आपराधिक षडयंत्र (Criminal Conspiracy) – IPC 1860 Section 120A 120B


आपराधिक षडयंत्र (Criminal Conspiracy) – IPC 1860 Section 120A 120B


प्रावधान​

भारतीय दंड संहिता 1860 के अध्याय 5A में धारा १२0A व १२0B में आपराधिक षडयंत्र के बारे में बताया गया है। आपराधिक षडयंत्र नामक एक नये अपराध का सृजन १९१३ ई. में किया गया। इसके पूर्व धारा १०७ के अन्तर्गत षडयंत्र को दुष्प्रेरक का एक भाग माना गया था।

परिभाषा​

धारा 120A आपराधिक षडयंत्र (Of Criminal Conspiracy) को परिभाषित करती है, जिसके अनुसार जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी अवैध कार्य या किसी वैध कार्य को अवैध तरीके से करने या करवाने को सहमत होते हैं तो उसे आपराधिक षड्यंत्र कहते है। मात्र दो या दो से अधिक व्यक्तियो के आशय द्वारा षड्यंत्र का अपराध गठित नही होता अपित इसके लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच कोई अवैध कार्य या अवैध साधनों द्वारा वैध कार्य करने की सहमति होनी चाहिए। परन्तु यदि दो या दो से अधिक व्यक्तियों में ऐसे अवैध कार्य को जो अपराध नही है करने की सहमति होती है , तो इसे भी आपराधिक षड्यंत्र माना जाएगा बशर्ते कि ऐसी सहमति के अनुसरण में कोई प्रकट कार्य किया गया हो।


स्पष्टीकरण​

यह तत्वहीन है कि अवैध कार्य ऐसी सहमति का चरम उद्देश्य है या उस उद्देश्य का आनुषंगिक मात्र।

आपराधिक षडयंत्र के आवश्यक तत्व​

(1) दो या दो से अधिक व्यक्तियों की बीच समझौता जिनपर षड्यंत्र करने का आरोप है

**(2) समझौता

I. कोई अवैध कार्य या

II. कोई वैध कार्य अवैध साधनों द्वारा करने या करवाने के लिए किये जाएदो या दो से अधिक व्यक्तियों का होना आवश्यक:

दो या दो से अधिक व्यक्ति​

आपराधिक षड्यंत्र के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों का होना आवश्यक है क्योंकि यह नहीं कहा जा सकता है की किसी व्यक्ति ने स्वयं अपने साथ षड्यंत्र किया था। षड्यंत्र के सम्बन्ध में यह नियम है की पति पत्नी एक दुसरे के साथ षड्यंत्र नहीं कर सकते अर्थात उन्हें दो या दो से अधिक व्यक्ति नहीं माना जा सकता, परन्तु वे अन्य के साथ षड्यंत्र कर सकते हैं।

दो या दो से अधिक व्यक्तियों में अवैध लोप करने का समझौता​

समझौता ही षड्यंत्र के सम्बन्ध में अपराध का सार है। केवल दो व्यक्ति होने मात्र से षड्यंत्र की संरचना नहीं हो जाती, बल्कि उन व्यक्तियों में आपस में समझौता होना चाहिए।

समझौता अवैध अथवा वैध साधनों द्वारा करने का हो​

केवल दो या दो से अधिक व्यक्तियों में समझौता हो जाने से ही आपराधिक षड्यंत्र का गठन नहीं हो जाता जब तक की वह समझौता अवैध कार्य करने के लिए अथवा वैध कार्य को अवैध साधनों द्वारा करने के लिए किया गया हो।

समझौते के अनुसरण में कार्य का किया जाना​

साधरणतः आपराधिक षड्यंत्र के मामलो में व्यक्ति का आपस में सहमत होना पर्याप्त होता है, परन्तु धारा 120A का दूसरा भाग स्पष्ट रूप से उपबंधित करती है की यदि दो व्यक्तियों में से कोई किसी अपराध कार्य को करने से भिन्न किसी बात के लिए सहमत होते हैं तो मात्र सहमती पर्याप्त नहीं मानी जाती वरन समझौते के आलावा कुछ कार्य भी किया जाना चाहिए।

