संस्कृत में कहानी धर्मे धमनं पापे पुण्यम् (धरम में धक्का, पाप में पुण्य)

संस्कृत में कहानी धर्मे धमनं पापे पुण्यम् (धरम में धक्का, पाप में पुण्य)


वाणी रसवती यस्य,यस्य श्रमवती क्रिया।

लक्ष्मी: दानवती यस्य,सफलं तस्य जीवितं।।


सरलार्थ –जिस व्यक्ति की वाणी मधुर होती है, जिसका परिश्रम परिश्रम से भरा होता है, जिसके धन का उपयोग दान में किया जाता है, उसका जीवन सफल होता है।

प्यारी सी चाय के साथ आप सभी को हमारी ओर से सुबह की नमस्ते । तो दोस्तो आज हम आपके लिए संस्कृत की एक कहानी धर्मे धमनं पापे पुण्यम् (धरम में धक्का, पाप में पुण्य) लेके आए है , धर्मे धमनं पापे पुण्यम् (धरम में धक्का, पाप में पुण्य)। तो आईए देखते है।

धर्मे धमनं पापे पुण्यम् (धरम में धक्का, पाप में पुण्य)​

आसीत् कश्चित् चञ्चलो नाम व्याधः। पक्षिमृगादीनां ग्रहणेन सः स्वीयां जीविकां निर्वाहयति स्म। एकदा सः वने जाल विस्तीर्य गृहम् आगतवान्। अन्यस्मिन् दिवसे प्रातःकाले यदा चञ्चल: वनं गतवान् तदा सः दृष्टवान् यत् तेन विस्तारिते जाले दौर्भाग्याद् एक: व्याघ्र : बद्धः आसीत्। सोऽचिन्तयत्, ‘व्याघ्रः मां खादिष्यति अतएव पलायनं करणीयम्।’ व्याघ्रः न्यवेदयत्-‘भो मानव कल्याणं भवतु ते । यदि त्वं मां मोचयिष्यसि तर्हि अहं त्वां न हनिष्यामि।’ तदा सः व्याधः व्याघ्रं जालात् बहिः निरसारयत्। व्याघ्रः क्लान्तः आसीत्। सोऽवदत्, ‘भो मानव पिपासुः अहम् । नद्याः जलमानीय मम पिपासां शमय व्याघ्रः जलं पीत्वा पुनः व्याधमवदत्, ‘शान्ता मे पिपासा साम्प्रतं बुभुक्षितोऽस्मि । इदानीम् अहं त्वां खादिष्यामि।’ चञ्चलः उक्तवान्, ‘अहं त्वत्कृते धर्मम् आचरितवान्। त्वया मिथ्या भणितम्। त्वं मां खादितुम् इच्छसि ?

सरलार्थ-
कोई चंचल नामक शिकारी था। वह पक्षियों और पशुओं को पकड़कर अपना गुजारा करता था। एक बार वह जंगल में जाल फैलाकर घर आ गया। अगले दिन सुबह जब चंचल वन में गया तब उसने देखा कि उसके द्वारा फैलाए गए जाल में दुर्भाग्य से एक बाघ फैसा था। उसने सोचा, बाघ मुझे खा जाएगा, इसलिए भाग जाना चाहिए।’ बाघ ने प्रार्थना की- ‘हे मनुष्य तुम्हारा कल्याण हो यदि तुम मुझे छुड़ाओगे तो मैं तुमको नहीं मारूंगा।’ तब उस शिकारी ने बाघ को जाल से बाहर निकाल दिया। बाघ थका था। वह बोला, ‘अरे मनुष्य में प्यासा हूँ। नदी से जल लाकर मेरी प्यास शान्त करो (बुझाओ)।’ बाप जल पीकर फिर शिकारी से बोला, ‘मेरी प्यास शान्त हो गई है। इस समय मैं भूखा हूँ। अब मैं तुम्हेगा चंचल बोला, ‘मैंने तुम्हारे लिए धर्म कार्य किया तुमने झूठ बोला तुम मुझको खाना चाहते हो?’

व्याघ्रः अवदत्, ‘अरे मूर्ख धर्मे धमनं पापे पुण् भवति एव । पृच्छ कमपि ।’ चञ्चल: नदीजलम् अपृच्छत् । नदीजलम् अवदत्, ‘एवमेव भवति, जनाः मयि स्नानं कुर्वन्ति, वस्त्राणि प्रक्षालयन्ति तथा च मल-मूत्रादिकं विसृज्य निवर्तन्ते, अतः धर्मे धमनं पापे पुण्यं भवति एव ।’

चञ्चल: वृक्षम् उपगम्य अपृच्छत् । वृक्षः अवदत्, ‘मानवाः अस्माकं छायायां विरमन्ति। अस्माकं फलानि खादन्ति पुनः कुठारैः प्रहृत्य अस्मभ्यं सर्वदा कष्टं ददति यत्र कुत्रापि छेदनं कुर्वन्ति। धर्मे धमनं पापे पुण्यं भवति एव।’

