पुलिस आपकी FIR दर्ज न करे तो क्या करें? What to do if the police does not register your FIR?


पुलिस आपकी FIR दर्ज न करे तो क्या करें? What to do if the police does not register your FIR?


हम सभी को जीवन कभी न कभी FIR लिखाना ही पड़ता है चाहे खुद के लिये या किसी अन्य जानने वाले के लिये। अधिकाश लोगो की शिकायत होती है कि उनकी FIR थाने में नहीं लिखी गई, या फिर मजिस्ट्रेट के यहाँ एफ़आईआर के लिये किया गया आवेदन निरस्त हो गया। इसके तो कई कारण होते है किंतु एक कारण ये भी होता है की आपके लिखने तरीका गलत हो। एफ़आईआर को कम से कम शब्दों में स्पष्ट और पूरे मामले को लिखना चाहिये क्योंकि न्यायालय में आपका केस इसी आधार पर चलता है। आज के लेख में आसान भाषा में एफ़आईआर को लिखने का तरीका बताने वाला हूँ क्योंकि कई बार पढ़े लिखे लोग भी एफ़आईआर लिखने में गलती कर देते है।


अगर आप किसी मामले की एफआईआर दर्ज कराने पुलिस स्टेशन जाते हैं और पुलिस अधिकारी आपकी एफआईआर दर्ज नहीं करता है तो आप क्या करेंगे? ज्यादातर लोग वरिष्ठ पुलिस अधिकारी या किसी नेता के पास न्याय मांगने जाते हैं परंतु यदि तब भी सुनवाई ना हो तो? चिंता की कोई बात नही है, कानून आप की मदद करने के लिए है। किसी अपराध की शिकायत मिलने पर एफआईआर दर्ज करने से मना करने वाले पुलिस अधिकारी को 2 साल तक की जेल हो सकती है। साथ ही उसके ऊपर जुर्माना भी लग सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने प्राथमिकी यानि की एफआईआर दर्ज करने को अनिवार्य बनाने का फैसला दिया है। एफआईआर दर्ज नहीं करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश भी न्यायालय ने दिया है। न्यायालय ने यह भी व्यवस्था दी है कि एफआईआर दर्ज होने के एक सप्ताह के अंदर प्राथमिक जांच पूरी की जानी चाहिए। इस जांच का मकसद मामले की पड़ताल और गंभीर अपराध है या नहीं जांचना है। इस तरह पुलिस इसलिए मामला दर्ज करने से इंकार नहीं कर सकती है कि शिकायत की सच्चाई पर उन्हें संदेह है।

ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में पुलिस के FIR दर्ज नहीं करने के मामले फैसला सुनाया था। ललिला कुमारी एक नाबालिग थी, जिसको किडनैप कर लिया गया था। जब ललिता कुमारी के पिता भोला कामत इसकी एफआईआर दर्ज कराने थाने पहुंचे, तो पुलिस ने इनकार कर दिया। इसके बाद ललिता कुमारी के पिता भोला कामत ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस मामले को देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद गंभीरता से लिया और मामले को संविधान पीठ को भेज दिया।

इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय की 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने मामले में सुनवाई की। इस दौरान शीर्ष अदालत ने पुलिस के FIR दर्ज करने के तौर तरीके को लेकर भारत सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित राज्यों के मुख्य सचिवों, पुलिस महानिदेशकों और पुलिस कमिश्नरों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने FIR दर्ज करने को लेकर उच्च न्यायालय के फैसलों और कानून के विशेषज्ञों की राय भी जानी।

सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने आदेश दिया कि गंभीर अपराधों की शिकायत मिलते ही पुलिस अधिकारी को एफआईआर दर्ज करनी होगी। वो इससे इनकार नहीं कर सकता है। अगर वो ऐसा करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए।

दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 154 और 155 के तहत थाना प्रभारी की लीगल ड्यूटी है कि वो किसी भी अपराध की शिकायत मिलने के बाद एफआईआर दर्ज करे। साथ ही शिकायत देने वाले को इसकी रिसीविंग यानी पावती मुफ्त में दे। अगर पुलिस अधिकारी FIR दर्ज करने से मना करता है, तो उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) 1860 की धारा 166 के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

संज्ञेय अपराध के मामलों में तुरंत एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। एफआईआर की कॉपी लेना शिकायकर्ता का अधिकार है। इसके लिए मना नहीं किया जा सकता है। संज्ञेय अपराध की एफआईआर में लिखे गए घटनाक्रम व अन्य जानकारी को शिकायकर्ता को पढ़कर सुनाना अनिवार्य है। आप सहमत हैं, तो उस पर हस्ताक्षर किए जाने चाहिए। यह जरूरी नहीं कि शिकायत दर्ज करवाने वाले व्यक्ति को अपराध की व्यक्तिगत जानकारी हो या फिर उसके सामने ही अपराध हुआ हो। एफआईआर में पुलिस अधिकारी स्वयं की ओर से कोई भी शब्द या टिप्पणी नहीं जोड़ सकता है।