ध्यान रखने योग्य बातें​

षड्यंत्र में कम से कम दो व्यक्तियों की आवश्यकता होती है इसलिए जहां दो या अधिक नामित व्यक्ति षड्यंत्र के लिए आरोपित किये गये तथा उनमे से एक को छोड़कर शेष सब लोग दोषमुक्त कर दिए गये वहां पर बचे हुए एक अभियुक्त की भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120B के अधीन दोषसिद्धि नही की जा सकती क्योंकि वह व्यक्ति अकेले ही षड्यंत्र नही कर सकता। षड्यंत्र का अपराध दो या दो से अधिक व्यक्तियों के आशय तक ही सीमित नही होता बल्कि दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच अवैध साधनों से और अवैध कृत्य के करार पर निर्भर होता है।बम्बई उच्च न्यायालय ने हाल ही के मामले में इस दृष्टिकोण को अपनाया है जिसके अनुसार जहां दो अभियुक्तों में से एक लोकसेवक था और उसे इस कारण दोषमुक्त करना पड़ा क्योकि उसका अभियोजन दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के अधीन मंजूरी लिए बगैर ही कर दिया गया था फिर भी दूसरे अभियुक्त की षड्यंत्र के आरोप में दोषसिद्धि की जा सकती है।


अवैध कार्य​

आपराधिक षड्यंत्र के अपराध को गठित करने के लिए समझौता निश्चित रूप से विधि विरुद्ध अथवा विधि द्वारा निषिद्ध कोई कार्य करने के लिए होना चाहिए।

सेन्ट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन बनाम बी. सी. शुक्ला के वाद ने कहा गया कि जहाँ अभियोजन यह सिद्ध करने में असफल रहा कि दो अभियुक्तों में से एक आपराधिक षड्यंत्र में भागीदार था वहां आपराधिक षड्यंत्र का आरोप दूसरे के विरुद्ध नही बनता है क्योकि षड्यंत्र में कम से कम दो व्यक्तियों का होना आवश्यक है।सुशील सुरी बनाम सेन्ट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन के वाद में अभिनिर्धारित किया गया कि आपराधिक षड्यंत्र का आवश्यक तत्व अपराध कारित करने का करार है अभियुक्तों के मध्य अपराध को करने का मात्र षड्यंत्र का प्रमाण ही भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120 B के अंतर्गत दोषसिद्धि हेतु काफी है अभियुक्त या उनमे से किसी के द्वारा किसी बाह्य कृत्य के किये जाने के प्रकरण की आवश्यकता नही है।

नोट: आपराधिक षड्यंत्र का आधार करार में निहित है लेकिन एक अवयस्क किसी प्रकार से षड्यंत्र में शामिल नही हो सकता इसीलिए जब एक अवयस्क के साथ कोई व्यक्ति करार करके आपराधिक षड्यंत्र गठित करता है तो वहा पर करार शून्य होने के कारण वह व्यक्ति आपराधिक षड्यंत्र के लिए दायी नही होगा लेकिन वह धारा

