जबरन वसूली (उद्दापन) | Extortion in Hindi | IPC 1860 Sections 383


जबरन वसूली (उद्दापन) | Extortion in Hindi | IPC 1860 Sections 383


प्रावधान​

वस्तुत: उद्दापन चोरी का ही एक रुप है। चोरी में किसी व्यक्ति को बिना किसी भय में डाले उसे उसकी सम्पत्ति से वंचित किया जाता है जबकि उद्दापन में ऐसे व्यक्ति को क्षति कारित करने का भय दिखाकर उसकी सम्पत्ति से वंचित किया जाता है। संहिता की धारा ३८३ से ३८९ उद्दापन से सम्बन्धित है।


धारा ३८३ में `उद्दापन’ परिभाषित है, जो इस प्रकार है​

“जो कोई किसी व्यक्ति को या किसी अन्य व्यक्ति को कोई क्षति करने के भय में साशय डालता है और तद्द्वारा इस प्रकार भय में डाले गये व्यक्ति को कोई सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति या हस्ताक्षरित या मुद्रांकित कोई चीज, जिसे मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तित किया जा सके, किसी व्यक्ति को परिदत्त करने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करता है, वह उद्दापन करता है”।

उद्दापन, चोरी और लूट के बीच का कृत्य है, अर्थात् यदि अभियुक्त सम्पत्तिधारक के कब्जे में से सम्पत्ति या वस्तु उसकी सहमति के बिना ले जाता है, तो यह चोरी का अपराध होगा और यदि वह सम्पत्तिधारक के सामने सम्पत्ति छीनकर ले जाता है तो यह लूट का अपराध होगा। परन्तु यदि वह सम्पत्तिधारक व्यक्ति को चोट का भय दिखाकर उसको या अन्य किसी व्यक्ति को सम्पत्ति देने के लिए विवश करता है, तो यह उद्दापन का अपराध कहलाएगा। अत: उद्दापन के लिए यह आवश्यक नहीं है कि भय में डालने वाला व्यक्ति तथा सम्पत्ति प्राप्त करने वाला व्यक्ति एक ही हो।

किसी व्यक्ति को क्षति के भय में डालना​

इस धारा के अन्तर्गत अपराध गठित करने के लिये यह आवश्यक है कि उद्दापनकर्ता किसी व्यक्ति को भय में डाले और इसके द्वारा कोई सम्पत्ति परिदत्त करने के लिये बेईमानी से उसे उत्प्रेरित करे। भय इस प्रकृति और विस्तार का होना चाहिये कि जिस व्यक्ति पर उसका प्रभाव पड़ रहा हो, उसका मस्तिष्क असंतुलित हो जाये तथा वह स्वेच्छया कार्य करने की सहमति से वंचित हो जाये। एक प्रकरण में एक पादरी ने एक महिला के साथ किसी बदनाम परिसर में आपराधिक संभोग किया था। अभियुक्त ने उसे धमकी दी थी कि वह पादरी के इस कुकर्म को तमाम लोगों के सामने भंडाफोड़ कर देगा। यह अभिनिर्णीत हुआ कि इस प्रकार दी गयी धमकी इस धारा के अन्तर्गत आती है क्योंकि इसकी प्रकृति ऐसी थी जिसे सामान्य दृढ़ता वाले व्यक्तियों से बर्दाश्त करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। इस धारा के अन्तर्गत दी गयी धमकी या भय का लगाये गये आरोप की सत्यता से कोई सम्बन्ध नहीं है। जिस व्यक्ति को भय दिखाया गया है उसका दोषी या निर्दोष होना सारवान नहीं है। इस धारा में यह नहीं अपेक्षित है कि आरोप लगाने का भय न्यायिक अधिकरण के समक्ष दिखाया गया हो, यदि किसी तीसरे व्यक्ति के समक्ष भय दिखाया गया है तो भी पर्याप्त होगा।

