 8 प्रकार बताए गए हैं जिनमें से चार विवाह प्रशंसनीय और चार विवाह निंदनीय है।

प्रशंसनीय विवाह

  1. ब्रह्मा विवाह: कन्या के वयस्क होने पर माता-पिता द्वारा किया गया विवाह ब्रह्म विवाह कहलाता है।
  2. दैव विवाह: यज्ञकरने वाले पुरोहित के साथ ,माता-पिता द्वारा अपने कन्या का विवाह दिया जाता था।
  3. आर्ष विवाह: कन्या के पिता द्वारा यज्ञ कार्य हेतु अथवा दो गाय के बदले में अपनी कन्या का विवाह।
  4. प्रजापत्य विवाह: इस विवाह में वर स्वयं कन्या के पिता से कन्या मांग कर विवाह करता था।

निंदनीय विवाह

  1. असुर विवाह: कन्या के पिता द्वारा धन के बदले में कन्या को बेचना।
  2. गंधर्व विवाह: कन्या तथा पुरुष प्रेम विवाह।
  3. पैशाच विवाह: सोई हुई कन्या के साथ सहवास कर विवाह करना।
  4. राक्षस विवाह: बलपूर्वक कन्या को छीन कर उससे विवाह करना।

वर्तमान हिंदू विधि में विवाह का रूप

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 किसी भी प्रकार के विवाह का विनिर्दिष्ट उपबंध नहीं बनाता है। इस अधिनियम के अंतर्गत प्रत्येक विवाह “हिंदू विवाह” कहलाता है। परंतु इसका यह तात्पर्य नहीं है कि अब ब्रह्म और गंधर्व विवाह नहीं हो सकते। यह विवाह अब भी हो सकते हैं।

विवाह के पक्ष में उपधारणा

साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के अंतर्गत यह उपबंध है कि यदि विवाह संपन्न होने का कोई स्वतंत्र साक्ष्य उपलब्ध नहीं है तो पक्षकारों के बीच लगातार सहवास के आधार पर विवाह को वैध माना जाएगा।

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विवाह की रस्म

अधिकांश हिन्दू विवाहों को सम्पन्न करने के लिये धार्मिक अनुष्ठान अब भी अनिवार्य है। हिन्द आचार्यों ने विवाह के अनुष्ठानों का विस्तृत वर्णन दिया गया है। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 7 (1) के अनुसार कोई भी विवाह दोनों पक्षकारों में से किसी भी एक के यहां प्रचलित अनुष्ठानों को सम्पन्न करके किया जा सकता है। धारा 7(4) के अनुसार प्रचलित अनुष्ठानों में सप्तपदी भी सम्मिलित है। प्रचलित अनुष्ठान दो प्रवर्गों में आते हैं-

  1. शास्त्रिक अनुष्ठान अर्थात् वे अनुष्ठान जिनकी स्थापना विधि के अन्तर्गत की गयी है, और
  2. रूढ़िगत अनुष्ठान अर्थात् वे अनुष्ठान जो रूढ़िगत प्रचलित हैं और किसी जाति, उपजाति या क्षेत्र में मान्य हैं।

उपर्युक्त कथित अनष्ठानों में से किसी भी एक को सम्पन्न करके हिन्द विवाह किया जा सकता पाद पक्षकार रूढिगत अनुष्ठानों द्वारा विवाह सम्पन्न करना चाहते हैं तो उन्हें यह सिद्ध करना होगा पगत अनुष्ठानों जो वे सम्पन्न कर रहे हैं. रूढिगत हैं और वे (या उनमें से एक पक्ष) उस रूढ़ि द्वारा शासन राहा शास्त्रिक अनुष्ठान सम्पन्न करने के लिये यह सिद्ध करना आवश्यक नहीं है।

