हत्या Murder | IPC Sections 300 | Indian Penal Code 1860


हत्या Murder | IPC Sections 300 | Indian Penal Code 1860


धारा ३०० में हत्या (Murder) को परिभाषित किया गया है। इस धारा में निम्नलिखित चार परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है जब आपराधिक मानव-वध हत्या की कोटि में आ जाता है

आपराधिक मानव-वध कब हत्या है?​

  1. यदि कार्य, जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गई हो, मृत्यु कारित करने के आशय से किया गया हो, अथवा
  2. यदि वह ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से किया गया हो जिसे अपराधी जानता हो कि उस व्यक्ति की मृत्यु कारित करना सम्भाव्य है जिसको यह अपहानि कारित की गयी है, अथवा
  3. यदि वह किसी व्यक्ति को शारीरिक क्षति पहुंचाने के आशय से किया गया हो और वह शारीरिक क्षति, जिसके कारित करने का आशय हो, प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिये पर्याप्त हो, अथवा
  4. यदि कार्य करने वाला व्यक्ति यह जानता हो कि वह कार्य इतना आसन्न संकट है कि पूरी अधिसम्भाव्यता है कि वह मृत्यु कारित कर ही देगा या ऐसी शारीरिक क्षति कारित कर ही देगा जिससे मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है और वह मृत्यु कारित करने या पूर्वोक्त रूप की क्षति कारित करने की जोखिम उठाने के लिए किसी प्रतिहेतु के बिना ऐसा कार्य करे।

अपवाद 1​

आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है. यदि अपराधी उस समय जब कि वह गम्भीर और अचानक प्रकोपन से आत्म-संयम की शक्ति से वंचित हो, उस व्यक्ति की, जिसने कि वह प्रकोपन दिया था, मृत्यु कारित करे या किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु भूल या दुर्घटनावश कारित करे। ऊपर का अपवाद निम्नलिखित परन्तुकों के अध्यधीन है।
  • पहला – यह कि वह प्रकोपन किसी व्यक्ति का वध करने या अपहानि करने के लिए अपराधी द्वारा। प्रतिहेतु के रूप में ईप्सित न हो या स्वेच्छया प्रकोपित न हो।
  • दूसरा – यह कि वह प्रकोपन किसी ऐसी बात द्वारा न दिया गया हो जो विधि के पालन में या लोक सेवक द्वारा ऐसे लोक सेवक की शक्तियों के विधिपूर्ण प्रयाग में, की गई हो।
  • तीसरा – यह कि वह प्रकोपन किसी ऐसी बात द्वारा न दिया गया हो, जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के विधिपूर्ण प्रयोग में की गई हो।

स्पष्टीकरण​

प्रकोपन इतना गम्भीर और अचानक था या नहीं कि अपराध को हत्या की कोटि में जाने से बचा दे, यह तथ्य का प्रश्न है।