एक मामले में अभियोजक घर लौटते समय रास्ते में एक महिला से मिला और उससे कुछ बात-चीत किया। इस बातचीत के लिये एक सिपाही ने अभियोग चलाने की धमकी उसे दी क्योंकि वह महिला जिससे अभियोजक ने बातचीत की थी, एक वेश्या थी, और इसके लिये वह एक पाउण्ड के दण्ड से दण्डनीय था। किन्तु सिपाही ने उससे कहा कि यदि वह 5 शिलिंग बतौर रिश्वत दे दे तो वह इस अभियोग को त्याग देगा। अभियोजक ने सिपाही को 5 शिलिंग का भुगतान कर दिया। सिपाही को इस अपराध का दोषी ठहराया गया।

किसी सरकारी जंगल में इकट्ठी लकड़ियों को उपयुक्त शुल्क की अदायगी किये बिना ले जाने के लिये अनुमति देने से इन्कार कर देना, अतिचार करने वाले किसी पशु के स्वामी से इस भय के अन्तर्गत भुगतान प्राप्त करना कि यदि भुगतान न किया गया तो पशु को मवेशीखाने में बन्द कर दिया जायेगा तथा एक वकील की हैसियत से कार्य न करने के भय के अन्तर्गत कोई बाण्ड प्राप्त करना इस धारा के अन्तर्गत कोई अपराध संरचित नहीं करता।

किसी व्यक्ति को सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति परिदत्त करने के लिये बेईमानीपूर्वक उत्प्रेरित करना- इस धारा का सार है बेईमानीपूर्ण उत्प्रेरण और ऐसे उत्प्रेरण के परिणामस्वरूप सम्पत्ति के समर्पण को स्वीकार करना। अतः सदोष हानि या सदोष लाभ कारित करने का आशय आवश्यक है, केवल सदोष हानि पहुँचाना पर्याप्त न होगा।

उद्दापन का अपराध गठित करने के लिये भयग्रस्त व्यक्ति द्वारा सम्पत्ति का वास्तविक परिदान आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति भयवश उस समय किसी प्रकार की बाधा नहीं उपस्थित करता जिस समय उसकी सम्पत्ति हटाई जा रही हो किन्तु वह अपनी सम्पत्ति ले जाने वालों को परिदत्त भी नहीं करता, ऐसी स्थिति में अपराध ‘उद्दापन’ न होकर ‘लूट’ माना जायेगा।

किसी व्यक्ति को यह आवश्यक नहीं है कि डराने वाला तथा सम्पत्ति प्राप्त करने वाला एक ही व्यक्ति हो। ऐसा सम्भव है कि एक व्यक्ति धमकी दे तथा दूसरा व्यक्ति सम्पत्ति को स्वीकार करे किन्तु यह आवश्यक है कि सम्पत्ति ऐसी धमकी के फलस्वरूप ही परिदत्त की गयी है। इस धारा के अन्तर्गत यह भी आवश्यक नहीं है कि जो व्यक्ति क्षति कारित करने के भय में डालता है, सम्पत्ति उसे ही परिदत्त की जाये। यदि उसके इशारे पर किसी अन्य व्यक्ति को संपत्ति क्षति के भय से परिदत्त की जा रही है तब भी यह अपराध पूर्ण माना जायेगा। ऐसे सभी व्यक्ति जो भय कारित करते हैं या जिन्हें सम्पत्ति परिदत्त की जाती है, उद्दापन के अपराध के लिये दण्डनीय होंगे।


मूल्यवान प्रतिभूति​

इस धारा के अन्तर्गत परिदत्त वस्तु कोई सम्पत्ति, मूल्यवान प्रतिभूति या हस्ताक्षरित या मुद्रांकित कोई चीज जिसे मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तित किया जा सके, हो सकती है। ‘मूल्यवान प्रतिभूति’ इस संहिता की धारा 30 में परिभाषित है। हस्ताक्षरित या मुद्रांकित किसी चीज से यह अभिप्रेत है कि अपूर्ण विलेख भी उद्दापन की विषयवस्तु हो सकता है। यदि कोई नाबालिग पीटा जाता है और उसे एक प्रोनोट निष्पादित करने के लिये मजबूर किया जाता है तो बल प्रयोग करने वाला व्यक्ति इस धारा के अन्तर्गत दण्डनीय होगा। किन्तु कागज के किसी टुकड़े पर बलपूर्वक अंगूठे का निशान लेना जिसे मूल्यवान प्रतिभूति के रूप में परिवर्तित किया जा सकता हो, उद्दापन का अपराध गठित नहीं करता, अपितु इस संहिता की धारा 352 के अन्तर्गत गम्भीर प्रकोपन का अपराध गठित करता है। किन्तु अपूर्ण विलेख उद्दापन की विषयवस्तु हो सकता है।

