साधारण स्पष्टीकरण | General Explanations | IPC 1860 Chapter 2 | Sections 6-52A

प्रावधान

साधारण स्पष्टीकरण (General Explanations) से संबंधित उपबंध दण्ड संहिता 1860 के अध्याय २, धारा 6 से 52A में वर्णित है।

IPC Section 34 में संयुक्त उत्तरदायित्व का सिद्धान्त समाविष्ट है। धारा ३४ जब एक आपराधिक कृत्य सभी व्यक्तियों ने सामान्य इरादे से किया हो, तो प्रत्येक व्यक्ति ऐसे कार्य के लिए जिम्मेदार होता है जैसे कि अपराध उसके अकेले के द्वारा ही किया गया हो। भारतीय दंड संहिता की धारा 34 के पूर्ण होने के लिए निम्नलिखित शर्तों का पूरा होना अनिवार्य होता है:-

  1. किसी प्रकार की आपराधिक गतिविधि
  2. आपराधिक गतिविधि में एक से अधिक लोग लिप्त होने चाहिए
  3. अपराध करने का सभी लोगों का इरादा एक ही होना चाहिए
  4. आपराधिक गतिविधि में सभी आरोपियों की भागीदारी होनी चाहिए

उदाहरण

तीन व्यक्ति आपसी सहमति से किसी अन्य व्यक्ति को घायल करना/मारना या किसी प्रकार की हानि पहुंचाना चाहते हैं, और वे सभी लोग इस काम को अंजाम देने के लिए अपने स्थान से रवाना हो कर वहां पहुंच जाते हैं, जहां वह व्यक्ति मौजूद होता है। जैसे ही उन लोगों को वह व्यक्ति दिखाई देता है, तो उन तीनों लोगों में से एक व्यक्ति उस व्यक्ति पर किसी हथियार आदि से हमला कर देता है, किंतु वह व्यक्ति किसी प्रकार इस हमले को झेल लेता है, और उन तीन हमलावरों को सामने देखकर अपनी जान बचाने के लिए वहां से भाग निकलता है। जब तक हमलावर उसे पकड़ पाते, वहां कुछ और लोग एकत्रित हो जाते हैं, जिन्हें देख कर सभी हमलावर वहां से भाग निकलते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में उस व्यक्ति को घायल करने का कार्य केवल एक ही व्यक्ति ने किया, जिस कारण वह दंड संहिता की धारा 323 के अंतर्गत अपराधी है, किंतु अन्य दो व्यक्ति भी उस व्यक्ति को घायल करने की नीयत से ही उस तीसरे व्यक्ति के साथ वहां गए थे। अतः वे तीनों व्यक्ति भी उस व्यक्ति पर हमला करने के अपराधी हैं, क्योंकि उन सभी लोगों का इरादा एक समान था। उन सभी पर धारा 323 के साथ-साथ दंड संहिता की धारा 34 भी आरोपित की जाएगी।

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स्पष्टीकरण

दंड संहिता, 1860 की धारा 34 में किसी अपराध की सजा का का प्रावधान नहीं दिया गया है, बल्कि इस धारा में एक ऐसे अपराध के बारे में बताया गया है, जो किसी अन्य अपराध के साथ किया गया हो। कभी किसी भी आरोपी पर उसके द्वारा किये गए किसी भी अपराध में केवल एक ही धारा 34 का प्रयोग नहीं हो सकता है, यदि किसी आरोपी पर धारा 34 लगाई गयी है, तो उस व्यक्ति पर धारा 34 के साथ कोई अन्य अपराध की धारा अवश्य ही लगाई गयी होगी।

IPC Section ३५ के अनुसार, जब कभी कोई कार्य, जो आपराधिक ज्ञान या आशय से किए जाने के कारण ही आपराधिक है, कई व्यक्तियों द्वारा किया जाता है, तब ऐसे व्यक्तियों में से हर व्यक्ति, जो ऐसे ज्ञान या आशय से उस कार्य में सम्मिलित होता है, उस कार्य के लिए उसी प्रकार दायित्व के अधीन है, मानो वह कार्य उस ज्ञान या आशय से अकेले उसी द्वारा किया गया हो।

IPC Section ३6 के अनुसार, कार्य द्वारा और अंशत: लोप द्वारा कारित परिणाम – जहां कहीं किसी कार्य द्वारा या किसी लोप द्वारा किसी परिणाम का कारित किया जाना या उस परिणाम को कारित करने का प्रयत्न करना अपराध है, वहां यह समझा जाना है कि उस परिणाम का अंशत: कार्य द्वारा और अंशत: लोप द्वारा कारित किया जाना वही अपराध है ।