दृष्टान्त​

  1. य द्वारा दिए गए प्रकोपन के कारण प्रदीप्त आवेश के असर में म का, जो य का शिशु है, क साशय वध करता है। यह हत्या है, क्योंकि प्रकोपन उस शिशु द्वारा नहीं दिया गया था और उस शिशु की मृत्यु उस प्रकोपन से किए गए कार्य को करने में दुर्घटना या दुर्भाग्य से नहीं हुई है।
  2. क को म गम्भीर और अचानक प्रकोपन देता है। क इस प्रकोपन से म पर पिस्तौल चलाता है, जिसमें न तो उसका आशय य का, जो समीप ही है किन्तु दृष्टि से बाहर है, वध करने का है, और न वह यह जानता है कि सम्भाव्य है कि वह य का वध कर दे। क, य का वध करता है। यहाँ, क ने हत्या नहीं की है, किन्तु केवल आपराधिक मानव वध किया है।
  3. य द्वारा, जो एक बेलिफ है, क विधिपूर्वक गिरफ्तार किया जाता है। उस गिरफ्तारी के कारण क को अचानक और तीव्र आवेश आ जाता है और वह य का वध कर देता है। यह हत्या है, क्योंकि प्रकोपन ऐसी बात द्वारा दिया गया था, जो एक लोक सेवक द्वारा उसकी शक्ति के प्रयोग में की गयी थी।
  4. य के समक्ष, जो एक मजिस्ट्रेट है, साक्षी के रूप में क उपसंजात होता है। य यह कहता है कि वह क के अभिसाक्ष्य के एक शब्द पर भी विश्वास नहीं करता और यह कि क ने शपथ भंग किया है। क को इन शब्दों से अचानक आवेश आ जाता है और वह य का वध कर देता है। यह हत्या है।
  5. य की नाक खींचने का प्रयत्न क करता है। य प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में ऐसा करने से रोकने के लिए क को पकड़ लेता है। परिणामस्वरूप क को अचानक और तीव्र आवेश आ जाता है और वह य का वध कर देता है। यह हत्या है, क्योंकि प्रकोपन ऐसी बात द्वारा दिया गया था जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में की गई थी।
  6. ख पर य आघात करता है। ख को इस प्रकोपन से तीव्र क्रोध आ जाता है। क, जो निकट ही खड़ा हुआ है, ख के क्रोध का लाभ उठाने और उससे य का वध कराने के आशय से उसके हाथ में एक छुरी उस प्रयोजन के लिए दे देता है। ख उस छुरी से य का वध कर देता है। यहाँ ख ने चाहे केवल आपराधिक मानव वध ही किया हो, किन्तु क हत्या का दोषी है।

अपवाद 2​

आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि अपराधी, शरीर या सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार को सद्भावपूर्वक प्रयोग में लाते हुए विधि द्वारा उसे दी गई शक्ति का अतिक्रमण कर दे, और पूर्वचिन्तन बिना और ऐसी प्रतिरक्षा के प्रयोजन से जितनी अपहानि करना आवश्यक हो, उससे अधिक अपहानि करने के किसी आशय के बिना उस व्यक्ति की मृत्यु कारित कर दे जिसके विरुद्ध वह प्रतिरक्षा का ऐसा अधिकार प्रयोग में ला रहा हो।

दृष्टान्त​

क को चाबुक मारने का प्रयत्न य करता है, किन्तु इस प्रकार नहीं कि क को घोर उपहति कारित हो। क एक पिस्तौल निकाल लेता है। य हमले को चालू रखता है। क सद्भावपूर्वक यह विश्वास करते हुए कि वह अपने को चाबुक लगाए जाने से किसी अन्य साधन द्वारा नहीं बचा सकता है, गोली से य का वध कर देता है। क ने हत्या नहीं की है, किन्तु केवल आपराधिक मानव वध किया है।


अपवाद 3​

आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि वह अपराधी ऐसा लोक सेवक होते हुए, या ऐसे लोक सेवक को मदद देते हुए, जो लोक न्याय की अग्रसरता में कार्य कर रहा है, उसे विधि द्वारा दी गई शक्ति से आगे बढ़ जाए, और कोई ऐसा कार्य करके, जिसे वह विधिपूर्ण और ऐसे लोक सेवक के नाते उसके कर्तव्य के सम्यक निर्वहन के लिए आवश्यक होने का सद्भावपूर्वक विश्वास करता है, और उस व्यक्ति के प्रति, जिसकी कि मृत्यु कारित की गई है, वैमनस्य के बिना, मृत्यु कारित करे।

अपवाद 4​

आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि वह मानव वध अचानक झगड़ा जनित आवेष की तीव्रता में हुई अचानक लड़ाई में पूर्व चिन्तन बिना और अपराधी द्वारा अनुचित लाभ उठाये बिना या क्रूरतापूर्ण या अप्रायिक रीति से कार्य किये बिना किया गया हो।