आवश्यक शास्त्रिक अनुष्ठान

हिन्दू विवाह अधिनियम इस विषय में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहता है कि विवाह सम्पन्न करने के लिये किन शास्त्रिक अनुष्ठानों का सम्पन्न करना अनिवार्य है। हम ऊपर देख चुके हैं कि कन्यादान, पाणिग्रहण, विवाह-होम और सप्तपदी चार प्रमुख अनुष्ठान हैं। हिन्दू विवाह अधिनियम केवल सप्तपदी के अनुष्ठान का उल्लेख करता है। सप्तपदी के बिना कोई भी हिन्दू-विवाह शास्त्रिक अनुष्ठानों द्वारा सम्पन्न नहीं हो सकता है। क्या अन्य तीनों अनुष्ठानों का भी सम्पन्न करना अनिवार्य है। या उनमें से किसी का भी सम्पन्न करना अनिवार्य नहीं है या उनमें से कछ का सम्पन्न करना अनिवार्य है? एक मत यह है कि विवाह-होम भी आवश्यक अनुष्ठान है। इस मत के समर्थन में मद्रास उच्च न्यायालय का एक निर्णय है। यह स्थापित मत है कि अनुष्ठानों को सम्पन्न करने के लिये पुरोहित का होना अनिवार्य नहीं है। परन्तु क्या सतपदी पवित्र अग्नि के समक्ष ही सम्पन्न की जा सकती है? देवानी बनाम चिदम्बरमा में मद्रास उच्च न्यायालय के अनुसार विवाह के लिये दो अनुष्ठान आवश्यक हैं-एक लौकिक, अर्थात कन्यादान का अनुष्ठान और दूसरा धार्मिक अर्थात् पाणिग्रहण और सप्तपदी यह एक स्थापित नियम है कि शूद्रों में विवाह-होम अनिवार्य नहीं है। हिन्दू विवाह के लिये सप्तपदी अनिवार्य अनुष्ठान है, जिसके बिना विवाह सम्पन्न हो ही नहीं सकता है। चाहे सब अन्य अनुष्ठान सम्पन्न कर दिये गये हों, परन्तु यदि सप्तपदी का अनुष्ठान नहीं किया गया है तो विवाह अमान्य और अवैध होगा। ऐसा विदित होता है कि हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत पवित्र अग्नि के समक्ष सप्तपदी करना ही हिन्दू विवाह की अनुष्ठान-मान्यता के लिये पर्याप्त है । धारा 7 (2) से यही आशय निकलता है।

हमारा कानून रूढ़िगत अनुष्ठानों को भी मान्यता प्रदान करता है। इसलिये सप्तपदी शास्त्रिक विधि द्वारा सम्पन्न विवाह के लिये तो अनिवार्य है परन्तु रूढ़िगत अनुष्ठान द्वारा सम्पन्न विवाह के लिये अनिवार्य नहीं है। रूढ़िगत अनुष्ठान के लिये रूढ़ि द्वारा निर्धारित अनुष्ठान अनिवार्य है। रूढ़िगत अनुष्ठान के लिये यह सिद्ध करना अनिवार्य है कि वर्ग, जाति या उपजाति में प्राचीन काल से वैसी रूढि चली आ रही है और वर्ग, जाति या उपजाति में वैसे अनुष्ठान को मान्यता है।। रूढ़िगत अनुष्ठान पूर्णतया लौकिक अनुष्ठान हो सकते हैं, वे नाममात्र के ही अनुष्ठान हो सकते हैं। यह भी हो सकता है कि रूढि के अन्तर्गत किसी भी अनुष्ठान का सम्पन्न करना आवश्यक न हो।

उदाहरणार्थ

संथालों मे वर द्वारा वधू के मस्तक पर सिन्दूर लगाना अनुष्ठान है। दक्षिण भारत के नायाहनो में वर द्वारा वधू के गले में वायद बीता थाली बांधना ही पर्याप्त है। बौद्धों में आपसी सहमति विवाह सम्पन्न करने के लिये पर्याप्त है, किसी अनुष्ठान का करना अनिवार्य नहीं है। करेवा’ विवाह के लिये भी किसी अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है: पक्षकारों का दूसरे के साथ पति-पत्नी की भांति रहना ही पर्याप्त है। यही बात पंजाब में प्रचलित चादर-अंदोजी विवाह पर लागू होती है।

वैवाहिक अनष्ठानों का सम्पन्न करना विवाह की वैधता के लिये अनिवार्य है। यदि आवश्यक बैवाहिक अनष्ठानों को सम्पन्न नहीं किया गया है तो विवाह अमान्य होगा। यदि कोई युगल आवश्यक अनुष्ठानों को छोड़कर अन्य अनुष्ठान करता है तो भी विवाह अमान्य होगा। जो भी अनुष्ठान विधि के अन्तर्गत या मटि के अन्तर्गत पक्षकारों (या उनमें से एक के यहां) के यहां आवश्यक हैं उन्हीं के द्वारा वैध विवाह सम्पन्न हो ना है। उदाहरणार्थ : यदि एक धर्मतः हिन्दू एक सिक्ख से विवाह करता है तो सप्तपदी (हिन्द अनटान) या आनन्द कारज (सिक्ख अनुष्ठान)का सम्पन्न करना विवाह की वैधता के लिये अनिवार्य है। एक धर्मतः डिन्ट और एक धर्मत: बुद्ध आनन्द-कारज के अनुष्ठान द्वारा वैध विवाह सम्पन्न नहीं कर सकते हैं। यदि हिट विवाह के आवश्यक अनुष्ठान सम्पन्न नहीं हुये हैं तो विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत विवाह का रजिस्ट्रीकरण विवाह को वैध नहीं कर सकता है।

