Thora Nadi ki Utpatti ki Rahasyamayee Kahani - ठोरा नदी के उत्पत्ति की कहानी

ठोरा नदी से संबधित रहस्मयी और रोचक जानकारिया,ठोरा नदी एक ऐसी नदी है जिसकी उत्पत्ति एक कुवे से हुई है।

ठोरा नदी की उत्पत्ति अपने आप में एक रहस्य है, ठोरा नदी का उद्गम स्थल एक कुवाँ है, आज से ४०० साल पहले इस नदी का कोई नामो निशान नहीं था, और जिस छेत्र में ये नदी आज बहती है वहाँ पानी की बहुत कमी थी, तो चलिए आज इस नदी की उत्पत्ति से संबधित किवंदितियों और कहानियों को समझते है।

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कहाँ से उत्पत्ति हुई ठोरा नदी की?​

ठोरा नदी की उत्पति बिहार के बक्सर जिले के बिक्रमगंज प्रखंड के नोनहर गाँव के से हुई थी, यह कुवां आज भरा जा चूका है इस कुवें में जमा पेड़ अब एक बड़ा बृक्ष बन चूका है, इस कुवें को कंक्रीट से ढाल दिया गया है और साथ ही ठोरा बाबा का मंदिर का निर्माण करा दिया गया है, ठोरा नदी के आस पास के लोग यहाँ पूजा अर्चना और भ्रमण के लिए आते रहते है, यहाँ ठोरा बाबा का मंदिर भी बनाया गया है, परन्तु आज के समय नदी का बहाव गाँव से कुछ दुरी पर पश्चिम में मिलता जो कभी इसी नदी से बहता था।

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कैसे हुई ठोरा नदी की उत्पत्ति?​

एक लोक कथा के अनुसार ठोरा नामक एक बालक था जिनका जन्म उत्तरप्रदेश राज्य के मिर्जापुर एक ब्रामण के घर हुआ था , सुरु से ही ठोरा बाबा एक तेजस्वी बालक थे ,उनका ननिहाल (ममहर) बिहार के बिक्रमगंज के नोनहर गाँव में था जहाँ उनके सात मामा रहते थे , वहाँ उनका बड़ा आदर सत्कार होता था , एक बार ऐसे ही वे अपने नौकर और कुत्ते के साथ नोनहर घूमने आये हुवे थे , वे अपने सतो मामा के घर गए परन्तु उन्हें खाने के लिए किसी ने नहीं पूछा सभी मामा को लगा दूसरे के घर खा कर आये होंगे , ठोरा बाबा को इस अपमान से बहुत क्रोध आया और भूख ने उनके क्रोध को और बढ़ा दिया तब उन्होंने नोनहर के कुवें में छलांग लगा दिए , दर से उनके नौकर ने भी छलांग लगा दी यह देख उनके कुत्ते ने भी वही छलांग लगा दी , कहा जाता है की उनके कुवें में कूदते ही एक तूफान सा उठा और कुवें से पानी की एक लहर निकलने लगी देखते ही देखते कुवें से निकलने वाला पानी का वेग बढ़ता गया और और पानी एक नदी का रूप लेकर आगे बढ़ने लगी, और सीधा गंगा से मिल गई।


ठोरा बाबा गंगा को चिर कर आगे बढ़ने लगे​


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कुछ लोगो को कहना है की ठोरा बाबा गंगा नदी को चिर कर निकलने लगे तब माता गंगा स्वम प्रकट होकर ठोरा बाबा को शांत किया और कहा की आप नदी की प्रकृति से छेड़ छाड़ न करे, ठोरा बाबा शांत हुए और माता गंगा के गोद में बिलिन हो गए।

तभी से इस नदी को लोग ठोरा नदी के नाम से जानने लगे , आज भी लोग ठोरा बाबा की पूजा के लिए उसी कुवे के पास जाते है , हलाकि वो कुवां अब सुख चूका है उस जमा पीपल का पेड़ अब कभी बड़ा हो गया है उस कुवे पर अब एक कंक्रीट की मोती स्लैब ढाल दी गई है और पास ही ठोरा बाबा का मंदिर भी बनवा दिया गया।

ठोरा नदी देती थी कभी भूखो को खाना

ठोरा नदी से जुडी अनेको कहानिया किवंदितिया उसके तटीय छेत्रों में फैली है, एक किवंदिति के अनुसार ठोरा नदी के टत जो कोई भी भूखा मुसाफिर जाता ठोरा नदी स्वम उनकों सोने के थाल में छप्पन भोग का खाना प्रदान करती थी, बहुत समय से ऐसे ही चलता रहा भूखे राहगीर आते ठोरा बाबा उन्हें सोने के थाल में खाना देते राहगीर खाना खाते और ठोरा बाबा को धन्यवाद् देते और थाल को ठोरा नदी में डाल देते , परन्तु एक लालची राहगीर ने सोने की थाल देखकर खाना खाने के बाद लेकर चला गया तब से ठोरा बाबा ने खाना देना बंद कर दिया।

निष्कर्ष - ठोरा नदी जुडी सभी कहानियाँ हमने यहाँ ब्यक्त की है अब आप इसे सच माने या मिथक ये आपपर है , परन्तु इन कहानियों में कुछ तो सच्चाई जरूर रही होगी क्योंकि सच्चाई से ही मिथक का जन्म होता है।

धन्यवाद्
 
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