स्पष्टीकरण​

ऐसी दशाओं में यह तत्वहीन है कि कौन पक्ष प्रकोपन देता है या पहले हमला करता है।

अपवाद 5​

आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि वह व्यक्ति जिसकी मृत्यु कारित की जाए, अठारह वर्ष से अधिक आयु का होते हुए, अपनी सम्मति से मृत्यु होना सहन करे, या मृत्यु की जोखिम उठाए।

दृष्टान्त​

य को, जो अठारह वर्ष से कम आयु का है, उकसाकर क उससे स्वेच्छया आत्महत्या करवाता है। यहाँ, कम उम्र होने के कारण य अपनी मृत्यु के लिए सम्मति देने में असमर्थ था, इसलिए क ने हत्या का दुष्प्रेरण किया है।

टिप्पणी​

धारा 300 उन मामलों से सम्बन्धित है जिनमें आपराधिक मानव-वध हत्या होता है। अत: कोई भी अपराध तब तक हत्या की कोटि में नहीं आ सकता जब तक वह आपराधिक मानव-वध की कोटि में नहीं आता। हत्या में आपराधिक मानव-वध भी सम्मिलित है किन्तु आपराधिक मानव-वध हत्या हो भी सकता है और नहीं भी। आपराधिक मानव-वध का कोई मामला हत्या होगा यदि वह धारा 300 के चार खण्डों में से किसी भी एक खण्ड के अन्तर्गत आता है।

खण्ड 1​

वह कार्य जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गयी है मृत्यु कारित करने के आशय से किया गया हो: जैसा कि धारा 299 में स्पष्ट किया गया है, कि कार्य के अन्तर्गत अवैध लोप भी आता है। अत: अवैध लोप द्वारा भी मृत्यु कारित की जा सकती है। यदि माता-पिता अपने बच्चों को समुचित आहार प्रदान करने में उपेक्षा करते हैं और यदि किसी बच्चे की मृत्यु हो जाती है तो माता-पिता हत्या कारित करने के दोषी होंगे। आर. वेंकलू के वाद में अभियुक्त ने उस झोपड़ी में आग लगा दिया जिसमें द सो रहा था। आग लगाते समय अभियुक्त ने झोपड़ी का दरवाजा बन्द कर उसमें ताला लगा दिया था, जिससे झोपड़ी के बाहर सो रहे द के नौकर उसकी सहायता के लिये न आ सकें। उसने इस बात की भी सावधानी बरती थी कि गांव वाले द की मदद के लिये न आ सकें। यहाँ यह स्पष्ट है कि अभियुक्त का आशय द की हत्या करना था। यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के मर्मस्थल पर छुरा भोंक देता है और यदि इस चोट से प्रत्यक्षत: या परोक्षत: उसकी मृत्यु हो जाती है तो यह माना जायेगा कि उसका आशय मृत्यु कारित करना था। और उपहति कारित करने वाले व्यक्ति को हत्या के लिये दण्डित किया जायेगा

नामदेव बनाम महाराष्ट्र राज्य के वाद में अपीलांट नामदेव और मृतक निनाजी एक ही गांव में रह रहे थे और उनके आपसी सम्बन्ध तनावपूर्ण थे। इस तनाव का कारण यह था कि अभियुक्त को इस बात का सन्देह था कि उसके कुछ जानवरों की मृत्यु मृतक द्वारा जादू टोना किये जाने के परिणामस्वरूप हो गयी थी। 25 अक्टूबर, 2000 को मृतक निनाजी अपने मकान की पिछले आंगन में सो रहा था। रात्रि में लगभग 2.00 बजे से 3.00 बजे के मध्य मृतक निनाजी के पुत्र सोपान अभि० सा० 6 अपने पिता के चिल्लाने की आवाज सुनी कि वह ‘‘बाप रे, बाप रे” कहते हुये चिल्ला रहे हैं। उनका चिल्लाना सुनकर सोपान और उसकी पत्नी मकान के पिछले भाग की ओर दौड़े जहाँ पर उसके पिता सो रहे थे। अभि० सा० 6 सोपान ने वहाँ देखा कि अभियुक्त उसके पिता निनाजी के सर पर कुल्हाड़ी से मार रहा था। सोपान को देखते ही अभियुक्त वहाँ से कुल्हाड़ी हाथ में लेकर भाग गया। सोपान ने उसे दौड़ा कर पकड़ने का प्रयास किया परन्तु पकड़ नहीं पाया। चिकित्सक की राय में सर में पहुँचायी गयी चोटें प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में चोटहिल की मृत्यु कारित करने के लिये पर्याप्त थीं।