वैध विवाह का प्रत्यक्ष सबूत नहीं हो सकता है और वह विवाह की वैधता के सम्बन्ध में अवधारक घटक नहीं होगा लेकिन फिर भी उसका बच्चों की अभिरक्षा, उन दो व्यक्तियों, जिनका विवाह पंजीकृत है, के विवाह बन्धन से उत्पन्न बच्चों के अधिकार, विवाह के पक्षकारों की आयु से सम्बन्धित मामलों से अत्यधिक सायिक मूल्य होता है। ऐसा होने पर यह समाज के हित में ही होगा बशर्ते विवाह को अनिवार्य रूप से पंजीकत किये जाने योग्य बनाया गया हो। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 8 को अधिनियमित करने से विधायी आशय अभिव्यक्ति “हिन्दू विवाहों के सबूत को सरल बनाने के प्रयोजनार्थ” के प्रयोग से प्रकट होता है। स्वाभाविक परिणाम के रूप में पंजीयन न किये जाने का परिणाम यह होगा कि उपधारणा जो विवाह के पंजीयन से उपलब्ध है, ऐसे व्यक्ति के लिये इन्कार की जायेगी जिसके विवाह का पंजीयन नहीं हुआ है। उच्चतम न्यायालय का मत है कि उन सभी व्यक्तियों का विवाह, जो विभिन्न धर्मों के होते हुये भारत के नागरिक हैं, क्रमश: अपने-अपने राज्यों में जहां विवाह का अनुष्ठान हुआ है अनिवार्य रूप से पंजीयन योग्य बनाये जाने चाहिये।

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विवाह की सम्पूर्णता

भाऊराव शंकर लोखाण्डे बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा विवाह संस्कार के सम्बन्ध में विचार किया गया था एवं अभिनिर्धारित किया गया था कि हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 7 के अन्तर्गत विवाह संस्कार का विधिवत् सम्पन्न किया जाना एवं उचित अनुष्ठानों से युक्त होना चाहिये। धार्मिक अनुष्ठानों या प्रथागत रीतिरिवाजों के माध्यम से पूरा किया गया विवाह, विवाह को सिद्ध करने की आवश्यक शर्त है। विवाह के समय ज्वलित अग्नि के समक्ष सात फेरे लिये जाने के पश्चात् सप्तपदी द्वारा विवाह सम्पूर्णता को प्राप्त कर लेता है।

महत्वपूर्ण न्याय दृष्टांत

वान सुब्रमण्यम बनाम श्रुतयम का इस धारणा में या उल्लेख किया गया है कि सिर्फ युगल को पति पत्नी नहीं मानते हैं उन्हें ही यह सिद्ध करना होगा कि पक्षकारों के बीच अनुष्ठान नहीं हुए हैं।फनकारी बनाम स्टेट 1965 जम्मू कश्मीर 105 यह अवधारणा द्वीविवाह (Bigamy) के अभियोजन और दांपत्य अधिकारों के प्रात्यास्थापना पर लागू नहीं होती है।

विवाह का रजिस्ट्रीकरण

प्रश्न: विवाह पंजीकरण करवाना अनिवार्य क्यों है?

उत्तर: हिंदी विवाह अधिनियम की धारा 8 के तहत विवाह का पंजीकृत होना अनिवार्य है, क्योकि यह एक विवाह का विधिक दस्तावेज है, जो कि दो विवाहित जोड़ो के मध्य हुए विवाह का विधिक प्रमाण पत्र है। इससे संबंधित एक बहुत महत्वपूर्ण केस है- ‘बलजीत कौर बोपराई बनाम पंजाब सरकार एवं अन्य, 2008 (3) आरसीआर (सिविल) 109’ मामले में कानून का निर्धारण हो चुका है, जिसमें हाईकोर्ट ने कहा था कि वर, वधु दोनों के बालिग होने की स्थिति में विवाह का पंजीकरण स्वीकार करना होगा। कोर्ट ने विवाह पंजीकरण पर जोर देते हुए कहा था- “विवाह पंजीकरण के समय दोनों पक्षों के 21 साल की उम्र पूरी करने की आवश्यकता होती है, क्योंकि शादी के परिणामस्वरूप हुए बच्चे की कस्टडी और बच्चों के अधिकार के मामले में ये साक्ष्यपरक महत्व रखते हैँ।”

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 से पहले भारत में विवाह से सम्बंधित कोई कानून नहीं बने थे, कानून न बनने से विवाह से सम्बंधित कई सारे अपराध होते है। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 5 के अंतर्गत वैध विवाह की शर्त का प्रावधान दिया गया है तथा इस अधिनियम के अनुसार धारा 8 के अंतर्गत विवाह के पंजीकरण का प्रावधान दिया गया है।