उदाहरण​

  1. अ एक प्रामिजरी नोट पर अपना दस्तखत करता है। जिसमें तिथि तथा धनराशि इत्यादि नहीं लिखी गई थी। दस्तखत करने के पश्चात् अ वह नोट ब को सौंप देता है। यहाँ उद्दापन का अपराध कारित हुआ समझा जायेगा क्योंकि प्रामिजरी नोट को पूर्ण कर मूल्यवान प्रतिभूति के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
  2. एक प्रकरण में अभियुक्त ने एक लड़के तथा एक लड़की को कपड़े उतारने के लिये बाध्य किया और इस प्रकार नंगा कर उनकी तस्वीरें खींची। तत्पश्चात् उसने उन्हें बाध्य किया कि यदि वे उसे पैसा नहीं देंगे तो वह उनकी तस्वीरों को प्रकाशित कर देगा। उसे इस अपराध का दोषी ठहराया गया।
  3. एक अन्य प्रकरण में एक पुलिस अधिकारी य ने ब को गिरफ्तार किया और तब तक जमानत मंजूर करने से इन्कार किया जल तक उसे 500 रुपये भुगतान नहीं कर दिया जाता। जैसे ही मांग की पूर्ति की गई य ने जमानत मंजूर कर लिया। य उद्दापन के अपराध का दोषी था।
  4. जहाँ अ, ब से यह कह कर कोई सम्पत्ति प्राप्त करता है कि आपका लड़का हमारे गिरोह के हाथ में है और उसे मार दिया जायेगा यदि आप हमें पाँच लाख रुपये नहीं भेजते हैं। अ इस धारा के अन्तर्गत दंडनीय होगा।
  5. अ, ब का ब्रीफकेस पाता है तथा वह ब को लिखता है कि वह उसे ब्रीफकेस तब देगा जब वह उसे 500 रुपये अदा करेगा। यदि ब उसे 500 रुपये अदा कर देता है तो अ उद्दापन का अपराधी होगा किन्तु यदि वह उसे रुपया नहीं देता है तो ब उद्दापन कारित करने के प्रयत्न का दोषी होगा और यदि वह ब्रीफकेस लौटाता नहीं है तो वह आपराधिक दुर्विनियोग का दोषी होगा।
आर एस नायक बनाम ए आर अन्तुले तथा अन्य के मामले में भी अन्तुले ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में चीनी मिलों की सहकारी समितियों से, जिनके मामले सरकार के विचाराधीन थे, दान या चन्दा देने को कहा और यह वादा किया कि यदि वे दान देंगे तो उनके मामलों पर विचार किया जायेगा। उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि इन तथ्यों के आधार पर उद्दापन का अपराध गठित नहीं होता है। इस बात का प्रमाण नहीं था कि सहकारी समितियों के प्रबन्धकों को किसी प्रकार की धमकी दी गई थी और उस क्षति के कारित किये जाने के भय से उन्होंने चन्दा दिया। न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि उद्दापन के अपराध हेतु भय (fear) या धमकी का प्रयोग आवश्यक है। कोई व्यक्ति किसी अन्य के विरुद्ध भय या धमकी का प्रयोग करता तभी माना जायेगा जब इस बात का प्रमाण हो कि उसने कोई कार्य करने अथवा जिसके करने के लिये वह विधि द्वारा आबद्ध है उसे न करने की धमकी देता है। यदि कोई व्यक्ति केवल किसी ऐसे कार्य को करने का वचन देता है जिसे करने के लिये वह विधि द्वारा आबद्ध नहीं है और यह कहता है कि यदि रुपया नहीं दिया जायेगा तो वह ऐसे कार्य को नहीं करेगा तो ऐसा कार्य उद्दापन का अपराध नहीं है।

 
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