107 के अधीन एक अवयस्क के दुष्प्रेरण के अपराध के लिए दायी होगा। धारा १२०-ख के अन्तर्गत केवल दो व्यक्तियों पर आरोप लगाया जाता है तथा उनमें से एक मुक्त कर दिया जाता है तो दूसरे को अकेले दण्डित नहीं किया जा सकता। आपराधिक षडयंत्र के अन्तर्गत यदि यह सिद्ध हो जाता है कि दो या अधिक व्यक्ति षडयंत्र में सक्रिय थे, यद्यपि वे पकड़े नहीं जा सके, तो एक व्यक्ति को भी सजा दी जा सकती है। धारा १२०-क के अन्तर्गत अपराध की संरचना के लिए मात्र सहमति ही पर्याप्त है, यदि वह किसी अपराध को करने की सहमति है।एक अपराध कारित करने हेतु षडयंत्र धारा १२०-क के अन्तर्गत स्वयं एक सारभूत अपराध है और इसके लिए एक व्यक्ति पर अलग से आरोप लगाया जा सकता है। षडयंत्र के अपराध में एक व्यक्ति वाहक के रूप में भी शामिल हो सकता है और इसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह षड्यंत्र में अंत तक भागीदार हो।यह भी आवश्यक नहीं है कि सभी पक्षकार एक ही अवैध कार्य को करने के लिए सहमत हो, इसमें अनेक कार्यों का किया जाना सम्मिलित हो सकता है। यह भी आवश्यक नहीं है कि षड्यंत्र का प्रत्येक सदस्य षड्यंत्र के सभी तथ्यों को जानता हो।

आपराधिक षडयंत्र का दण्ड : १२० B​

  1. जो कोई आजीवन कारावास या दो वर्ष या उससे अधिक अवधि के कठिन कारावास से दण्डनीय अपराध करने के आपराधिक षडयंत्र में शरीक होगा, यदि ऐसे षडयंत्र के दण्ड के लिए इस संहिता में कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं हैं, तो वह उसी प्रकार दण्डित किया जायेगा माने उसने ऐसे अपराध का दुष्प्रेरण किया था।
  2. जो कोई पूर्वोक्त रूप से दण्डनीय अपराध को करने के आपराधिक षडयंत्र से भिन्न किसी आपराधिक षडयंत्र में शरीक होगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि ६ मास से अधिक की नहीं होगी, या जुर्माने से या दोनों से, दण्डित किया जायेगा।
धारा 120 B के अन्तर्गत अपराध गठित करने के लिये अभियोजन को यह सिद्ध करना आवश्यक नहीं है कि अपराधियों ने अवैध कार्य को करने या उसे किये जाने की सुस्पष्ट सहमति व्यक्त किया था। सहमति आवश्यक अनुमान द्वारा सिद्ध की जा सकती है। जहाँ अभियुक्त पर्याप्त समय तक विस्फोटक पदार्थों को अपने पास रखे हुये थे बिना किसी वैध अनुज्ञप्ति के बेच रहे थे, ऐसी दशा में यह निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि कथित अवैध कार्य करने या उसे किये जाने के लिये उनमें सहमति थी क्योंकि बिना किसी सहमति के एक कार्य एक लम्बे समय तक नहीं किया जा सकता था।

टिप्पणी​

आपराधिक षड्यंत्र के लिये उस समय दण्ड अधिक कठोर होगा जब कि सहमति घातक अपराध करने के लिये है। यदि सहमति एक ऐसा अपराध करने के लिये जो यद्यपि अवैध है परन्तु मृत्युदण्ड, आजीवन कारावास या दो वर्ष से अधिक कठिन कारावास से दण्डनीय अपराध नहीं है तो दण्ड कठोर नहीं होगा। प्रथम प्रकरण में षड्यंत्र के लिये वही दण्ड है जैसे षड्यंत्रकारी ने ही अपराध का दुष्प्रेरण किया था। एक अपराध कारित करने हेतु षड्यंत्र धारा 120A के अन्तर्गत स्वयं एक सारभूत अपराध है और इसके लिये एक व्यक्ति पर अलग से आरोप लगाया जा सकता है अर्थात् उस पर षड्यंत्र तथा कारित अपराध दोनों का आरोप लगाया जा सकता है। धारा 109 तथा 120A द्वारा सृजित अपराध बिल्कुल अलग हैं तथा जबकि अपराध षड्यंत्र के अनुसरण में अनेक व्यक्तियों द्वारा किया जाता है तब यह सामान्य नियम है कि उन पर उस अपराध तथा उस अपराध के षड्यंत्र दोनों का आरोप लगाया जाता है।

 
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