उच्चतम न्यायालय ने यह अभिधारित किया कि अभियुक्त द्वारा प्रयोग किये गये हथियार (कुल्हाड़ी) और मृतक के शरीर के महत्वपूर्ण अंग अर्थात् सर जिसे चोट पहुंचाने के लिये चुना गया, उससे यह स्पष्ट था। कि अभियुक्त का आशय मृतक की मृत्यु कारित करना था। अतएव अपराध की परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुये वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304 भाग II के अन्तर्गत नहीं बल्कि धारा 300 के अधीन दोषी था।

हत्या में हेतु (Motive) कब आवश्यक है​

अबु ठाकिर और अन्य बनाम राज्य के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि हेतु का महत्व हत्या के अपराध में तब समाप्त हो जाता है जब प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध होता है।आत्माराम और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य के वाद में अभियुक्त ने विभिन्न शस्त्रों से लैस होकर मृतक पर हमला किया यहां तक कि जब वह गिर पड़ा, उसके शरीर के अंगों पर चोटें कारित की गयीं। मर्मस्थानों पर हमले की प्रकृति से उसे समाप्त कर देने का आशय स्पष्ट था। यह अभिधारित किया गया कि मात्र यह तथ्य कि कोई एक चोट प्रकृति के सामान्य क्रम में मृत्यु कारित करने के लिये यथेष्ट नहीं पाई गयी। अपराध को हत्या से भा. द. संहिता की धारा 304 खण्ड II अथवा धारा 326 में परिवर्तित नहीं करती।

दण्ड संहिता की धारा 300 में यह वर्णित है कि किस प्रकार के कार्य जब, मृत्यु कारित करने के आशय से किये जाते हैं अथवा ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से जिसे अपराध कर्ता जानता है कि कार्य मृत्यु कारित करने अथवा ऐसी शारीरिक क्षति जिसे वह जानता है कि वह प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में किसी की मृत्यु कारित करने के लिए काफी है अथवा चोट पहुंचाने वाला व्यक्ति जानता है कि यह आसन्न (imminently) संकट से इतना खतरनाक है कि सारी अधिसम्भाव्यता के अन्तर्गत उस कार्य से मृत्यु हो जायेगी तो वह हत्या होता है। यह हत्या है जब ऐसा कार्य बिना ऐसे किसी कारण के मृत्यु कारित करने के कारण के बिना अथवा शारीरिक क्षति कारित करने के बिना किसी क्षमायोग्य कारण के किया जाता है तो यह हत्या होता है।

सदोष मानव वध जो हत्या होते हैं समाज उनके कतिपय अपवाद भी विहित करता है। ऐसे अपवादों के लागू होने के लिए जो तत्व आवश्यक हैं उन्हें व्याख्या बताता है और उन्हें सिद्ध करना आवश्यक है। ऐसे अपवाद हैं कि कार्य बिना किसी पुर्वचिन्तन के और भाववेश में में किया जाय, जबकि अपराधी आत्म नियंत्रण की शक्ति से हीन रहता है बिना किसी गम्भीर और तत्कालिक उत्तेजना के उसकी मृत्यु कारित करता है जिसने उत्तेजना कारित किया है। अथवा किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु भूल से या दुर्घटनावश बशर्ते कि ऐसा भावावेश अपराधी के स्वयं के कारण न रहा हो तो ऐसी दशा में मानव वध हत्या नहीं होगा।

