अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना, मुख्यालय और कार्य - International Court of Justice (ICJ) in International Law

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना कब हुई? (Why was the International Court of Justice established?)

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख न्यायिक अंग है और यह सयुंक्त राष्ट्र संघ के पांच मुख्य अंगों में से एक है। इसकी स्थापना संयुक्त राष्ट्र चार्टर द्वारा 1945 में की गई और अप्रैल 1946 में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने कार्य करना प्रारंभ किया। अंतरराष्ट्री य न्यायालय ने अपनी स्थापना से लेकर अब तक कई देशों के बीच जटिल विवादों का शांतिपूर्ण हल खोजने में सफल रहा है। अंतरराष्ट्री य न्यायालय का मुख्य उद्देश अंतर्राष्ट्रीय विवादों का निष्पक्ष और शांतिपूर्ण हल खोजना है।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का मुख्यालय कहाँ है? (International court of justice headquarters)

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का मुख्यालय नीदरलैंड की राजधानी हेग में स्थित है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की बिल्डिंग का नाम शान्ति महल (पीस पैलस) है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के प्रशासन के खर्च का भार संयुक्त राष्ट्रसंघ पर है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की आधिकारिक भाषाएँ अंग्रेजी और फ्रेंच हैं।

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अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया (Selection Process of Judges in the International Court of Justice)

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में 15 न्यायाधीश होते हैं, जो संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद् द्वारा नौ वर्षों के लिये चुने जाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति पाने के लिये प्रत्याशी को महासभा और सुरक्षा परिषद् दोनों में ही बहुमत प्राप्त करना होता है। यह तय करने के लिए गुप्त मतदान की व्यवस्था है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति उनकी राष्ट्रीयता के आधार पर न होकर उच्च नैतिक चरित्र, योग्यता और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों पर उनकी समझ के आधार पर होती है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में एक ही देश से दो न्यायाधीश नहीं हो सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में पहले भारतीय न्यायाधीश डा.नगेन्द्र सिंह थे। वर्तमान समय में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में दलवीर भंडारी (Dalveer Bhandari) भारतीय न्यायाधीश है। न्यायालय के 15 न्यायाधीश में अफ्रीका से तीन, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन देशों से दो, एशिया से तीन, पश्चिमी यूरोप और अन्य राज्यों से पाँच, पूर्वी यूरोप से दो न्यायाधीश का निर्वाचन होता है।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय द्वारा सभापति तथा उप-सभापति का निर्वाचन और रजिस्ट्रार की नियुक्ति होती है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में किसी भी मामलों पर निर्णय न्यायाधीशों के बहुमत से होता है। सभापति को निर्णायक मत देने का अधिकार है। न्यायालय के सदस्य स्वतंत्र न्यायाधीश होते हैं जिन्हें दायित्व ग्रहण करने से पूर्व शपथ लेनी होती है कि वे अपनी शक्तियों का निष्पक्षता और शुद्ध अंतःकरण से उपयोग करेंगे। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीशों की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिये न्यायालय के किसी भी सदस्य को तब तक बर्खास्त नहीं किया जा सकता, जब तक कि अन्य सदस्यों की एकमत न हो कि वह आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करता है। अभी तक किसी भी न्यायाधीश को पद से विस्थपित नहीं किया गया है।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का क्षेत्राधिकार (Jurisdiction of the International Court of Justice)

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का काम कानूनी विवादों का निपटारा करना और संयुक्त राष्ट्र के अंगों और अधिकृत विशेष एजेंसियों द्वारा उठाए प्रश्नों पर कानूनी राय देना है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के दो ख़ास कर्तव्य हैं: अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अनुसार यह कानूनी विवादों पर निर्णय देता है, दो पक्षों के बीच विवाद पर फैसले सुनाता है और संयुक्त राष्ट्र की इकाइयों के अनुरोध पर कानूनी राय देता है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 93 में बताया गया है कि संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य इस न्यायालय से न्याय पाने का हक़ रखते हैं। हालांकि जो देश संयुक्त राष्ट्र के सदस्य नही हैं वे भी अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में न्याय पाने के लिये अपील कर सकते हैं।

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अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में कौन से मामलों को सुना जा सकता?

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में दोनो दो देशों के मध्य पैदा हुए विवाद के लिए केस किया जा सकता है। दोनों देशों को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय मानना आवश्यक होता है। केवल देश ही विवादास्पद विषयों में शामिल हो सक्ते हैं। व्यक्यियाँ, गैर सरकारी संस्थाएँ ऐसे केस का हिस्से नहीं हो सकती हैं। ऐसे मामलों का निर्णय अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा तब ही किया जा सकता है जब दोनो देश सहमत हो।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के कार्य? (How Does International Court Work)

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को अपनी मर्जी के हिसाब से नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है. न्यायालय की न्यायिक प्रक्रिया, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय नियमावली,1978 के अनुसार चलती है जिसे 29 सितंबर 2005 को संशोधित किया जा चुका है. अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में किसी देश का कोई स्थायी प्रतिनिधि नहीं होता है। सभी देश सामान्यतया अपने विदेश मंत्री के माध्यम से या नीदरलैंड में अपने राजदूत के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के रजिस्ट्रार से संपर्क करते हैं जो कि उन्हें कोर्ट में एक एजेंट के माध्यम से प्रतिनिधित्व प्रदान करता है। न्यायालय में वकील की मदद भी ली जा सकती है।

आवेदक को केस दर्ज करवाने से पहले न्यायालय के अधिकार क्षेत्र और अपने दावे के आधार पर एक लिखित आवेदन देना होता है। प्रतिवादी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करता है और मामले की योग्यता के आधार पर अपना लिखित उत्तर दर्ज करवाता है।

न्यायालय में किसी मामलों की सुनवाई सार्वजनिक रूप से तब तक होती है जब तक न्यायालय का आदेश अन्यथा न हो अर्थात यदि न्यायालय चाहे तो किसी मामले की सुनवाई बंद अदालत में भी कर सकता है। सभी प्रश्नों का निर्णय न्यायाधीशों के बहुमत से होता है। सभापति को किसी भी मामले में निर्णायक मत देने का अधिकार होता है। न्यायालय का निर्णय अन्तिम होता है, उसकी अपील नहीं हो सकती किन्तु कुछ मामलों में पुनर्विचार हो सकता है। अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय की न्याय प्रक्रिया काफी जटिल प्रकृति की है। जिसमे न्याय पाने के लिए लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

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