भारतीय संविदा अधिनियम 1872 में उपनिधान की संविदा व आवश्यक तत्व | Bailment in Contract Act Hindi | Essential Elements of Bailment

प्रावधान व परिभाषा

भारतीय संविदा अधिनियम 1872 की धारा 148 में “उपनिधान” “उपनिधाता’ और “उपनिहिती” की परिभाषा दी गई है। धारा 148 में बताया गया है- उपनिधान एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को किसी प्रयोजन के लिए इस संविदा पर वस्तुओं का परिदान करना है कि जब प्रयोजन पूरा हो जाए वे लौटा दी जाएंगी अथवा परिदान करने वाले व्यक्ति के निर्देशों के अनुसार अन्य व्यक्ति को दी जाएंगी।

स्पष्टीकरण

यदि वह व्यक्ति, जो किसी अन्य के माल पर पहले से ही कब्जा रखता है, उसका धारण उपनिहिती के रूप में करने की संविदा करता है तो वह तद द्वारा उपनिहिती हो जाता है और वस्तु का स्वामी उसका उपनिधाता हो जाता है। यद्यपि वह वस्तु उपनिधान के तौर पर परिदत्त न किया गया हो।

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कौन होता है उपनिधाता एवं उपनिहिती?

उपनिधाता एवं उपनिहिती की परिभाषा (धारा 148) माल का परिदान करने वाला व्यक्ति “उपनिघाता” कहलाता है, वह व्यक्ति जिसको माल परिदत्त किया जाता है, “उपनिहिती” कहलाता है।

क्या है उपनिधान?

उपनिधान एक ऐसा विषय है जिसके अन्तर्गत एक व्यक्ति की जंगम सम्पत्ति किसी अन्य व्यक्ति के आधिपत्य में निश्चित अवधि के लिये चली जाती है। वस्तुओं का स्वामित्व एक व्यक्ति में होता है और उनका कब्जा किसी अन्य व्यक्ति के पास होता है। ऐसा कई एक स्थितियों में होता है। साइकिल हिफाजत या मरम्मत के लिये देना, घड़ी या कोई अन्य यंत्र कारीगर को मरम्मत के लिये देना, वस्तुगृह में सामान, किताबें आदि जमा करना, सुनार को गहने बनाने के लिये स्वर्ण देना, धोबी को कपड़े देना, ये सब ऐसी स्थितियाँ हैं जिनमें एक व्यक्ति की सम्पत्ति किसी विशेष कार्य के लिये अन्य व्यक्ति के पास रहती है और उन दोनों के संबंध को उपनिधान का संबंध कहते हैं। उपरोक्त स्थितियों से यह स्पष्ट होता है कि उपनिधान सार्वजनिक महत्त्व का विषय है।

उपनिधान के आवश्यक तत्व

चल सम्पत्ति होना

उपनिधान का पहला आवश्यक तत्व सम्पत्ति का चल सम्पत्ति होना है। अचल सम्पत्ति का उपनिधान नहीं किया जा सकता है। अचल सम्पत्ति का हस्तांतरण या परिदान केवल पट्टे या बंधक आदि द्वारा ही किया जा सकता है। फिर चल सम्पत्ति में भी किसी वस्तु का होना आवश्यक है। क्योंकि परिदान केवल वस्तु का ही किया जा सकता है धन या रुपयों का नहीं।

कब्जे का परिदान

उपनिधान के लिए आवश्यक है कब्जे का परिदान है। एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति को किसी विशेष उद्देश्य के लिए वस्तु का परिदान किया हों। ऐसा परिदान अस्थायी होता हैं क्योकि स्थायी रूप से वस्तु का परिदान या मूल्य के बदले वस्तु का परिदान उपनिधान नहीं कहा जा सकता है। कई बार परिस्थितियों के अधीन हुए कार्य या आचरण को भी परिदान माना जा सकता हैं। यदि माल दूसरे व्यक्ति को नहीं सौंपा गया हैं तो उपनिधान स्थापित नहीं होता है।