इस अपवाद की तीन परिसीमाएं हैं। ये सभी तथ्य विषयक प्रश्न हैं और इन्हें किसी मामले की परिस्थितियों और तथ्यों के अनुसार तय किया जायेगा। धारा 300 इन दोनों ही परिस्थितियों का वर्णन करती है। धारा 300 यह भी बताती है कि कब हत्या होगी और कब हत्या नहीं। पहला धारा 300 में वर्णित चार श्रेणियों में दिया है जब कि दूसरा धारा 300 में दिये गये पांच अपवादों में दिया है। व्यवस्थापिका ने सारे मामले जो सदोष मानव वध हत्या होंगे उन्हें बताये हैं और उन्हें भी जो मानववध हत्या नहीं होंगे। संहिता की धारायें 302 और 304 मुख्य रूप से दण्ड सम्बन्धी प्रावधान हैं। यह धारायें बताती हैं कि अपराधी जो इन दोनों में से कोई अपराध करता है वह किस दण्ड का भागी होगा


मृत्युकारित करने का आशय न होना​

राजस्थान राज्य बनाम हुकुम सिंह के वाद में अभियुक्त स्वयं मृतक को अस्पताल ले गया था। यह तथ्य अपने आप में यह संकेत करता है कि उसका अपराध कारित करने का आशय नहीं था और वह भी बन्दूक से शाट लगाने का जो कि हर हालत में पीड़ित की मृत्यु कारित करेगा। अतएव उच्चतम न्यायालय ने यह अभिधारित किया कि निचली अदालत का दोषमुक्त करने का निर्णय विकृत नहीं और इसलिए उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है।

हत्या के विचारण में न्याय सुनिश्चित करने के लिये न्यायालय को अपने समक्ष प्रस्तुत किये गये साक्ष्य तक ही सीमित रहना चाहिये। न्यायालय के बाहर की गर्मा-गर्मी, चाहे वह समाचार माध्यमों के अथवा लोकमत के फड़फड़ाहट के द्वारा पैदा की गयी हो, से इसे अपने को पृथक रखना चाहिये।

आपराधिक मानव-वध तथा हत्या के अपराध के बीच अन्तर​

न्यायाधीश जे. मेलविल ने आर बनाम गोविन्दा (१८७ ६) १ आई.एल.आर. १ बाम्बे ३२ के प्रमुख वाद में आपराधिक मानव-वध और हत्या के बीच अन्तर को स्पष्ट किया जो आज भी न्यायालयों के लिए पथ-प्रदर्शक वाद के रूप में माना जाता है। उक्त प्रकरण में अभियुक्त ने अपनी १५ वर्षीय पत्नी को लात मारकर नीचे गिरा दिया और उसकी छाती पर घुटना रखकर उसके चेहरे पर दो-तीन मुक्कों से प्रहार किए। उस महिला के मस्तिष्क से अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

सत्र-न्यायाधीश ने अभियुक्त को हत्या के लिए दोषी ठहराते हुए मृत्यु दण्ड दिया। परन्तु जब मृत्युदण्ड की सम्पुष्टि के लिए मामला बम्बई उच्च न्यायालय में आया तो न्यायाधीश मेलविल ने यह अभिनिर्धारित किया कि चूँकि अभियुक्त का आशय मृत्यु कारित करने का नहीं था और न उसके द्वारा पहँुचाई गई क्षति इस प्रकार की थी कि उसे घटना की प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त माना जा सके, अत: अभियुक्त आपराधिक मानव-वध के लिए दोषी था न कि हत्या के अपराध के लिए।
 
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