Kab Tak Dil Ki Khair Manaye – Faiz Ahmad Faiz

कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ, कब तक रह दिखलाओगे कब तक चैन की मोहलत दोगे, कब तक याद न आओगे


कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ, कब तक रह दिखलाओगे
कब तक चैन की मोहलत दोगे, कब तक याद न आओगे

बीता दीद-उमीद का मौसम, ख़ाक उड़ती है आँखों में
कब भेजोगे दर्द का बादल, कब बरखा बरसाओगे

अह्‍दे-वफ़ा या तर्के-मुहब्बत, जी चाहो सो आप करो
अपने बस की बात ही क्या है, हमसे क्या मनवाओगे

किसने वस्ल का सूरज देखा, किस पर हिज्र की रात ढली
गेसुओं वाले कौन थे क्या थे, उनको क्या जतलाओगे

’फ़ैज़’ दिलों के भाग में है घर बसना भी, लुट जाना भी
तुम उस हुस्न के लुत्फ़ो-करम पर कितने दिन इतराओगे


Kab Tak Dil Ki Khair Manaye, Kab Tak Reh Dikhlaoge
Kab Tak Chain Ki Mohlat Doge, Kab Tak Yaad N Aaoge

Beeta Deed Umeed Ka Mausam, Khaal Udti Hai Aankho Me
Kab Bhejoge Dard Ka Badal, Kab Barkha Barsaoge

Ahad-e-Wafa Ya Tark-e-Mohabbat, Ji Chaho So Aao Karo
Apne Bas Ki Baat Hi Kya Hai, Hamse Kya Manwaoge

Kisne Wasl Ka Sooraj Dekha, Kis Par Hizr Ki Raat Dhali
Gesuo Waale Kaun The Kya The Unko Kya Jatlaaoge

Faiz Dilon Ke Bhaag Me Hai Ghar Basna Bhi Lut Jaana Bhi
Tum Us Husn Ke Lutfo-Karam Par Kitne Din Itraaoge
 
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