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हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 8 का उद्देश्य

1. समाज में बाल विवाह समाप्त कर विवाह की न्यूनतम उम्र निर्धारित करने के लिए। महत्वपूर्ण न्याय दृष्टांत: जितेन्द्र कुमार शर्मा बनाम राज्य सरकार एवं अन्य’ इस संबंध में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा- “यह स्पष्ट है कि जहां, पहले, बाल विवाह निरोधक अधिनियम की धारा तीन के आधार पर हिन्दू विवाह कानून की तरह ही पर्सनल लॉ के तहत भी बाल विवाह को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता, जब तक कि दोनों पक्ष में से कोई एक पक्ष खास तौर पर ऐसा चाहता हो, लेकिन वर-वधु में से किसी एक पक्ष के अलावा कोई और शादी तोड़ने के लिए अर्जी नहीं दे सकता।”

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत धारा 5(3) का उल्लंघन किसी शादी को निष्प्रभावी घोषित करने की शर्त नहीं है। वास्तव में, बाल विवाह निरोधक कानून के तहत भी नाबालिगों के बीच हुई शादी को अवैध घोषित नहीं किया जाता। बाल विवाह निरोधक कानून की धारा तीन के तहत भी यदि दुल्हा दुल्हन नाबालिग हैं तो भी शादी केवल निष्प्रभावी करने योग्य हो सकती है।

2. समाज में हो रहे द्विविवाह जैसे अपराध को रोकने के लिए।

3. महिलाओं को अपने पति से रखरखाव एवं भरण पोषण के अधिकार से वंचित न होना पड़े।

4. विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र एक विधिक दस्तावेज के साथ विवाह का प्रमाण है।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 5 के अनुसार, हिन्दू विवाह के लिए शर्तें

(1) दोनों पक्षकारों में से किसी का पति या पत्नी विवाह के समय जीवित नहीं है।

(2) विवाह के समय दोनों पक्षकारों में से कोई पक्षकार –

(क) चित्त विकृति के परिणामस्वरूप विधिमान्य सम्मति देने में असमर्थ न हो; या

(ख) विधिमान्य सम्मति देने में समर्थ होने पर भी इस प्रकार के या इस हद तक मानसिक विकार से ग्रस्त न हो कि वह विवाह और सन्तानोत्पति के अयोग्य हो;

(ग) उसे उन्मत्तता का दौरा बार-बार पड़ता हो।

(3) वर ने 21 वर्ष की आयु और वधू ने 18 वर्ष की आयु विवाह के समय पूरी कर ली है;

(4) जब तक कि उनमें से प्रत्येक को शासित करने वाली रूढ़ि या प्रथा से उन दोनों के बीच विवाह अनुज्ञात न हो तब पक्षकार एक-दूसरे के सपिण्ड नहीं हैं।

सपिण्ड और प्रतिषिद्ध कोटि की नातेदारी

धर्मशास्त्रों के अनुसार समीप के नातेदारों के मध्य वैवाहिक सम्बन्ध निषिद्ध ही नहीं अपितु पाप भी माना जाता था। अपनी माता, बहिन, पुत्री और पुत्रवधू के साथ लैंगिक सम्बन्ध महापातक था। हिन्दू विधि में प्रतिषिद्ध कोटियों के नातेदारों से विवाह कब निषिद्ध माना गया है, इस बारे में हमारा ज्ञान अभी अधूरा है। प्रतीत ऐसा होता है कि शतपथ ब्राह्मण के युग में प्रतिषिद्ध कोटियां तीसरी या चौथी कोटि के पूर्वजों तक ही सीमित थीं। गृहसूत्रों के युग में यह पूर्णतया स्थापित हो गया कि सपिण्ड और गोत्रज से विवाह निषिद्ध है। तत्पश्चात् यह नियम स्थापित हुआ कि कोई भी व्यक्ति माता की ओर से पूर्वजों की पांच कोटियों तक और पिता की ओर से पूर्वजों की सात कोटियों तक किसी से विवाह नहीं कर सकता है। हिन्दू विवाह अधिनियम के लागू होने के पूर्व तक यही नियम मान्य था।

सपिंड

हिंदू समाज में प्रचलित सपिंडता के नियमानुसार, माता की पाँच पीढ़ी तथा पिता की सात पीढ़ियों में होने वाले व्यक्तियों को संपिड कहा जाता है। सापिण्ड का सामान्य अर्थ- १-सामान्य पितरों को पिंड देनेवाला। २-एक ही कला के सात पीढ़ियों तक के लोग।