Case Law: के० पिल्लई v. विशाल लक्ष्मी, AIR 1938 Mad के बाद में वादी जो एक महिला थी उसने सुनार को अपने पुराने जेवर गलाकर नए जेवर बनाने के लिए दिया। वह रोज सुनार के पास गहना बनाने का कार्य देखती थी। शाम को अधूरे बने गहने एक बक्से में बन्द कर ताला लगाकर चाभी लेकर चली जाती थी। एक दिन सवेरे उसे गहने गायब मिले। निर्णीत हुआ कि सुनार दायी नहीं था क्योंकि वस्तु का नियन्त्रण वादी के हाथ में था इसलिए उपनिधान स्थापित नहीं हुआ था।

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संविदा के अन्तर्गत वस्तु का परिदान

उपनिधान के लिए आवश्यक हैं कि वस्तु का परिदान किसी संविदा/अनुबंध के अन्तर्गत किया गया हो। परन्तु कभी-कभी बिना संविदा के ही उपनिधान स्थापित हो जाता हैं।

Case Law : ‘खोई’ हुई वस्तु पाने वाले और वस्तु के मालिक के बीच कोई संविदा नहीं होती परन्तु फिर भी वस्तु पाने वाला उपनिहिती माना जाता हैं। राम गुलाम vs उत्तर प्रदेश राज्य. AIR 1950 All के वाद में वादी के गहने चोरी हो गए। संयोग से पुलिस ने चोरों को पकड़ कर गहने बरामद कर लिया। गहने पुलिस के कब्जे से चोरी हो गए। निर्णीत हुआ सरकार दायी नहीं थी क्योंकि गहने उसके पास किसी संविदा के अन्तर्गत नहीं आये थे। स्टेट ऑफ गुजरात vs मेमन मोहम्मद, AIR 1967 के बाद में वादी को कुछ मोटरगाड़ियाँ और कुछ अन्य वस्तुएँ राज्य सरकार द्वारा कस्टम ऐक्ट के अधीन जब्त कर ली थी। जब वह राज्य सरकार की अभिरक्षा में थी, तो वह सरकार की लापरवाही से खराब हो गई। राज्य सरकार को जिम्मेदार माना गया क्योंकि राज्य सरकार उपनिहिती थी। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि उपनिधान का निर्धारण संविदा द्वारा उन्हीं मामलों में होता है जहाँ इसका उदय संविदा से होता हैं परन्तु यह कहना सही हैं कि बिना प्रवर्तनीय संविदा के उपनिधान हो ही नहीं सकता।

परिदान किसी प्रयोजन के लिए किया गया हो

विधिपूर्ण परिदान के लिए यह आवश्यक हैं कि वस्तु का परिदान किसी प्रयोजन के लिए किया गया हो, और माल इस शर्त पर दिया गया हो कि जब प्रयोजन पूरा हो जाएगा तो वस्तु या तो उनिधाता को लौटा दिया जाएगा या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति को दे दिया जाएगा।

प्रयोजन पूर्ण होने पर माल की वापसी

उपनिधान में कब्जे का अधिकार स्थानान्तरित होता हैं और माल को, जब प्रयोजन पूरा हो जाए, वापस कर दिया जायेगा या उन्हें परिदान करने वाले व्यक्ति के निर्देशानुसार अन्यथा व्ययनित कर दिया जाएगा। यह तत्व उपनिधान का अन्य संव्यवहारों, जैसे कि विक्रय या भेंट, जहाँ कि माल में सम्पत्ति का स्थानान्तरण विमेदित करता है।

अधिनियम की धारा 150 के अनुसार उपनिधाता का यह कर्तव्य है कि वह उपनिहित माल कि कमियो को बताए। जब उपनिधाता किसी माल को उपनिहित करता है तो उस माल से संबन्धित सभी कमियो को उपनिहिती को बता देना चाहिए भले ही वह उपनिहिती जानता हो, चाहे वह उपनिहिता को नुकसान दे सकता हो या नही। यदि ऐसा उपनिधाता द्वारा नही किया जाता है तो उपनिहित माल कि ज़िम्मेदारी उपनिधाता की होगी और उपनिहिती को यदि कोई नुकसान होता है तो उसकी भरपाई भी उपनिधाता को करना होगा। यदि माल भाड़े पर उपनिहित किया गया है और माल से कोई नुकसान होता है तो उसका नुकसान उपनिधाता को देना होगा। भले उपनिधाता उस नुकसान से परिचित नही रहा हो।