सरलार्थ –
बाघ बोला-‘अरे मूर्ख धर्म पालन में धक्का (कष्ट) और पाप करने में पुण्य होता किसी से (को) भी पूछ लो।’ ही है। चंचल ने नदी के जल से पूछा। नदी का जल बोला, ‘ऐसा ही होता है. लोग मुझमें नहाते हैं, कपड़े धोते हैं तथा मल और मूत्र आदि डाल कर वापस लौट जाते हैं, इसलिए धर्म (पालन) में कष्ट और पाप (करने) में पुण्य होता ही है।’

चंचल ने वृक्ष के पास जाकर पूछा। वृक्ष बोला, ‘मनुष्य हमारी छाया में ठहरते हैं। हमारे फलों को खाते हैं, फिर कुल्हाड़ों से चोट मारकर हमें सदा कष्ट देते हैं। कहीं-कहीं तो काट डालते हैं। धर्म में धक्का (कष्ट) और पाप (करने) में पुण्य होता ही है।’

समीपे एका लोमशिका बदरी- गुल्मानां पृष्ठे निलीना एतां वार्ता शृणोति स्म। सा सहसा चञ्चलमुपसृत्य कथयति- “का वार्ता ? माम् अपि विज्ञापय।” सः अवदत् – “अहह मातृस्वसः ! अवसरे त्वं समागतवती । मया अस्य व्याघ्रस्य प्राणाः रक्षिताः परम् एषः मामेव खादितुम् इच्छति। ” तदनन्तरं सः लोमशिकायै निखिला कथां न्यवेदयत्।

लोमशिका चञ्चलम् अकथयत् बाढम्, त्व जाल प्रसारय पुनः सा व्याघ्रम् खादित् केन प्रकारेण त्वम् एतस्मिन् जाले बद्धः इति अहं प्रत्यक्षं द्रष्टुमिच्छामि

सरलार्थ –
पास में एक लोमशिका (लोमड़ी) बेर को झाड़ियों के पीछे छिपी हुई इस बात को सुन रही थी। वह अचानक चंचल के पास जाकर कहती है क्या बात है? मुझे भी बताओ।’ वह बोला- ‘अरो मौसी ठीक समय पर तुम आई हो। मैंने इस बाप के प्राण बचाए, परन्तु यह मुझे ही खाना चाहता है।’ उसके बाद उसने लोमड़ी को सारी कहानी बताई (सुनाई) लोमड़ी ने चंचल को कहा- ठीक है, तुम जाल फैलाओ फिर वह बाघ से बोली-‘किस तरह से तुम इस जाल में बँध (फँस) गए, यह मैं अपनी आँखों से देखना चाहती हूँ।”

व्याघ्रः तद् वृत्तान्तं प्रदर्शयितुं तस्मिन् जाले प्राविशत्। लोमशिका पुनः “अकथयत् सम्प्रति पुनः पुनः कूर्दन कृत्वा दर्शय सः तथैव समाचरत् । अनारत कूर्दनेन सः श्रान्तः अभवत् । जाले बद्धः सः व्याघ्रः क्लान्त: सन् निःसहायो भूत्वा तत्र अपतत् प्राणभिक्षामिव च अयाचत। लोमशिका व्याघ्रम् अवदत् ‘सत्यं त्वया भणितम्’ धर्म धमन पापे पुण्यम् तु भवति एव।’ जाले पुनः तं बद्ध दृष्ट्वा सः व्याधः प्रसन्नो भूत्वा गृह प्रत्यावर्तत।

सरलार्थ –
बाघ उस बात को बताने (प्रदर्शन करने के लिए उस जाल में घुस गया। लोमड़ी में फिर कहा- अब बार-बार कूद करके दिखाओ उसने वैसे ही किया लगातार कूदने से वह थक गया। जाल में बँधा हुआ बाघ यह थककर असहाय (निदाल) होकर वहाँ गिर गया और प्राणों को भिक्षा को तरह माँगने लगा। लोमड़ी बाघ से बोली- तुमने सत्य कहा ‘धर्म पालन में धक्का (कष्ट) और पाप करने में पुण्य तो होता ही है। फिर जाल में उसे बँधा हुआ देखकर वह शिकारी खुश होकर पर वापस आ गया।

तो मित्रो आज के समय में भी देखा जाए तो ऐसा ही है । धर्म पर चलने वाले लोगो को हमेशा लोग खरी खोटी बाते भी सुनाते है और उन्हें हमेशा गिराने की ही सोचते है ।बाकी तो उनसे कुछ होता नहीं तो फिर थी बचता है, तो लग जाते है दूसरो की निंदा करने । लेकिन सोचने वाली बात ये भी है की लोग बाते भी उन्ही की बनाते है जिनकी वो बराबरी नही कर सकते या फिर उनसे अच्छा देखा नही जाता ।

इसलिए अपने जीवन में हो से तो दूसरो की निंदा करो और न ही किसी को गिराने ही सोचो ।

जो आज के समय मे जो जैसा करेगा वैसा ही भरेगा ।

तो मित्रो अपने विचार हमेशा दूसरों के लिए प्रिय रखो ,अगर आपसे ऐसा भी नहीं होता तो उनके बारे मे कुछ सोचो ही मत ,न आप उनके भले में ओर न उनके बुरे मे।

तो मित्रो कैसी लगी आपको हमारी ये पोस्ट, अच्छी लगी हो तो ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
 

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