एफ़आईआर दर्ज न हो तो क्या करें​

कानून की यह विशेषता है कि यदि किसी एक कानून से पीड़ित को राहत न मिले तो उसका भी उपचार दिया गया है। अगर पुलिस कोई रिपोर्ट लिखने से मना करे तो उसका हल भी कानून में है। अगर किसी पुलिस थाने में आपकी शिकायत नहीं सुनी गई है तो व्यक्ति अपनी शिकायत ऑनलाइन रजिस्टर करा सकते हैं। यदि फिर भी एफ़आईआर दर्ज न हो तो आप लिखित शिकायत रजिस्टर्ड डाक के माध्यम संबंधित ज़िले के पुलिस अधीक्षक से कर सकते हैं। आपको लिखित में इस बात का पूरा विवरण देना होगा कि आप किस समय थाने में अपनी रिपोर्ट लिखवाने गए और वहां आपको कौन व्यक्ति मिला और उसने क्या कहा। इसके बाद यह एसपी की ज़िम्मेदारी है कि वह संबंधित थाने से मामले की जांच करवाएं और आपकी शिकायत दर्ज करवाएं।

साधारणता: तो यहां तक आते आते आपकी एफ़आईआर दर्ज कर ली जाएगी, यदि फिर भी किसी कारण आपकी एफ़आईआर दर्ज ना हो तो आप सारे आवेदन की प्रति जो आपने थाने या एसपी ऑफिस में दिए हैं, उन्हें लेकर किसी वकील के माध्यम से कोर्ट की शरण में जाएं और वहां पूरे विवरण के साथ 156/3 के तहत अपनी एफ़आईआर दर्ज करवाने के लिए आवेदन करें।


प्राथमिक सूचना रिपोर्ट (FIR) से संबंधित अन्य प्रावधान​

  1. FIR दर्ज करते समय पुलिस अधिकारी अपनी तरफ से न तो कोई टिप्पणी लिख सकता है और न ही किसी भाग को हाईलाइट कर सकता है।
  2. संज्ञेय अपराध की स्थिति में सूचना दर्ज करने के बाद पुलिस अधिकारी को चाहिए कि वह संबंधित व्यक्ति को उस सूचना को पढ़कर सुनाए और लिखित सूचना पर उसके हस्ताक्षर कराए।
  3. FIR की कॉपी पर पुलिस स्टेशन की मोहर व पुलिस अधिकारी के हस्ताक्षर होने चाहिए। इसके साथ ही पुलिस अधिकारी अपने रजिस्टर में यह भी दर्ज करेगा कि FIR की कॉपी आपको दे दी गई है।
  4. अगर किसी ने संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को लिखित रूप से दी है, तो पुलिस को FIR के साथ उसकी शिकायत की कॉपी लगाना जरूरी है।
  5. FIR दर्ज कराने के लिए यह जरूरी नहीं है कि शिकायत करने वाले को अपराध की व्यक्तिगत जानकारी हो या उसने अपराध होते हुए देखा हो।
  6. अगर किसी कारण आप घटना की तुरंत सूचना पुलिस को नहीं दे पाते हैं तो ऐसी स्थिति में आपको सिर्फ देरी का कारण बताना होगा।
  7. कई बार पुलिस FIR दर्ज करने से पहले ही मामले की जांच-पड़ताल शुरू कर देती है, जबकि नियमानुसार पहले FIR दर्ज होनी चाहिए तदुपरांत जांच-पड़ताल होनी चाहिए।
  8. घटना स्थल पर FIR दर्ज कराने की स्थिति में अगर आप FIR की कॉपी नहीं ले पाते हैं, तो पुलिस आपको FIR की कॉपी डाक से भेजेगी।
  9. आपकी FIR पर क्या कार्रवाई हुई, इस बारे में संबंधित पुलिस अधिकारी आपको डाक से सूचित करेगा|
  10. अगर सूचना देने वाला व्यक्ति पक्के तौर पर यह नहीं बता सकता कि अपराध किस जगह हुआ तो पुलिस अधिकारी इस जानकारी के लिए प्रश्न पूछ सकता है और फिर निर्णय पर पहुंच सकता है। इसके बाद तुरंत FIR दर्ज कर वह उसे संबंधित थाने को भेज देगा। इसकी सूचना उस व्यक्ति को देने के साथ-साथ रोजनामचे में भी दर्ज की जाएगी।
  11. अगर शिकायतकर्ता को घटना की जगह की जानकारी नहीं है और पूछताछ के बावजूद भी पुलिस उस जगह को तय नहीं कर पाती है तो भी वह तुरंत FIR दर्ज कर जांच-पड़ताल शुरू कर देगा। अगर जांच के दौरान यह तय हो जाता है कि घटना किस थाना क्षेत्र में घटी है तो केस उस थाने को स्थानान्तरित (ट्रान्सफर) हो जाएगा।
  12. अगर FIR दर्ज कराने वाले व्यक्ति की मामले की जांच-पड़ताल के दौरान मौत हो जाती है, तो इस FIR को मृत्युकालिक कथन (Dying Declaration) की तरह न्यायालय में पेश किया जा सकता है।
  13. अगर शिकायत में किसी असंज्ञेय अपराध का पता चलता है तो उसे रोजनामचे में दर्ज करना जरूरी है। इसकी भी कॉपी शिकायतकर्ता को जरूर लेनी चाहिए। इसके बाद मैजिस्ट्रेट से सीआरपीसी की धारा 155 के तहत उचित आदेश के लिए संपर्क किया जा सकता है।
 
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