उदाहरण: क ने ख को एक गाय उधार के रूप में देता है। क जानता था की यह गाय पैर मारती है और इससे दूध निकालना कठिन है। इस बात ख को नही बताई और जब ख गाय ले जाता है तो गाय का दूध निकालते समय ख को गाय के पैर मारने से चोट आ जाती है। क को इसकी भरपाई करना होगा क्योकि क ने ख को गाय देते समय इसकी कामिया नही बताया था।

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उपनिहिती का कर्त्तव्य

युक्तियुक्त सावधानी बरतने का कर्तव्य (धारा 151)

प्रत्येक उपनिधान की स्थिति में उपनिहिती का यह कर्तव्य है की वह उपनिहित वस्तु के प्रति वही सावधानी बर्ते जैसे की जब वह माल खरीदने जाते है तब बरत्ते है जिससे कोई कमी न हो जैसे वस्तु का मूल्य, वैधता, वस्तु का प्रकार व माल का परिणाम आदि। इसका तात्पर्य है कि देखरेख ठीक उसी प्रकार जैसे सामान्य समझ वाला कोई व्यक्ति करता। पड़ी वस्तु पाने वाले को धारा 71 में उपनिहिती माना जाता है व उसका दायित्व वही होगा जो उपनिहिती का है।

उपनिहित बस्तुओं का उचित प्रयोग करने का कर्तव्य (धारा 154)

जब उपनिहिती उपनिधाता की शर्तों से अन्यथा कोई कार्य करता है, तब वह संविदा उपनिधाता शून्य करा सकेगा।यदि उपनिहिती उपनिहित वस्तुओं का कोई ऐसा उपयोग करता है, जोकि उपनिधान की शर्तों के अनुकूल नहीं है, तब वह उनके ऐसा उपयोग किया जाने से या ऐसा उपयोग के दौरान उन वस्तुओं को होने वाले नुकसान के लिए उपनिधाता को प्रतिकर देने के लिए जिम्मेदार है।

स्वयं की वस्तुओं के साथ मिश्रण न करने का कर्तव्य (धारा 156)

उपनिहिती का यह कर्तव्य है कि वह उपनिहित माल में अपने माल को मिश्रित ना करे।! और यदि करता है तो उसे पृथक करने में होने वाले व्यय या क्षति की पूर्ति का भार उपनिहिती के ऊपर होगा।

वृद्धि को लौटाने का कर्तव्य (धारा 163)

जब कोई सम्पत्ति उपनिहित की जाती है, तो वृद्धि उसी चीज के साथ उपनिधाता वापस पा सकेगा। उदाहरणार्थ:- क ख को अपनी एक गाय कुछ समय के लिए अभिरक्षा में देता है और इसी दौरान गाय बछड़े को जन्म देती है तो ख, क को गाय के साथ बछड़ा लौटाने के लिए भी आबद्ध है।

उपनिधाता के हक को स्वीकारना (धारा 166)

यदि उपनिधाता पर वस्तुओं का कोई हक नहीं है व उपनिहिती उनको उपनिधाता का या उसके निर्देशों के अनुसार सम्भावना से वापस परिदत्त कर देता है, तो उपनिहिती ऐसे परिदान के बारे में स्वामी के प्रति उत्तरदायी नहीं होगा। धारा 117 भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अनुसार हक स्वीकारने का दायित्व है।

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उपनिहिती के अधिकार

माल अथवा वस्तु के उपयोग करने का अधिकार

उपनिहिती का सबसे पहला अधिकार उपनिहित माल को उपयोग करने का अधिकार है। उपनिहिती द्वारा जिस उद्देश्य के लिए वस्तु प्राप्त की जाती है, वह उसका उस उद्देश्य के लिए उपयोग करने के लिए स्वतंत्र है।

माल की त्रुटि को जानने का अधिकार

उपनिहिती को यह अधिकार है कि यदि माल में कोई त्रुटि हो तो वह उससे अवगत हो। यह उपनिधाता का कर्तव्य है कि यदि माल में कोई त्रुटि हो तो वह उसे उपनिहिती के समक्ष प्रस्तुत कर दे। ऐसी किसी त्रुटि से यदि उपनिहिती को अवगत नहीं कराया जाता है और उस त्रुटि की वजह से उपनिहिती को क्षति कारित होती है तो वह क्षतिपूर्ति पाने का हकदार है।