उदाहरण: अ‍ अंशत: य को भोजन देने का अवैध रुप से लोप (चूक) करके, और अंशत: य को पीटकर साशय य की मृत्यु कारित करता है अर्थात अ‍ ने हत्या की है।

IPC Section ३7 के अनुसार, जब कि कोई अपराध कई कार्यों द्वारा किया जाता है, तब जो भी कोई या तो अकेले या किसी अन्य व्यक्ति के साथ सम्मिलित होकर उन कार्यों में से कोई एक कार्य करके उस अपराध के किए जाने में साशय सहयोग करता है, तो वह उस अपराध को करता है।

IPC Section ३8 के अनुसार, जहां कि कई व्यक्ति किसी आपराधिक कार्य को करने में लगे हुए या सम्पॄक्त हैं, वहां वे उस कार्य के आधार पर विभिन्न अपराधों के दोषी हो सकेंगे।

उदाहरण: क गम्भीर प्रकोपन की ऐसी परिस्थतियों के अधीन य पर आक्रमण करता है कि य का उसके द्वारा वध किया जाना केवल ऐसा आपराधिक मानववध है, जो हत्या की कोटि में नहीं आता है । ख जो य से वैमनस्य रखता है, उसका वध करने के आशय से और प्रकोपन के वशीभूत न होते हुए य का वध करने में क की सहायता करता है । यहां, यद्यपि क और ख दोनों य की मॄत्यु कारित करने में लगे हुए हैं, ख हत्या का दोषी है और क केवल आपराधिक मानव वध का दोषी है।

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सामान्य आशय तथा सामान्य उद्देश्य में अन्तर

धारा ३४ के अर्थ के अन्तर्गत सामान्य आशय अपरिभाषित तथा असीमित है जबकि सामान्य उद्देश्य धारा १४९ में परिभाषित है। धारा ३४ के अन्तर्गत आपराधिक कृत्य सामान्य आशय को अग्रसर करने के लिए किया जाता है जबकि धारा १४९ के अन्तर्गत आपराधिक कृत्य सामान्य उद्देश्य के निष्पादन में किया जाता है। धारा ३४ के प्रवर्तन के लिए अपराध कारित करने में सक्रिय सहयोग आवश्यक है जबकि धारा १४९ के अन्तर्गत सक्रिय सहयोग आवश्यक नहीं है। धारा ३४ के अन्तर्गत दायित्व का आधार सामान्य आशय है जो अभियुक्त व्यक्तियों को प्रेरित करता है। धारा १४९ के अन्तर्गत दायित्व का आधार सामान्य उद्देश्य या किसी अपराध के घटित होने की संभाव्यता है। धारा ३४ संयुक्त दायित्व के सिद्धान्त को प्रतिपादित करती है परन्तु किसी विशिष्ट अपराध का सृजन नहीं करती। यह निर्वचनात्मक प्रकृति की है। धारा १४९ विशिष्ट अपराध का सृजन करती है। यह संयुक्त दायित्व के सिद्धान्त की घोषणा करती है। इसी प्रकार धारा ३९ में स्वेच्छया, धारा ४० में अपराध तथा धारा ४३ में अवैध को परिभाषित किया गया है। इसके अलावा क्षति (धारा ४४), जीवन (धारा ४५), मृत्यु (धारा ४६) और शपथ (धारा ५१) को भी परिभाषित किया गया है।

IPC Section 52 में सद्भावनापूर्वक शब्द की परिभाषा दी गई है। दंड संहिता की धारा 52 के अनुसार जब कोई बात (कोई क्रिया) विश्वास के साथ और आवश्यक सावधानी लेकर कि जाती है या समझी जाती है तब वह सद्भावपूर्व की गई है ऐसा कहा जाता है। धारा ५२ सद्भावनापूर्वक किया जाना निम्नलिखित तीन तत्वों पर निर्भर करता है:-

  1. अभियुक्त द्वारा किये गये कार्य की प्रकृति,
  2. किसी कार्य का परिणाम एवं महत्व,
  3. सतर्कता तथा ध्यान का प्रयोग करने के लिए उपयुक्त अवसर।

IPC Section 52A में संश्रय (Harbour) को परिभाषित किया गया है। 52-क धारा 157 में के सिवाय और धारा 130 में वहां के सिवाय जहां कि संश्रय संश्रित व्यक्ति की पत्नी या पति द्वारा दिया गया हो, संश्रय शब्द के अन्तर्गत किसी व्यक्ति को आश्रय, भोजन, पेय, धन, वस्त्र, आयुध, गोलाबारूद या प्रवहण के साधन देना, या किन्हीं साधनों से चाहे वे उसी प्रकार के हों या नहीं, जिस प्रकार के इस धारा में परिगणित हैं किसी व्यक्ति की सहायता पकड़े जाने से बचने के लिए करना, आता है।

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