संस्कृत अनुवाद का 37 अभ्यास

संस्कृत अनुवाद का 37 अभ्यास


नमस्कार मित्रों तो कैसे हो आप सभी तो आज हम आपके लिए संस्कृत अनुवाद का 37 अभ्यास लेके आए हैं तो आईए शुरू करते हैं।

संस्कृत अनुवाद का 37 अभ्यास​

(क) वधूः (बहू), चमू: (सेना), तनूः (शरीर), जम्बू: (जामुन), श्वभूः (सास), व्याघ्रः (बाघ), ऋक्षः ( रीछ), शूकरः (सूअर), वृकः (भेड़िया), शृगालः (गीदड़), शश:(खरगोश), वानरः (बन्दर), मृगः (हिरन), नकुलः (न्योला), अश्वः (घोड़ा), वृषभ: (बैल):, उष्ट्र: (ऊँट), गर्दभः (गधा), महिषः (भैंसा), कुक्कुरः (कुत्ता), मार्जारः (बिलाव), अज: (बकरा), मूषक: (चूहा), एडका (भेड़ ) । २४ । (ख) शी (सोना) । १ । सूचना- ( क ) वधू – श्वश्रू, वधूवत्

व्याकरण (वधू, शी, क्त्वा प्रत्यय, तृतीया)​

१. वधू शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द सं० १७) ।

२. शी धातु के दसों लकारों के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो धातु० ३५) ।

३. अभ्यास ९ में दिए तृतीया के नियमों का पुनः अभ्यास करो।

नियम १३४ – (१) (समानकर्तृकयोः पूर्वकाले) ‘पढ़कर’, ‘लिखकर’ आदि ‘कर’ या ‘करके’ के अर्थ में ‘क्त्वा’ प्रत्यय होता है। क्त्वा का ‘त्वा’ शेष रहता है। क्रिया का कर्ता एक ही होना चाहिए। त्वा अव्यय होता है, अतः इसके रूप नहीं चलते हैं। जैसे- भोजनं खादित्वा विद्यालयं गच्छति । (२) (अलंखल्वो:०) निषेधार्थक अलम् या खलु बाद में हो तो धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है। जैसे- अलं कृत्वा, कृत्वा खलु ( मत करो)। अलं हसित्वा (मत हँसो) । देखो अभ्यास ३८ भी।

नियम १३५ – क्त्वा (त्वा) प्रत्यय लगाकर रूप बनाने के लिए ये नियम स्मरण कर लें- ( १ ) धातु को गुण या वृद्धि नहीं होती। सेट् धातुओं में इ लगेगा, अनिट् में नहीं। जैसे–पठित्वा, हसित्वा, कृत्वा, हृत्वा, धृत्वा, लिखित्वा, रुदित्वा, जित्वा, चित्वा, भूत्वा । (२) नियम १२५ के (१) (३) (४) (५) यहाँ पर भी लगेंगे। जैसे- (१) हृत्वा, लब्ध्वा, रुद्ध्वा, (३) धित्वा, सित्वा, मित्वा, स्थित्वा, (४) गत्वा, रत्वा, यत्वा, नत्वा, मत्वा, हत्वा, बद्ध्वा । जन् आदि में ‘इ’ भी लगता है-जनित्वा, सात्वा सनित्वा, खात्वा – खनित्वा, (५) उक्त्वा, सुप्त्वा, इष्ट्वा, उप्त्वा, गृहीत्वा, विद्ध्वा, पृष्ट्वा, हुत्वा, ऊढ्वा, उदित्वा, उपित्वा । (३) नियम १३२ के (३), (४) यहाँ पर भी लगते हैं। (३) पक्त्वा, भुक्त्वा, (४) पृष्ट्वा, दृष्ट्वा, इष्ट्वा, सृष्ट्वा (४) गा, पा के आ को ई हो जाता है—गीत्वा, पीत्वा अन्यत्र आ रहता है। ज्ञात्वा, त्रात्वा । (५) दीर्घ ॠ को ईर होता है, तृ> तीर्त्वा, कृ> कीर्त्वा, पृ> में कर होता है पूर्त्वा । (६) कम्, क्रम्, चम्, दम्, भ्रम्, श्रम् के दो-दो रूप होते हैं। एक इ बीच में लगाकर, दूसरा अम् को ‘आन्’ बनाकर। जैसे–कमित्वा–कान्त्वा, क्रमित्वा- क्रान्त्वा, शमित्वा – शान्त्वा आदि। (७) इन धातुओं के ये रूप होते हैं। दा > दत्त्वा, धा> हित्वा, हा (छोड़कर) हित्वा, अद्> जग्ध्वा, दह्> दग्ध्वा ।