माल के मिश्रण का अधिकार

उपनिहिती को उपनिहित माल में अपने माल को मिश्रित करने का अधिकार है। ऐसे मिश्रण में उपनिहिती का अपने माल के बराबर हित निहित रहता है।

व्ययों की प्रतिपूर्ती का अधिकार

उपनिहिती यदि उपनिहित माल के रख रखाव में यदि किसी किसी तरह का कोई व्यय करता है तो वह उस व्यय की प्रतिपूर्ती उपनिधाता से करने का हकदार है।

अधिकारों में कमी पर क्षतिपूर्ति का अधिकार

जहाँ उपनिधाता का अधिकार नहीं होते हुए भी वह उपनिहिती को माल उपनिहित कर देता है या माल वापस करने के सम्बन्ध में कोई निदेश दे देता है और इससे उपनिहिती को क्षति कारित होती है तो वह उपनिधाता से क्षतिपूर्ति पाने का हकदार है।

सह-स्वामी को माल लौटाने का अधिकार

जब कोई माल संयुक्त स्वामियों द्वारा उपनिहित किया गया हो तो वहां उपनिहिती किसी एक स्वामी की सहमति से भी माल वापस लौटा सकता है।

माल को रोकने का अधिकार

यदि माल का दावा उपनिधिता के अलावा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया जाता है तो उपनिहिती ऐसे माल के परिदान को न्यायालय के माध्यम से रुकवा सकता है।

विशेष धारणाधिकार (धारा 170)

जहाँ कि उपनिहिती ने उपनिधान के प्रयोजन के अनुकूल उपनिहित वस्तुओं के बारे में श्रम या कौशल का प्रयोग द्वारा सेवाएँ प्रदान की हैं वहाँ प्रतिकूल संविदा के अभाव में वह वस्तुओं को तब तक धारित करने का प्राधिकार रखता है जब तक कि वह उन सेवाओं के लिए जो उनके बारे में भी हैं सम्यक् पारिश्रमिक नहीं पा जाता। कह सकते हैं यह धारणाधिकार केवल उन्हीं स्थितियों में मिलेगा जब अपने श्रम या कौशल द्वारा सेवाएँ दी गयी हों।

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उपनिधान के प्रकार (Kinds of Bailment)

एक महत्वपूर्ण अंग्रेजी वाद काग्स बनाम बर्नाड में लार्ड हाल्ट ने निम्नलिखित 6 प्रकार के उपनिधान का वर्णन किया है-

  1. किराया- जब वस्तु को उपनिहिती को किराए पर दी जाती है, तब वह किराए पर दिया हुआ उपनिधान कहलाती है।
  2. गिरवी: गिरवी रूपी निधान में ॠणी द्वारा ॠणदाता के उधार लिए गये धन की प्रतिभूतिस्वरूप वस्तुएं ॠणदाता के पास रखी जाती हैं।
  3. जमा: यह वस्तु को सुरक्षित अभिरक्षा में रखे जाने के लिए किया जाने वाला एक सामान्य प्रकार का उपनिधान होता है। बैंक के लॉकर में मूल्यवान वस्तुओं को रखा जाना इसका अच्छा उदाहरण है। लेकिन बैंक के बचत खाते में रुपये जमा कराना उपनिधान नहीं है।
  4. मंगनी: किसी व्यक्ति को निःशुल्क कोई वस्तु उपयोग हेतु परिदत्त करना मंगनी रूपी उपनिधान कहलाता है। जैसे किसी मित्र को कोई किताब पढ़ने के लिए उधार देना आदि।
  5. वाहक: वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने हेतु वाहक का परिदान करना उपनिधान की श्रेणी में आता है।
  6. मेन्डेटम निक्षेप: किसी वस्तु की मरम्मत और निर्माण के लिए देना मेन्डेटेम निक्षेप कहलाता है। सामान्यत: वाहन को मरम्मत के लिए देना, दर्जी को कपड़े सिलने के लिए देना आदि इसके अच्छे उदाहरण हैं।

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