उदाहरण वाक्य- १. देव: स्नात्वा, पाठं पठित्वा, लेख लिखित्वा, भोजनं च भुक्त्वा विद्यालयं गच्छति। २. शंकरः आसने स्थित्वा मित्रं दृष्ट्वा तं प्रश्नं पृष्ट्वा, स्वयं च किञ्चिद् उक्त्वा लिखति। ३. शिष्यः आसने शेते, शेताम, शयीत, अशेत, शयिष्यते वा।

२. संस्कृत बनाओ – ( क ) १. श्याम स्नान करके, पुस्तक पढ़कर, लेख लिखकर, पाठ स्मरण कर और भोजन करके प्रतिदिन पाठशाला जाता है। २. राजा की सेना शत्रुओं को जीतकर और उन्हें बाँधकर राजा के पास लाती है। ३. बहू काम करके, भोजन पकाकर और सास को खिलाकर स्वयं खाती है। ४. गुरु सत्य बोलकर, धर्म करके, यज्ञ करके, दूध पीकर और छात्रों को पढ़ाकर जीवन बिताता है। ५. सास दान देकर, मन्त्र जपकर, गाना गाकर, अधर्म को छोड़कर • और सत्य को जानकर सुखपूर्वक रहती है। ६. बालक रोकर, भूमि खोदकर और डण्डा लेकर दौड़ता है। ७. दास नदी को पार करके भार सिर पर ढोकर ले जाता है।

(ख) ८. देवदत्त ने वन में एक व्याघ्र, दो रीछ, तीन सूअर, चार भेड़िए, पाँच गीदड़ और छह मृग देखे। ९. ग्राम में बहुत से घोड़े, बैल, ऊँट, भैंसे, कुत्ते, बिल्ली तथा गधे रहते हैं। १०. मत हँसो, मत रोओ, विवाद मत करो। ११. कुत्ता आँख से काना है। १२. घोड़ा पैर से लँगड़ा है। १३. खरगोश स्वभाव से सरल होता है। १४. ऐसे कुत्ते से क्या लाभ जो रक्षा न करे ?

(ग) (शी धातु) १५. वह सोता है। १६. मैं सोता हूँ। १७. वह सोवे । १८. तू सो। १९. मैं सोऊं । २०. वह सोया २१. तू सोया २२. मैं सोया २३. वह सोएगा। २४. तू सोएगा। २५. मैं सोऊँगा।

४. अभ्यास- (क) २ (ग) को बहुवचन में बदलो। (ख) इन शब्दों के पूरे रूप लिखो-वधू, चमू, तनू। (ग) शी धातु के दसों लकारों के रूप लिखो। (घ) क्त्वा प्रत्यय लगाकर रूप बनाने के नियमों को सोदाहरण लिखो। (ङ) इन धातुओं के क्त्वा प्रत्यय के रूप लिखो-कृ, गम्, पठ्, लिखू, खन्, वच्, स्वप्, ग्रह, वह, दृश्, प्रच्छ, गा, तू, कृ, दा, धा, क्रम्, भ्रम्।

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